देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १८ ] | प्रथम स्कन्ध | १६३ |
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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ | | भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br> भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | |
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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? |
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भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ |
| कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ | ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥ |
| आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६ | आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ? |
| मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७ | हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥ |
| भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८ | सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। |
| न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९ | हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥ |
| शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४० | आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥ |
| शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१ | शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥ |
| जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२ | ‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥ |
| अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३ | हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥ |
| विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४ | धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C
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शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्माorसदैवात्मा? In the image:शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा(wait, let's look atसदैवार्त्मा- there is no repha, it isसदैवात्मा).तस्मिञ्छान्ते- yes,तस्मिञ्छान्ते.गम्योऽनुमानेन- yes.यद्दृश्यमदृश्यं- yes.ह्यस्मिन्सर्वं- yes.सम्भवेद् द्वैतदर्शनात्- yes.विनातपं- yes.विद्या चैतन्निवर्तनम्- yes.
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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकResource? No: <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ | | कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ | ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥ | | आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६ | आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ? | | मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७ | हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥ | | भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८ | सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। | | न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९ | हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥ | | शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४० | आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥ | | शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१ | शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥ | | जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२ | ‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥ | | अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३ | हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥ | | विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४ | धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C