देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १८ ] | प्रथम स्कन्ध | १६१ |
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| सम्प्राप्तोऽहं महाराज त्वत्पुरे च तदाज्ञया।<br>मोक्षकामोऽस्मि राजेन्द्र ब्रूहि कृत्यं ममानघ॥ १३<br><br>तपस्तीर्थव्रतेज्याश्च स्वाध्यायस्तीर्थसेवनम्।<br>ज्ञानं वा वद राजेन्द्र मोक्षं प्रति च कारणम्॥ १४ | हे महाराज! मैं उन्हींके आदेशसे आपकी पुरीमें आया हूँ। हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्षका अभिलाषी हूँ, अतः जो कार्य मेरे लिये उचित हो, वह बताइये॥ १३॥<br>हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, तीर्थसेवन और ज्ञान—इनमेंसे जो मोक्षका साक्षात् साधन हो, वह मुझे बताइये॥ १४॥ | | जनक उवाच<br>शृणु विप्रेण कर्तव्यं मोक्षमार्गाश्रितेन यत्।<br>उपनीतो वसेदादौ वेदाभ्यासाय वै गुरौ॥ १५<br><br>अधीत्य वेदवेदान्तान्दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम्।<br>समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो निवसेन्मुनिः॥ १६<br><br>न्यायवृत्तिस्तु सन्तोषी निराशी गतकल्मषः।<br>अग्निहोत्रादिकर्माणि कुर्वाणः सत्यवाक्शुचिः॥ १७<br><br>पुत्रं पौत्रं समासाद्य वानप्रस्थाश्रमे वसेत्।<br>तपसा षड्रिपूञ्जित्वा भार्यां पुत्रे निवेश्य च॥ १८<br><br>सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित्।<br>वसेत्तुर्याश्रमे श्रान्तः शुद्धे वैराग्यसम्भवे॥ १९<br><br>विरक्तस्याधिकारोऽस्ति संन्यासे नान्यथा क्वचित्।<br>वेदवाक्यमिदं तथ्यं नान्यथेति मतिर्मम॥ २० | **जनकजी बोले—**मोक्षमार्गावलम्बी विप्रको जो करना चाहिये, उसे सुनिये। उपनयनसंस्कारके बाद सर्वप्रथम वेदशास्त्रका अध्ययन करनेहेतु गुरुके सांनिध्यमें रहना चाहिये। वहाँ वेद-वेदान्तोंका अध्ययन करके दीक्षान्त गुरुदक्षिणा देकर वापस लौटे मुनिको विवाह करके पत्नीके साथ गृहस्थीमें रहना चाहिये। [गृहस्थाश्रममें रहते हुए] न्यायोपार्जित धनका अर्जन करे, सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसीसे कोई आशा न रखे। पापोंसे मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए सत्यवचन बोले और [मन, वचन, कर्मसे सदा] पवित्र रहे। पुत्र-पौत्र हो जानेपर [समयानुसार] वानप्रस्थ-आश्रममें रहे। वहाँ तपश्चर्याद्वारा [काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य—इन] छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्रीरक्षाका भार पुत्रको सौंप देनेके पश्चात् वह धर्मात्मा सब अग्नियोंका अपनेमें न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक विषयोंके भोगसे शान्ति मिल जानेके बाद हृदयमें विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होनेपर चौथे आश्रमका आश्रय ले ले। विरक्तको ही संन्यास लेनेका अधिकार है, अन्य किसीको नहीं—यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है, असत्य नहीं—ऐसा मेरा मानना है॥ १५—२०॥ | | शुकाष्टचत्वारिंशद्वै संस्कारा वेदबोधिताः।<br>चत्वारिंशद् गृहस्थस्य प्रोक्तास्तत्र महात्मभिः॥ २१<br><br>अष्टौ च मुक्तिकामस्य प्रोक्ताः शमदमादयः।<br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति शिष्टानुशासनम्॥ २२ | हे शुकदेवजी! वेदोंमें कुल अड़तालीस संस्कार कहे गये हैं। उनमें गृहस्थके लिये चालीस संस्कार महात्माओंने बताये हैं। मुमुक्षुके लिये शम, दम आदि आठ संस्कार कहे गये हैं। एक आश्रमसे ही [क्रमशः] दूसरे आश्रममें जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनोंका आदेश है॥ २१-२२॥ | | शुक उवाच<br>उत्पन्ने हृदि वैराग्ये ज्ञानविज्ञानसम्भवे।<br>अवश्यमेव वस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा॥ २३ | **शुकदेवजी बोले—**चित्तमें वैराग्य और ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न हो जानेपर अवश्य ही गृहस्थादि आश्रमोंमें रहना चाहिये अथवा वनोंमें॥ २३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A