देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १६२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| जनक उवाच | जनकजी बोले— |
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| इन्द्रियाणि बलिष्ठानि न नियुक्तानि मानद।<br>अपक्वस्य प्रकुर्वन्ति विकारांस्ताननेकंशः॥ २४ | हे मानद! इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् होती हैं, वे वशमें नहीं रहतीं। वे अपरिपक्व बुद्धिवाले मनुष्यके मनमें नाना प्रकारके विकार उत्पन्न कर देती हैं॥ २४॥ |
| भोजनेच्छां सुखेच्छां च शय्येच्छामात्मजस्य च।<br>यती भूत्वा कथं कुर्याद्विकारे समुपस्थिते॥ २५ | यदि मनुष्यके मनमें भोजनकी, शयनकी, सुखकी और पुत्रकी इच्छा बनी रहे तो वह संन्यासी होकर भी इन विकारोंके उपस्थित होनेपर क्या कर पायेगा?॥ २५॥ |
| दुर्जयं वासनाजालं न शान्तिमुपयाति वै।<br>अतस्तच्छमनार्थाय क्रमेण च परित्यजेत्॥ २६ | वासनाओंका जाल बड़ा ही कठिन होता है, वह शीघ्र नहीं मिटता। इसलिये उसकी शान्तिके लिये मनुष्यको क्रमसे उसका त्याग करना चाहिये॥ २६॥ |
| ऊर्ध्वं सुप्तः पतत्येव न शयानः पतत्यधः।<br>परिव्रज्य परिभ्रष्टो न मार्गं लभते पुनः॥ २७ | ऊँचे स्थानपर सोनेवाला मनुष्य ही नीचे गिरता है, नीचे सोनेवाला कभी नहीं गिरता। यदि संन्यास-ग्रहण कर लेनेपर भ्रष्ट हो जाय तो पुनः वह कोई दूसरा मार्ग नहीं प्राप्त कर सकता॥ २७॥ |
| यथा पिपीलिका मूलाच्छाखायामधिरोहति।<br>शनैः शनैः फलं याति सुखेन पदगामिनी॥ २८<br><br>विहङ्गमस्तरसा याति विघ्नशङ्कामुदस्य वै।<br>श्रान्तो भवति विश्रम्य सुखं याति पिपीलिका॥ २९ | जिस प्रकार चींटी वृक्षकी जड़से चढ़कर शाखापर चढ़ जाती है और वहाँसे फिर धीरे-धीरे सुखपूर्वक पैरोंसे चलकर फलतक पहुँच जाती है। विघ्न-शंकाके भयसे कोई पक्षी बड़ी तीव्र गतिसे आसमानमें उड़ता है और [परिणामतः] थक जाता है, किंतु चींटी सुखपूर्वक विश्राम ले-लेकर [अपने अभीष्ट स्थानपर] पहुँच जाती है॥ २८-२९॥ |
| मनस्तु प्रबलं काममजेयमकृतात्मभिः।<br>अतः क्रमेण जेतव्यमाश्रमानुक्रमेण च॥ ३० | मन अत्यन्त प्रबल है; यह अजितेन्द्रिय पुरुषोंके द्वारा सर्वथा अजेय है। इसलिये आश्रमोंके अनुक्रमसे ही इसे क्रमशः जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ३०॥ |
| गृहस्थाश्रमसंस्थोऽपि शान्तः सुमतिरात्मवान्।<br>न च हृष्येन्न च तपेल्लाभालाभे समो भवेत्॥ ३१ | गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी जो शान्त, बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होता है, वह न तो प्रसन्न होता है और न खेद करता है। वह हानि-लाभमें समान भाव रखता है॥ ३१॥ |
| विहितं कर्म कुर्वाणस्त्यजंश्चिन्तान्वितं च यत्।<br>आत्मलाभेन सन्तुष्टो मुच्यते नात्र संशयः॥ ३२ | जो पुरुष शास्त्रप्रतिपादित कर्म करता हुआ, सभी प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त रहता हुआ आत्मचिन्तनसे सन्तुष्ट रहता है; वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है॥ ३२॥ |
| पश्याहं राज्यसंस्थोऽपि जीवन्मुक्तो यथानघ।<br>विचरामि यथाकामं न मे किञ्चित्प्रजायते॥ ३३ | हे अनघ! देखिये, मैं राजकार्य करता हुआ भी जीवन्मुक्त हूँ; मैं अपने इच्छानुसार सब काम करता हूँ, किंतु मुझे शोक या हर्ष कुछ भी नहीं होता॥ ३३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 B