देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 169, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 169
| १६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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अथाष्टादशोऽध्यायः
शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| श्रुत्वा तमागतं राजा मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।<br>पुरः पुरोहितं कृत्वा गुरुपुत्रं समभ्यगात्॥ १ | शुकदेवजीको आया हुआ सुनकर पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहितको आगे करके मन्त्रियोंसहित उन गुरुपुत्रके पास गये॥ १॥ |
| कृत्वार्हणां नृपः सम्यग् दत्तासनमनुत्तमम्।<br>पप्रच्छ कुशलं गां च विनिवेद्य पयस्विनीम्॥ २ | महाराज जनकने उन्हें बड़े आदरसे उत्तम आसन देकर विधिवत् सत्कार करनेके पश्चात् एक दूध देनेवाली गौ प्रदान करके उनसे कुशल पूछा॥ २॥ |
| स च तां नृपपूजां वै प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि।<br>पप्रच्छ कुशलं राज्ञे स्वं निवेद्य निरामयम्॥ ३ | शुकदेवजीने भी राजाकी पूजाको यथाविधि स्वीकार किया और अपना कुशल बताकर राजासे भी कुशल-मंगल पूछा॥ ३॥ |
| कृत्वा कुशलसंप्रश्नमुपविष्टं सुखासने।<br>शुकं व्याससुतं शान्तं पर्यपृच्छत पार्थिवः॥ ४<br>किं निमित्तं महाभाग निःस्पृहस्य च मां प्रति।<br>जातं ह्यागमनं ब्रूहि कार्यं तन्मुनिसत्तम॥ ५ | इस प्रकार कुशल-प्रश्न करके सुखदायी आसनपर बैठे हुए शान्तचित्तवाले व्यासपुत्र शुकदेवजीसे महाराज जनकने पूछा—हे महाभाग! मेरे यहाँ आप निःस्पृहका आगमन किस कारण हुआ? हे मुनिश्रेष्ठ! उस प्रयोजन को बताइये?॥ ४-५॥ |
| शुक उवाच | शुकदेवजी बोले— |
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| व्यासेनोक्तो महाराज कुरु दारपरिग्रहम्।<br>सर्वेषामाश्रमाणां च गृहस्थाश्रम उत्तमः॥ ६<br>मया नाङ्गीकृतं वाक्यं मत्वा बन्धं गुरोरपि।<br>न बन्धोऽस्तीति तेनोक्तो नाहं तत्कृतवान्पुनः॥ ७ | महाराज! मेरे पिता व्यासजीने मुझसे कहा कि विवाह कर लो; क्योंकि सब आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही श्रेष्ठ है। गुरुरूप पिताकी आज्ञाको बन्धनकारक मानकर मैंने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने समझाया कि गृहस्थाश्रम बन्धन नहीं है, फिर भी मैंने उसे स्वीकार नहीं किया॥ ६-७॥ |
| इति सन्दिग्धमनसं मत्वा स मुनिसत्तमः।<br>उवाच वचनं तथ्यं मिथिलां गच्छ मा शुचः॥ ८<br>याज्योऽस्ति जनकस्तत्र जीवन्मुक्तो नराधिपः।<br>विदेहो लोकविदितः पाति राज्यमकण्टकम्॥ ९ | इस प्रकार मुझे संशययुक्त चित्तवाला समझकर मुनिश्रेष्ठ व्यासने तथ्ययुक्त वचन कहा—तुम मिथिला चले जाओ, खेद न करो। वहाँ राजर्षि जनक रहते हैं, वे याज्ञिक एवं जीवन्मुक्त राजा हैं। संसारमें विदेह नामसे विख्यात वे वहाँ निष्कण्टक राज्य कर रहे हैं॥ ८-९॥ |
| कुर्वन् राज्यं तथा राजा मायापाशैर्न बध्यते।<br>त्वं बिभेषि कथं पुत्र वनवृत्तिः परन्तप॥ १० | हे पुत्र! महाराज जनक राज्य करते हुए भी मायाके जालमें नहीं बँधते, तब हे परन्तप! तुम वनवासी होते हुए भी क्यों भयभीत हो रहे हो?॥ १०॥ |
| पश्य तं नृपशार्दूलं त्यज मोहं मनोगतम्।<br>कुरु दारान्महाभाग पृच्छ वा भूपतिं च तम्॥ ११<br>सन्देहं ते मनोजातं कथयिष्यति पार्थिवः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मामेहि तरसा सुत॥ १२ | उन नृपश्रेष्ठ विदेहको देखो और अपने मनमें उठते हुए मोहका त्याग करो। हे महाभाग! विवाह करो, अन्यथा जाकर उन राजासे ही पूछो। वे राजा तुम्हारे मनमें उत्पन्न सन्देहका समाधान कर देंगे। तत्पश्चात् हे पुत्र! उनकी बात सुनकर तुम शीघ्र ही मेरे पास चले आना॥ ११-१२॥ |