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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २१] तृतीय स्कन्ध ३५१

अ० २१] तृतीय स्कन्ध ३५१

न मे सैन्यबलं तादृङ्न दुर्गबलमद्भुतम्।<br>येनाहं नृपतीन्सर्वान् प्रत्यादेष्टुमिहोत्सहे॥ ४मेरे पास न तो वैसा सैन्यबल है और न तो सुरक्षार्थ अद्भुत किला ही है, जिससे मैं इस समय उन सभीको पराजित कर सकूँ॥ ४॥
सुदर्शनस्तथैकाकी ह्यसहायोऽधनः शिशुः।<br>किं कर्तव्यं निमग्नोऽहं सर्वथा दुःखसागरे॥ ५यह बालक सुदर्शन भी निस्सहाय, निर्धन तथा अकेला है। मैं तो हर तरहसे दुःखसागरमें डूब चुका हूँ। अब मुझे इस समय क्या करना चाहिये?॥ ५॥
इति चिन्तापरो राजा जगाम नृपसन्निधौ।<br>प्रणम्य तानुवाचाथ प्रश्रयावनतो नृपः॥ ६इस प्रकार चिन्ताकुल राजा सुबाहु राजाओंके पास गये और उन सबको प्रणाम करके अत्यन्त विनीतभावसे उन्होंने कहा—हे महाराजाओ! अब मैं क्या करूँ? मेरे तथा अपनी माताके द्वारा बहुत प्रेरित किये जानेपर भी मेरी पुत्री मण्डपमें नहीं आ रही है॥ ६-७॥
किं कर्तव्यं नृपाः कामं नैति मे मण्डपे सुता।<br>बहुशः प्रेर्यमाणापि सा मात्रापि मयापि च॥ ७
मूर्ध्ना पतामि पादेषु राज्ञां दासोऽस्मि साम्प्रतम्।<br>पूजादिकं गृहीत्वाद्य व्रजन्तु सदनानि वः॥ ८मैं आपलोगोंका दास हूँ और सभी राजाओंके चरणोंपर अपना सिर रखकर निवेदन करता हूँ कि आपलोग पूजा-सत्कार ग्रहण करके इस समय अपने-अपने घर लौट जायें॥ ८॥
ददामि बहुरत्नानि वस्त्राणि च गजान् रथान्।<br>गृहीत्वाद्य कृपां कृत्वा व्रजन्तु भवनान्युत॥ ९मैं आपलोगोंको बहुत-से रत्न, वस्त्र, हाथी तथा रथ देता हूँ। इन्हें स्वीकारकर कृपा करके आपलोग अपने-अपने भवन चले जायें॥ ९॥
न वशे मे सुता बाला यदि म्रियेत खेदिता।<br>तदा मे स्यान्महद्दुःखं तेन चिन्तातुरोऽस्म्यहम्॥ १०मेरी पुत्री मेरे वशमें नहीं है। यदि वह बेचारी खिन्न होकर मर गयी तो मुझे महान् दुःख होगा। इसीसे मैं अत्यन्त चिन्तित हूँ॥ १०॥
भवन्तः करुणावन्तो महाभाग्या महौजसः।<br>किमेतया दुहित्रा मे मन्दया दुर्विनीतया॥ ११आपलोग बड़े दयालु, भाग्यवान् तथा महान् तेजस्वी हैं तो फिर मेरी इस मन्द बुद्धिवाली अविनीत कन्यासे आपलोगोंको क्या लाभ होगा?॥ ११॥
अनुग्राह्योऽस्मि वः कामं दासोऽहमिति सर्वथा।<br>सुता सुतेव मन्तव्या भवद्भिः सर्वथा मम॥ १२मैं आपलोगोंका हर तरहसे सेवक हूँ, अतएव आपलोग मुझपर कृपा करें। आप सभी लोग मेरी इस पुत्रीको अपनी ही पुत्री समझें॥ १२॥
व्यास उवाच<br>श्रुत्वा सुबाहुवचनं नोचुः केचन भूमिपाः।<br>युधाजित्क्रोधताम्राक्षस्तमुवाच रुषान्वितः॥ १३व्यासजी बोले—[हे राजन्!] सुबाहुका वचन सुनकर अन्य राजागण तो नहीं बोले, किंतु क्रोधसे आँखें लाल करके युधाजित्ने उनसे रोषपूर्वक कहा—
राजन् मूर्खोऽसि किं ब्रूषे कृत्वा कार्यं सुनिन्दितम्।<br>स्वयंवरः कथं मोहाद्रचितः संशये सति॥ १४हे राजन्! आप तो बड़े मूर्ख हैं। ऐसा निन्दनीय कृत्य करनेके बाद भी आप कैसे इस प्रकारकी बात बोल रहे हैं? यदि संशयकी स्थिति थी तो आपने अज्ञानतावश स्वयंवरका आयोजन ही क्यों किया?॥ १३-१४॥
३५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मिलिता भूभुजः सर्वे त्वयाहूताः स्वयंवरे।<br>कथमद्य नृपा गन्तुं योग्यास्ते स्वगृहान्प्रति ॥ १५आपके बुलानेपर ही सभी राजा स्वयंवरमें पधारे हुए हैं तो फिर वे सुयोग्य राजागण यों ही अपने-अपने घर कैसे चले जायँ ? ॥ १५ ॥
अवमान्य नृपान्सर्वांस्त्वं किं सुदर्शनाय वै।<br>दातुमिच्छसि पुत्रीञ्च किमनार्यमतः परम् ॥ १६क्या आप सभी राजाओंका अपमान करके सुदर्शनको अपनी कन्या देना चाहते हैं ? इससे बढ़कर नीचताकी और क्या बात होगी ? ॥ १६ ॥
विचार्य पुरुषेणादौ कार्यं वै शुभमिच्छता।<br>आरब्धव्यं त्वया तत्तु कृतं राजन्नजानता ॥ १७अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले ही सोच-समझकर कोई कार्य प्रारम्भ करना चाहिये। किंतु हे राजन् ! आपने तो बिना सोचे-समझे ही यह आयोजन कर डाला ॥ १७ ॥
एतान्विहाय नृपतीन्बलवाहनसंयुतान्।<br>वरं सुदर्शनं कर्तुं कथमिच्छसि साम्प्रतम् ॥ १८सेना तथा वाहनोंसे सम्पन्न इन राजाओंको छोड़कर इस समय आप सुदर्शनको अपना जामाता क्यों बनाना चाहते हैं ? ॥ १८ ॥
अहं त्वां हन्मि पापिष्ठं तथा पश्चात्सुदर्शनम्।<br>दौहित्रायाद्य ते कन्यां दास्यामीति विनिश्चयः ॥ १९[उसने क्रोधपूर्वक आगे कहा— ] मैं तुझ पापीको अभी मार डालूँगा और बादमें सुदर्शनका भी वध कर दूँगा। तत्पश्चात् तुम्हारी कन्याका विवाह अपने नाती शत्रुजित्से कर दूँगा; इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १९ ॥
मयि तिष्ठति कोन्योऽस्ति यः कन्यां हर्तुमिच्छति।<br>सुदर्शनः कियानद्य निर्धनो निर्बलः शिशुः ॥ २०ऐसा दूसरा कौन व्यक्ति है जो मेरे रहते कन्याके हरणकी इच्छा तक कर ले और सुदर्शन तो अत्यन्त निर्धन, बलहीन तथा बच्चा है ॥ २० ॥
भारद्वाजाश्रमे पूर्वं मुक्तो मुनिकृते मया।<br>नाद्याहं मोचयिष्यामि सर्वथा जीवितं शिशोः ॥ २१यह सुदर्शन पूर्वमें जब भारद्वाजमुनिके आश्रममें था तभी मैं उसे मार डालता, किंतु मुनिके कहनेसे मैंने उसे छोड़ दिया था। किंतु आज किसी भी तरह इस बालकके प्राण नहीं छोड़ूँगा ॥ २१ ॥
तस्माद्विचार्य सम्यक्त्वं पुत्र्या च भार्यया सह।<br>दौहित्राय प्रियां कन्यां देहि मे सुभ्रुवं किल ॥ २२<br><br>सम्बन्धी भव दत्त्वा त्वं पुत्रीमेतां मनोरमाम्।<br>उच्चाश्रयः प्रकर्तव्यः सर्वदा शुभमिच्छता ॥ २३अब तुम अपनी स्त्री और पुत्रीके साथ भलीभाँति विचार-विमर्श करके सुन्दर भौंहोंवाली अपनी कन्या मेरे दौहित्र शत्रुजित्को प्रदान कर दो। इस प्रकार अपनी इस सुन्दर पुत्रीको देकर तुम मेरे सम्बन्धी हो जाओ; क्योंकि अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको सर्वदा बड़ोंसे ही सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥
सुदर्शनाय दत्त्वा त्वं पुत्रीं प्राणप्रियां शुभाम्।<br>एकाकिनेऽप्यराज्याय किं सुखं प्राप्तुमिच्छसि ॥ २४तुम अकेले और राज्यहीन सुदर्शनको अपनी प्राणप्रिय, सुन्दर कन्या देकर क्या सुख चाहते हो ?
( कुलं वित्तं बलं रूपं राज्यं दुर्गं सुहृज्जनम्।<br>दृष्ट्वा कन्या प्रदातव्या नान्यथा सुखमृच्छति ॥ )(वरके कुल, धन, बल, रूप, राज्य, दुर्ग और सगे-सम्बन्धियोंको देखनेके बाद ही उसे अपनी कन्या देनी चाहिये, अन्यथा सुख नहीं मिलता है)

अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५३

अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
परिचिन्त्य धर्मं त्वं राजनीतिञ्च शाश्वतीम्।<br>कुरु कार्यं यथायोग्यं मा कृथा मतिमन्यथा॥ २५तुम धर्म तथा शाश्वत राजनीतिपर सम्यक् विचार कर लो, तत्पश्चात् यथोचित कार्य करो; इसके विपरीत कोई दूसरा विचार मत करो॥ २४-२५॥
सुहृदसि ममात्यर्थं हितं ते प्रब्रवीम्यहम्।<br>समानय सुतां राजन् मण्डपे तां सखीवृताम्॥ २६तुम मेरे परम मित्र हो, इसलिये तुम्हारे हितकी बात बता देता हूँ। अब तुम अपनी कन्याको उसकी सखियोंसहित स्वयंवर-मण्डपमें ले आओ॥ २६॥
सुदर्शनमृते चेयं वरिष्यति यदाप्यसौ।<br>विग्रहो मे तदा न स्याद्विवाहोऽस्तु तवेप्सितः॥ २७<br><br>अन्ये नृपतयः सर्वे कुलीनाः सबलाः समाः।<br>विरोधः कीदृशस्तेवं वृणोद्यदि नृपोत्तम॥ २८<br><br>अन्यथाहं हरिष्येऽद्य बलात्कन्यामिमां शुभाम्।<br>मा विरोधं सुदुःसाध्यं गच्छ पार्थिवसत्तम॥ २९यदि वह सुदर्शनको छोड़कर किसी दूसरेका वरण कर लेगी तो इसमें मुझे विरोध नहीं होगा। आप अपने इच्छानुसार उसके साथ विवाह कर दीजियेगा। हे राजेन्द्र! अन्य सभी नरेश कुलीन, शक्तिशाली एवं हर तरहसे समान हैं। अतः यदि इनमेंसे किसीको भी वह कन्या चुन लेती है तो विरोध ही क्या है? अन्यथा मैं बलपूर्वक आज ही इस सुन्दर कन्याका हरण कर लूँगा। हे नृपश्रेष्ठ! जाओ, इस कार्यको सुसम्पन्न करो और इस असाध्य कलहमें मत पड़ो॥ २७-२९॥
व्यास उवाच<br>युधाजिता समादिष्टः सुबाहुः शोकसंयुतः।<br>निःश्वसन्भवनं गत्वा भार्यां प्राह शुचावृतः॥ ३०<br><br>पुत्रीं ब्रूहि सुधर्मज्ञे कलहे समुपस्थिते।<br>किं कर्तव्यं मया शक्यं त्वद्वशोऽस्मि सुलोचने॥ ३१व्यासजी बोले— उस समय युधाजित्का यह आदेश पाकर सुबाहु शोकाकुल हो उठे और दीर्घ श्वास लेते हुए महलमें जाकर दुःखित हो अपनी पत्नीसे कहने लगे—हे सुधर्मज्ञे! हे सुनयने! अब पुत्रीसे कहो—‘स्वयंवर-सभामें इस समय घोर कलह उपस्थित हो जानेपर मुझे क्या करना चाहिये? मैं स्वयं कुछ नहीं कर सकता; क्योंकि मैं तो तुम्हारे वशमें हूँ’॥ ३०-३१॥
व्यास उवाच<br>सा श्रुत्वा पतिवाक्यं तु गत्वा प्राह सुतान्तिकम्।<br>वत्से राजातिदुःखार्तः पिता तेऽद्यापि वर्तते॥ ३२<br><br>त्वदर्थे विग्रहः कामं समुत्पन्नोऽद्य भूभृताम्।<br>अन्यं वरय सुश्रोणि सुदर्शनमृते नृपम्॥ ३३व्यासजी बोले— पतिकी यह बात सुनकर रानी अपनी पुत्रीके पास जाकर बोली—पुत्रि! तुम्हारे पिता राजा सुबाहु इस समय अत्यन्त दुःखी हैं। तुम्हारे लिये आये हुए नरेशोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हो गया है, इसलिये हे सुश्रोणि! तुम सुदर्शनको छोड़कर अन्य किसी राजकुमारका वरण कर लो॥ ३२-३३॥
यदि सुदर्शनं वत्से हठात्त्वं वै वरिष्यसि।<br>युधाजित्त्वां च मां चैव हनिष्यति बलान्वितः॥ ३४<br><br>सुदर्शनं च राजासौ बलमत्तः प्रतापवान्।<br>द्वितीयस्ते पतिः पश्चाद्भविता कलहे सति॥ ३५<br>तस्मात्सुदर्शनं त्यक्त्वा वरयान्यं नृपोत्तमम्।हे वत्से! यदि तुम हठ करके सुदर्शनका ही वरण करोगी तो सैन्यबलयुक्त, प्रतापी तथा बलशाली वह युधाजित् तुमको, सुदर्शनको और हमलोगोंको मार डालेगा। तत्पश्चात् कलह हो जानेपर कोई दूसरा ही तुम्हारा पति होगा। अतः हे मृगलोचने! यदि तुम मेरा और अपना हित चाहती हो तो सुदर्शनको छोड़कर किसी अन्य श्रेष्ठ राजाका वरण कर लो॥ ३४-३५ ½॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 A

३५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २१

| सुखमिच्छसि चेन्मह्यं तुभ्यं वा मृगलोचने।<br>इति मात्रा बोधितां तां पश्चाद्राजाप्यबोधयत्॥ ३६<br>उभयोर्वचनं श्रुत्वा निर्भयोवाच कन्यका। | इस प्रकार माताके समझानेके बाद पिताने भी उसे समझाया। उन दोनोंकी बातें सुनकर कन्या शशिकला निर्भय होकर कहने लगी॥ ३६ १/२॥ | | कन्योवाच<br>सत्यमुक्तं नृपश्रेष्ठ जानासि च व्रतं मम॥ ३७<br>नान्यं वृणोमि भूपाल सुदर्शनमृते क्वचित्।<br>विभेषि यदि राजेन्द्र नृपेभ्यः किल कातरः॥ ३८<br>सुदर्शनाय दत्त्वा मां विसर्जय पुराद्वहिः।<br>स मां रथे समारोप्य निर्गमिष्यति ते पुरात्॥ ३९<br>भवितव्यं तु पश्चाद्वै भविष्यति न चान्यथा।<br>नात्र चिन्ता त्वया कार्या भवितव्ये नृपोत्तम॥ ४०<br>यद्भावि तद्भवत्येव सर्वथात्र न संशयः। | कन्या बोली—हे नृपश्रेष्ठ! आप ठीक कह रहे हैं किंतु आप मेरे प्रणको तो जानते ही हैं। हे राजन्! मैं सुदर्शनको छोड़कर और किसीका भी वरण नहीं कर सकती। हे राजेन्द्र! यदि आप राजाओंसे डरते हैं और बहुत घबड़ाये हुए हैं तो मुझे सुदर्शनको सौंपकर नगरसे बाहर कर दीजिये। वे मुझे रथपर बैठाकर आपके नगरसे बाहर निकल जायँगे। हे नृपश्रेष्ठ! जो होना है वह तो बादमें अवश्य होगा; इसके विपरीत नहीं होगा। अब आप होनीके विषयमें चिन्ता न करें; क्योंकि जो होना है वह तो निश्चितरूपसे होता ही है; इसमें संशय नहीं है॥ ३७—४० १/२॥ | | राजोवाच<br>न पुत्रि साहसं कार्यं मतिमद्भिः कदाचन॥ ४१<br>बहुभिर्न विरोद्धव्यमिति वेदविदो विदुः।<br>विस्रक्ष्यामि कथं कन्यां दत्त्वा राजसुताय च॥ ४२<br>राजानो वैरसंयुक्ताः किन्नु कुर्युःसाम्प्रतम्।<br>यदि ते रोचते वत्से पणं संविदधाम्यहम्॥ ४३<br>जनकेन यथा पूर्वं कृतः सीतास्वयंवरे।<br>शैव धनुर्यथा तेन धृतं कृत्वा पणं तथा॥ ४४<br>तथाहमपि तन्वङ्गि करोम्यद्य दुरासदम्।<br>विवादो येन राज्ञां वै कृते सति शमं व्रजेत्॥ ४५<br>पालयिष्यति यः कामं स ते भर्ता भविष्यति।<br>सुदर्शनस्तथान्य वा यः कश्चिद् बलवत्तरः॥ ४६<br>पालयित्वा पणं त्वां वै वरयिष्यति सर्वथा।<br>एवं कृते नृपाणां तु विवादः शमितो भवेत्॥ ४७<br>सुखेनाहं विवाहं ते करिष्यामि ततः परम्। | राजा बोले—हे पुत्रि! बुद्धिमानोंको कभी ऐसा साहस नहीं करना चाहिये। वेदज्ञोंने कहा है कि बहुतोंसे विरोध नहीं करना चाहिये। पुत्रीको उस राजकुमारको सौंपकर कैसे विदा कर दूँ? मुझसे वैर साधे हुए ये राजागण न जाने कौन-सा अनिष्ट कर डालेंगे। इसलिये हे पुत्रि! यदि तुम पसन्द करो तो मैं कोई शर्त रख दूँ, जैसा कि पूर्वकालमें राजा जनकने सीतास्वयंवरमें किया था। हे तन्वंगि! जैसे उन्होंने शिव-धनुष तोड़नेकी शर्त रख दी थी, वैसे ही मैं भी कोई ऐसी कठोर शर्त रख दूँ जिससे ऐसा कर देनेपर राजाओंका विवाद ही समाप्त हो जाय। जो उस प्रतिज्ञाको पूरा करेगा, वही तुम्हारा पति होगा। सुदर्शन हो अथवा कोई दूसरा—जो भी अधिक बलशाली होगा, वह मेरी प्रतिज्ञा पूरी करके तुम्हारा वरण कर लेगा। ऐसा करनेसे राजाओंमें उत्पन्न कलह निश्चितरूपसे शान्त हो जायगा और उसके बाद मैं आनन्दपूर्वक तुम्हारा विवाह कर दूँगा॥ ४१—४७ १/२॥ | | कन्योवाच<br>सन्देहे नैव मज्जामि मूर्खकृत्यमिदं यतः॥ ४८<br>मया सुदर्शनः पूर्वं धृतश्चेतसि नान्यथा।<br>कारणं पुण्यपापानां मन एव महीपते॥ ४९ | कन्या बोली—मैं इस सन्दिग्ध कार्यमें नहीं पहूँगी; क्योंकि यह मूर्खोंका काम है। मैंने अपने मनमें सुदर्शनका पहलेसे ही वरण कर लिया है, अब दूसरेको स्वीकार नहीं कर सकती। हे महाराज! पुण्य तथा पापका कारण तो मन ही है। इसलिये हे |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 B

अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५५

अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५५

मनसा विधृतं त्यक्त्वा कथमन्यं वृणे पितः।<br>कृते पणे महाराज सर्वेषां वशगा ह्यहम्॥ ५०<br><br>एकः पालयिता द्वौ वा बहवो वा भवन्ति चेत्।<br>किं कर्तव्यं तदा तात विवादे समुपस्थिते॥ ५१<br><br>संशयाधिष्ठिते कार्ये मतिं नाहं करोम्यतः।<br>मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र देहि सुदर्शनाय माम्॥ ५२<br><br>विवाहं विधिना कृत्वा शं विधास्यति चण्डिका।<br>यन्नामकीर्तनादेव दुःखौघो विलयं व्रजेत्॥ ५३<br><br>तां स्मृत्वा परमां शक्तिं कुरु कार्यमतन्द्रितः।पिताजी! मनसे वरण किये गये सुदर्शनको छोड़कर मैं दूसरेका वरण कैसे करूँ? हे महाराज! दूसरी बात यह भी है कि पणस्वयंवर करनेमें मुझे सबके अधीन रहना पड़ेगा। हे तात! यदि इनमेंसे एक, दो या अनेकने आपका प्रण पूरा कर दिया तब उस समय विवादकी स्थिति उत्पन्न हो जानेपर आप क्या करेंगे? अतः मैं किसी संशयात्मक कार्यमें पड़ना नहीं चाहती। हे राजेन्द्र! आप चिन्ता न करें और विधिपूर्वक मेरा विवाह करके मुझे सुदर्शनको सौंप दीजिये। जिनके नामका संकीर्तन करनेसे समस्त दुःखराशि विलीन हो जाती है, वे भगवती चण्डिका अवश्य कल्याण करेंगी। अब आप उन्हीं महाशक्तिका स्मरण करके पूरी तत्परताके साथ यह कार्य कीजिये॥ ४८—५३ १/२॥
गत्वा वद नृपेभ्यस्त्वं कृताञ्जलिपुटोऽद्य वै॥ ५४<br><br>आगन्तव्यञ्च श्वः सर्वैरिह भूपैः स्वयंवरे।<br>इत्युक्त्वा त्वं विसृज्याशु सर्वं नृपतिमण्डलम्॥ ५५<br><br>विवाहं कुरु रात्रौ मे वेदोक्तविधिना नृप।<br>पारिबर्हं यथायोग्यं दत्त्वा तस्मै विसर्जया॥ ५६अभी जा करके दोनों हाथ जोड़कर आप उन राजाओंसे कहिये कि आप सभी राजागण इस स्वयंवरमें कल पधारें। ऐसा कहकर सम्पूर्ण राजसमुदायको शीघ्र ही विसर्जित करके वैदिक रीतिसे सुदर्शनके साथ रातमें मेरा विवाह कर दीजिये। हे राजन्! तत्पश्चात् उन्हें यथोचित उपहार देकर विदा कर दीजिये॥ ५४—५६॥
गमिष्यति गृहीत्वा मां ध्रुवसन्धिंसुतः किल।<br>कदाचित्ते नृपाः क्रुद्धाः संग्रामं कर्तुमुद्यताः॥ ५७<br><br>भविष्यन्ति तदा देवी साहाय्यं नः करिष्यति।<br>सोऽपि राजसुतस्तैस्तु संग्रामं संविधास्यति॥ ५८<br><br>दैवान्मृधे मृते तस्मिन्मरिष्याम्यहमप्युत।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गृहे तिष्ठ दत्त्वा मां सहसैन्यकः॥ ५९<br><br>एकैवाहं गमिष्यामि तेन सार्धं रिरंसया।तदनन्तर महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन मुझे साथ लेकर चले जायेंगे। इससे कुपित हुए राजा यदि युद्ध करनेको उद्यत होंगे तो उस समय भगवती हमारी सहायता करेंगी, जिससे वे राजकुमार सुदर्शन भी उन लोगोंके साथ संग्राम करनेमें अवश्य समर्थ होंगे। दैवयोगसे यदि वे युद्धमें मारे गये तो मैं प्राण त्याग दूँगी। आपका कल्याण हो। आप मुझे सुदर्शनको सौंपकर अपनी सेनाके साथ महलमें सुखपूर्वक रहें। मैं भी विहार करनेकी कामनासे उनके साथ अकेली ही चली जाऊँगी॥ ५७—५९ १/२॥
व्यास उवाच<br>इति तस्या वचः श्रुत्वा राजासौ कृतनिश्चयः।<br>मतिं चक्रे तथाकर्तुं विश्वासं प्रतिपद्य च॥ ६०व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उस शशिकलाका वचन सुनकर दृढ़प्रतिज्ञ राजा सुबाहुने उसे पूर्णरूपसे विश्वस्त करके ठीक वैसा ही करनेका निश्चय कर लिया॥ ६०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कन्यया स्वपितरं प्रति सुदर्शनेन सह विवाहार्थकथनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥

~~ ० ~~

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 C

३५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २२

अथ द्वाविंशोऽध्यायः

शशिकलाका गुप्त स्थानमें सुदर्शनके साथ विवाह, विवाहकी बात जानकर राजाओंका सुबाहुके प्रति क्रोध प्रकट करना तथा सुदर्शनका मार्ग रोकनेका निश्चय करना

व्यास उवाच
श्रुत्वा सुतावाक्यमनिन्दितात्मा<br>नृपांश्च गत्वा नृपतिर्जगाद।<br>व्रजन्तु कामं शिविराणि भूपाः<br>श्वो वा विवाहं किल संविधास्ये॥ १ ॥**व्यासजी बोले—**पवित्र अन्तःकरणवाले राजा सुबाहु कन्याकी बात सुनकर राजाओंके पास जाकर बोले—हे महाराजाओ! आपलोग इस समय अपने-अपने शिविरमें जायें, मैं कन्याका विवाह कल करूँगा॥ १ ॥
भक्ष्याणि पेयानि मयार्पितानि<br>गृह्णन्तु सर्वे मयि सुप्रसन्नाः।<br>श्वो भावि कार्यं किल मण्डपेऽत्र<br>समेत्य सर्वैरिह संविधेयम्॥ २ ॥आपलोग मुझपर कृपा करके मेरे द्वारा अर्पित की गयी भोज्य वस्तुएँ स्वीकार करें। अब यह विवाहकार्य कल पुनः इसी स्वयंवर-मण्डपमें होगा। हम सब मिलकर उसे सम्पन्न करेंगे॥ २ ॥
नायाति पुत्री किल मण्डपेऽद्य<br>करोमि किं भूपतयोऽत्र कामम्।<br>प्रातः समाश्वास्य सुतां नयिष्ये<br>गच्छन्तु तस्माच्छिविराणि भूपाः॥ ३ ॥हे नृपतिगण! आज मेरी पुत्री मण्डपमें नहीं आ रही है। मैं क्या करूँ? कल प्रातः पुत्रीको समझा-बुझाकर अवश्य लाऊँगा। अब सभी राजागण अपने-अपने शिविरमें चलें। बुद्धिमानोंको अपने आश्रितजनोंके प्रति विरोधभाव नहीं रखना चाहिये और अपनी सन्तानपर तो निरन्तर विशेष कृपा करनी चाहिये। हे नृपगण! प्रातःकाल समझा-बुझाकर मैं अपनी पुत्रीको यहाँ ले आऊँगा; इस समय आपलोग जायें॥ ३-४॥
न विग्रहो बुद्धिमतां निजाश्रिते<br>कृपा विधेया सततं ह्यपत्ये।<br>विधाय तां प्रातरिहानयिष्ये<br>सुतां तु गच्छन्तु नृपा यथेष्टम्॥ ४ ॥
इच्छापणं वा परिचिन्त्य चित्ते<br>प्रातः करिष्याम्यथ संविवाहम्।<br>सर्वैः समेत्यात्र नृपैः समेतैः<br>स्वयंवरः सर्वमतेन कार्यः॥ ५ ॥मैं इच्छास्वयंवरकी बातको भलीभाँति सोचकर प्रातः कन्याका विवाह कर दूँगा। एक साथ सभी राजाओंके उपस्थित हो जानेपर सबकी सम्मतिसे स्वयंवरका कार्य सम्पन्न होगा॥ ५॥
श्रुत्वा नृपास्तेऽवितथं विदित्वा<br>वचो ययुः स्वानि निकेतनानि।<br>विधाय पार्श्वे नगरस्य रक्षां<br>चक्रुः क्रिया मध्यदिनोदिताश्च॥ ६ ॥सुबाहुकी वाणी सुनकर सभी राजागण उसे सच मानकर अपने-अपने शिविरमें चले गये और नगरके आस-पास रक्षाका सम्यक् प्रबन्ध करके वे मध्याह्नकालकी क्रियाओंमें संलग्न हो गये॥ ६॥
सुबाहुरप्यार्यजनैः समेत-<br>श्चकार कार्याणि विवाहकाले।<br>पुत्रीं समाहूय गृहे सुगुप्ते<br>पुरोहितैर्वेदविदां वरिष्ठैः॥ ७ ॥उधर राजा सुबाहु भी श्रेष्ठजनोंके साथ अपने अन्तःपुरके एक गुप्त स्थानमें अपनी पुत्रीको बुलाकर वरिष्ठ वैदिक पुरोहितोंद्वारा विवाह-कृत्य सम्पन्न करनेका प्रयत्न करने लगे॥ ७॥
स्नानादिकं कर्म वरस्य कृत्वा<br>विवाहभूषाकरणं तथैव।<br>आनाय्य वेदीरचिते गृहे वै<br>तस्यार्हणां भूमिपतिश्चकार॥ ८ ॥वरको स्नानादि कर्म कराकर उसे विवाहके योग्य वस्त्राभूषण पहनाकर और उसे वेदीरचित गृहमें ले आकर राजा सुबाहुने उसका पूजन किया॥ ८॥

1897 श्रीमद्देवी...महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 D

अ० २२ ]तृतीय स्कन्ध३५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सविष्टरं चाचमनीयमर्घ्यं<br>वस्त्रद्वयं गामथ कुण्डले द्वे।<br>समर्प्य तस्मै विधिवन्नरेन्द्र<br>ऐच्छत्सुतादानमहीनमत्त्वः ॥ ९वरको विष्टर, आचमन, अर्घ्य, दो वस्त्र, गौ और दो कुण्डल विधिवत् प्रदान करके महामनस्वी राजा सुबाहुने कन्यादान कर दिया ॥ ९ ॥
सोऽप्यग्रहीत्सर्वमदीनचेताः<br>शशाम चिन्ताथ मनोरमायाः।<br>कन्यां सुकेशीं निधिकन्यकासमां<br>मेने तदात्मानमनुत्तमञ्च ॥ १०उदार हृदयवाले सुदर्शनने भी सभी वस्तुएँ स्वीकार कर लीं। अब मनोरमाकी चिन्ता दूर हो गयी। उस समय कुबेरपुत्रीके समान उस सुन्दर केशोंवाली शशिकलाको पाकर सुदर्शनने अपने आपको परम धन्य समझा॥ १०॥
सुपूजितं भूषणवस्त्रदानै-<br>र्वरोत्तमं तं सचिवास्तदानीम्।<br>निन्युश्च ते कौतुकमण्डपान्त-<br>र्मुदान्विता वीतभयाश्च सर्वे॥ ११उस समय आनन्दित एवं निर्भीक सभी मन्त्री राजाद्वारा आभूषण तथा वस्त्र देकर सम्यक् रूपसे पूजित श्रेष्ठ वर सुदर्शनको कौतुकमण्डपमें ले गये ॥ ११ ॥
समाप्तभूषां विधिवद्विधिज्ञाः<br>स्त्रियश्च तां राजसुतां सुयाने।<br>आरोप्य निन्युर्वरसन्निधानं<br>चतुष्कयुक्ते किल मण्डपे वै॥ १२तदनन्तर विधिकी जानकार स्त्रियाँ राजकुमारीको वस्त्राभूषणोंसे विधिवत् सुसज्जित करके उसे सुन्दर पालकीमें बिठाकर चौकोर वेदीसे युक्त मण्डपमें वरके पास ले गयीं ॥ १२ ॥
अग्निं समाधाय पुरोहितः स<br>हुत्वा यथावच्च तदन्तराले।<br>आह्वयायत्तौ कृतकौतुकौ तु<br>वधूवरौ प्रेमयुतौ निकामम्॥ १३<br>लाजाविसर्गं विधिवद्विधाय<br>कृत्वा हुताशस्य प्रदक्षिणाञ्च।<br>तौ चक्रतुस्तत्र यथोचितं तत्<br>सर्वं विधानं कुलगोत्रजातम्॥ १४उस वेदीपर पुरोहितने अग्नि-स्थापन करके और विधिवत् घृताहुति देकर कौतुकागारमें कौतुक किये हुए प्रेमरससे अत्यन्त सिक्त वर-वधूको बुलाया। उन दोनोंने विधिवत् लाजाहोम करनेके बाद अग्निकी प्रदक्षिणा करके अपने-अपने कुल तथा गोत्रकी समस्त रीतियाँ सम्पन्न कीं ॥ १३-१४॥
शतद्वयं चाश्वयुजां रथानां<br>सुभूषितं चापि शरौघसंयुक्तम्।<br>ददौ नृपेन्द्रस्तु सुदर्शनाय<br>सुपूजितं पारिबर्हं विवाहे ॥ १५<br>मदोत्कटान्हेमविभूषितांश्च<br>गजानगेः शृङ्गसमानदेहान्।<br>शतं सपादं नृपसूनवेऽसौ<br>ददावथ प्रेमयुतो नृपेन्द्रः॥ १६महाराज सुबाहुने घोड़ोंसे जुते तथा अत्यधिक बाणोंसे लदे हुए दो सौ सुसज्जित रथ सुदर्शनको विवाहमें उपहारस्वरूप दिये। उन्होंने मदमत्त, सुवर्णके भूषणोंसे विभूषित तथा पर्वतके शिखरके समान शरीरवाले सवा सौ हाथी राजकुमार सुदर्शनको प्रेमपूर्वक प्रदान किये ॥ १५-१६ ॥

| ३५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ | | :--- | :--- |

| दासीशतं काञ्चनभूषितं च<br>करेणुकानां च शतं सुचारु।<br>समर्पयामास वराय राजा<br>विवाहकाले मुदितोऽनुवेलम् ॥ १७<br>अदात्पुनर्दाससहस्रमेकं<br>सर्वायुधैः सम्भृतभूषितञ्च।<br>रत्नानि वासांसि यथोचितानि<br>दिव्यानि चित्राणि तथाविकानि ॥ १८ | विवाहके समय राजाने स्वर्णभूषणोंसे अलंकृत सौ दासियाँ और सुन्दर-सुन्दर सौ हथिनियाँ प्रसन्नतापूर्वक बार-बार वरको समर्पित कीं। उन्होंने सब प्रकारके आयुधों और आभूषणोंसे सुसज्जित एक हजार सेवक, बहुत-से रत्न, रंग-बिरंगे दिव्य सूती तथा ऊनी वस्त्र यथोचित रूपसे दिये ॥ १७-१८ ॥ | | ददौ पुनर्वासगृहाणि तस्मै<br>रम्याणि दीर्घाणि विचित्रितानि।<br>सिन्धूद्भवानां तुरगोत्तमाना-<br>मदात्सहस्रद्वितयं सुरम्यम् ॥ १९<br>क्रमेलकानां च शतत्रयं वै<br>प्रत्यादिशद्भारभृतां सुचारु।<br>शतद्वयं वै शकटोत्तमानां<br>तस्मै ददौ धान्यरसैः प्रपूरितम् ॥ २० | निवासके लिये रंग-बिरंगे, सुन्दर और विशाल भवन, सिन्धुदेशके उत्तम दो हजार घोड़े, भार ढोनेमें कुशल सुन्दर तीन सौ ऊँट, अन्न एवं रससे परिपूर्ण दो सौ उत्तम बैलगाड़ियाँ भी प्रदान कीं ॥ १९-२० ॥ | | मनोरमां राजसुतां प्रणम्य<br>जगाद वाक्यं विहिताञ्जलिः पुरः।<br>दासोऽस्मि ते राजसुते वरिष्ठे<br>तद् ब्रूहि यत्स्यात्तु मनोगतं ते ॥ २१ | पश्चात् राजा सुबाहुने हाथ जोड़कर राजमाता मनोरमाको प्रणाम करके कहा—हे राजकुमारी! मैं आपका सेवक हूँ, अतः आपका जो मनोवांछित हो उसे कहिये ॥ २१ ॥ | | तं चारुवाक्यं निजगाद सापि<br>स्वस्त्यस्तु ते भूप कुलस्य वृद्धिः।<br>सम्मानिताहं मम सूनवे त्वया<br>दत्ता यतो रत्नवरा स्वकन्या ॥ २२ | तब उस मनोरमाने भी सुबाहुसे मधुर वाणीमें कहा—हे राजन्! आपका कल्याण हो, आपके वंशकी वृद्धि हो। आपने मेरा बहुत सम्मान किया; क्योंकि आपने अपनी रत्नमयी कन्या मेरे पुत्रको प्रदान की है ॥ २२ ॥ | | न बन्दिपुत्री नृप मागधी वा<br>स्तौमीह किं त्वां स्वजनं महत्तरम्।<br>सुमेरुतुल्यस्तु कृतः सुतोऽद्य मे<br>सम्बन्धिना भूपतिनोत्तमेन ॥ २३<br>अहोऽतिचित्रं नृपतेश्चरित्रं<br>परं पवित्रं तव किं वदामि।<br>यद् भ्रष्टराज्याय सुताय मेऽद्य<br>दत्ता त्वया पूज्यसुता वरिष्ठा ॥ २४<br>वनाधिवासाय किलाधनाय<br>पित्रा विहीनाय विसैन्यकाय।<br>सर्वानिमान्भूमिपतीन्विहाय<br>फलाशनायार्थविवर्जिताय ॥ २५ | हे राजन्! मैं [यश गानेमें कुशल] बन्दीजन और मागधोंकी पुत्री नहीं हूँ, [जो भलीभाँति आपकी प्रशंसा कर सकूँ।] आप तो अपने ही हैं, अतः आप श्रेष्ठ स्वजनकी मैं क्या स्तुति करूँ ? आप एक उत्तम नरेश हैं और मेरे सम्बन्धी हो गये हैं; आपने मेरे पुत्रको सुमेरुके समान बना दिया है। अहो! महान् आश्चर्य है! आप-जैसे राजाके पवित्र चरित्रका वर्णन कहाँतक करूँ, जो कि आपने इन सभी राजाओंको छोड़कर राज्यसे च्युत, वनमें निवास करनेवाले, धनहीन, पिताविहीन, सेनारहित, फलके आहारपर ही रहनेवाले तथा सम्पत्तिहीन मेरे पुत्रको अपनी प्रिय तथा कुलीन कन्या प्रदान कर दी ॥ २३–२५ ॥ |

| अ० २२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३५९ | | :--- | :--- | | समानवित्तेऽथ कुले बले च<br>ददाति पुत्रीं नृपतिश्च भूयः।<br>न कोऽपि मे भूप सुतेऽर्थहीने<br>गुणान्वितां रूपवतीञ्च दद्यात्॥ २६ | अपने समान धन, कुल और बलवालेको ही कोई अपनी पुत्री प्रदान करता है। हे राजन्! आपको छोड़कर कोई भी राजा मेरे धनहीन पुत्रको अपनी रूपगुणसम्पन्ना पुत्री नहीं दे सकता॥ २६॥ | | वैरं तु सर्वैः सह संविधाय<br>नृपैर्वरिष्ठैर्बलसंयुतैश्च।<br>सुदर्शनायाथ सुतार्पिता मे<br>किं वर्णये धैर्यमिदं त्वदीयम्॥ २७ | सभी महान् तथा बलशाली राजाओंसे शत्रुता लेकर आपने मेरे सुदर्शनको अपनी कन्या अर्पित की है—हे राजन्! मैं आपके इस धैर्यका वर्णन क्या करूँ?॥ २७॥ | | निशम्य वाक्यानि नृपः प्रहृष्टः<br>कृताञ्जलिर्वाक्यमुवाच भूयः।<br>गृहाण राज्यं मम सुप्रसिद्धं<br>भवामि सेनापतिरद्य चाहम्॥ २८<br>नोचेत्तदर्धं प्रतिगृह्य चात्र<br>सुतान्वितो राज्यफलानि भुङ्क्ष्व।<br>विहाय वाराणसिकानिवासं<br>वने पुरे वा स मतो न मेऽस्ति॥ २९ | इस प्रकार मनोरमाके [कृतज्ञतापूर्ण] वचन सुनकर महाराज सुबाहुने प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर पुनः यह वचन कहा—मेरा यह अति प्रसिद्ध राज्य आप ले लीजिये और आजसे मैं आपका सेनापति हो जा रहा हूँ; नहीं तो आप आधा राज्य ही ले लें और अपने पुत्रके साथ यहीं रहकर राजसी भोग भोगें; क्योंकि अब काशीमें निवास छोड़कर किसी वन या ग्राममें आपलोग रहें—ऐसा मेरा विचार नहीं है॥ २८-२९॥ | | नृपास्तु सन्त्येव रुषान्विता वै<br>गत्वा करिष्ये प्रथमं तु सान्त्वनम्।<br>ततः परं द्वावपरावुपायौ<br>नोचेत्ततो युद्धमहं करिष्ये॥ ३० | सभी उपस्थित भूपगण मुझपर अत्यन्त रुष्ट हैं। मैं जाकर पहले उन्हें शान्त करूँगा। इसके बाद दान एवं भेदनीतिका विधान करूँगा। यदि इसपर भी वे अनुकूल न होंगे तो उनसे युद्ध करूँगा॥ ३०॥ | | जयाजयौ दैववशौ तथापि<br>धर्मे जयो नैव कृतेऽप्यधर्मे।<br>तेषां किलाधर्मवतां नृपाणां<br>कथं भविष्यत्यनुचिन्तितं वै॥ ३१ | यद्यपि हार और जीत तो दैवाधीन हैं तथापि जिस पक्षमें धर्म रहता है, उसकी विजय होती है; अधर्मके पक्षवालेकी कभी नहीं। अतः अधर्मसे युक्त उन राजाओंका अपना सोचा हुआ कैसे हो सकता है?॥ ३१॥ | | आकर्ण्य तद्भाषितमर्थवच्च<br>जगाद वाक्यं हितकारकं तम्।<br>मनोरमा मानमवाप्य तस्मात्<br>सर्वात्मना मोदयुता प्रसन्ना॥ ३२<br>राजञ्छिवं तेऽस्तु कुरुष्व राज्यं<br>त्यक्त्वा भयं त्वं स्वसुतैः समेतः।<br>सुतोऽपि मे नूनमवाप्य राज्यं<br>साकेतपुर्यां प्रचरिष्यतीह॥ ३३ | उन सुबाहुसे सम्मान पाकर पूर्णरूपसे आनन्दमग्न मनोरमा उनकी सारगर्भित वाणी सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे हितकर वचन कहने लगी—हे राजन्! आपका कल्याण हो। आप निर्भय होकर अपने पुत्रोंके साथ राज्य कीजिये। मेरा पुत्र भी निश्चय ही अपना राज्य पाकर साकेतपुरी अयोध्यामें शासन करेगा॥ ३२-३३॥ |

३६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २२

| विसर्जयास्मान्निजसद्म गन्तुं<br>शिवं भवानी तव संविधास्यति।<br>न कापि चिन्ता मम भूप वर्तते<br>सञ्चिन्तयन्त्याः परमाम्बिकां वै॥ ३४ | हे राजन्! अब आप हमलोगोंको अपने घर जानेके लिये आज्ञा दीजिये। भगवती दुर्गा आपका कल्याण करेंगी। हे राजन्! मुझे अब कोई चिन्ता नहीं है; क्योंकि मैं पराम्बा भगवतीका भलीभाँति चिन्तन करती रहती हूँ॥ ३४॥ | | दोषा गता विविधवाक्यपदै रसालै-<br>रन्योन्यभाषणपदैरमृतोपमैश्च ।<br>प्रातर्नृपाः समधिगम्य कृतं विवाहं<br>रोषान्विता नगरबाह्यगतास्तथोचुः॥ ३५ | इस प्रकार उन दोनोंमें विविध वाक्योंद्वारा अमृतके समान मधुर वार्तालापमें रात बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर सभी राजा विवाह हो जानेकी बात जानकर कुपित हो उठे और नगरके बाहर निकलकर आपसमें कहने लगे- ॥ ३५॥ | | अद्यैव तं नृपकलङ्कधरञ्च हत्वा<br>बालं तथैव किल तं न विवाहयोग्यम्।<br>गृह्णीम तां शशिकलां नृपतेश्च लक्ष्मीं<br>लज्जामवाप्य निजसद्म कथं व्रजेम॥ ३६ | हम आज ही उस कलंकी राजा सुबाहु तथा विवाहकी योग्यता न रखनेवाले उस कुमार सुदर्शनको मारकर राज्यलक्ष्मीसहित उस शशिकलाको छीन लेंगे, अन्यथा लज्जित होकर हमलोग कैसे अपने घर जायँगे?॥ ३६॥ | | शृण्वन्तु तूर्यनिनदान्किल वाद्यमाना-<br>ञ्छङ्खस्वनानभिभवन्ति मृदङ्गशब्दाः।<br>गीतध्वनिं च विविधं निगमस्वनञ्च<br>मन्यामहे नृपतिनात्र कृतो विवाहः॥ ३७ | आप सब लोग बजायी जा रही तुरहियों तथा शंखोंके निनाद, गीतध्वनि तथा अनेक प्रकारकी वेद-ध्वनि सुन लें। मृदंगोंके भी शब्द हो रहे हैं। हमलोग तो ऐसा मानते हैं कि राजा सुबाहुने विवाह सम्पन्न कर दिया॥ ३७॥ | | अस्मान्प्रतार्य वचनैर्विधिवच्चकार<br>वैवाहिकेन विधिना करपीडनं वै।<br>कर्तव्यमद्य किमहो प्रविचिन्तयन्तु<br>भूपाः परस्परमतिं च समर्थयन्तु॥ ३८ | राजाने हमें बातोंसे ठगकर वैवाहिक विधिसे पाणिग्रहण-संस्कार अवश्य कर दिया। हे राजाओ! अब हमलोगोंको क्या करना चाहिये, इस विषयमें आपलोग सोचें और आपसमें विचार करके एक निर्णय लें॥ ३८॥ | | एवं वदत्सु नृपतिष्वथ कन्यकायाः<br>कृत्वा विवाहविधिमप्रतिमप्रभावः।<br>भूपान्निमन्त्रयितुमाशु जगाम राजा<br>काशीपतिः स्वसुहृदैः प्रथितप्रभावैः॥ ३९ | इस प्रकार राजाओंमें परस्पर बातचीत हो ही रही थी कि इतनेमें अप्रतिम प्रभाववाले काशीपति महाराज सुबाहु कन्याका पाणिग्रहण-संस्कार सम्पन्न करके प्रसिद्ध तेजवाले अपने मित्रोंको साथ लेकर उन राजाओंको निमन्त्रित करनेके लिये शीघ्र उनके पास गये॥ ३९॥ | | आगच्छन्तं च तं दृष्ट्वा नृपाः काशीपतिं तदा।<br>नोचुः किञ्चिदपि क्रोधान्मौनमाधाय संस्थिताः॥ ४० | काशीराज सुबाहुको आते देखकर उपस्थित नरेशोंने क्रोधके कारण कुछ नहीं कहा। वे मौन साधकर बैठे रहे॥ ४०॥ | | स गत्वा प्रणिपत्याह कृताञ्जलिरभाषत।<br>आगन्तव्यं नृपैः सर्वैर्भोजनार्थं गृहे मम॥ ४१ | राजा सुबाहु उनके पास जाकर हाथ जोड़कर प्रणाम करके कहने लगे कि सभी राजागण भोजन करनेके |

अ० २३ ]तृतीय स्कन्ध३६१
कन्ययासौ वृतो भूपः किं करोमि हिताहितम्।<br>भवद्भिरस्तु शमः कार्यो महान्तो हि दयालवः॥ ४२लिये मेरे घर आयें। कन्याने तो उस राजकुमार सुदर्शनका पतिरूपमें वरण कर लिया है। मैं इस विषयमें अच्छा-बुरा क्या कर सकता हूँ? अब आपलोग शान्त हो जायें; क्योंकि महान् लोग दयालु होते हैं॥ ४१-४२॥
तन्निशम्य वचस्तस्य नृपाः क्रोधपरप्लुताः।<br>प्रत्यूचुर्भुक्तमस्माभिः स्वगृहं नृपते व्रज॥ ४३राजा सुबाहुकी बात सुनकर सभी राजा क्रोधसे तमतमा उठे। उन्होंने कहा—राजन्! हमलोग भोजन कर चुके, अब आप अपने घर जाइये। आपको जो अच्छा लगा, उसे आपने कर लिया। जो कार्य शेष हों उन सबको भी जाकर कर लीजिये। अब सभी राजागण अपने-अपने घर चले जायेंगे॥ ४३-४४॥
कुरु कार्याण्यशेषाणि यथेष्टं सुकृतं कृतम्।<br>नृपाः सर्वे प्रयान्त्वद्य स्वानि स्वानि गृहाणि वै॥ ४४
सुबाहुरपि तच्छ्रुत्वा जगाम शङ्कितो गृहम्।<br>किं करिष्यन्ति संविग्नाः क्रोधयुक्ता नृपोत्तमाः॥ ४५सुबाहु भी यह सुनकर घर चले गये और शंका करने लगे कि ये क्षुब्ध तथा कुपित राजागण अब न जाने क्या कर डालेंगे॥ ४५॥
गते तस्मिन्महीपालाश्चक्रुश्च समयं पुनः।<br>रुद्ध्वा मार्गं ग्रहीष्यामः कन्यां हत्वा सुदर्शनम्॥ ४६राजा सुबाहुके चले जानेपर उन नरेशोंने यह निश्चय किया कि अब हमलोग मार्ग रोककर सुदर्शनको मारकर कन्याको छीन लेंगे॥ ४६॥
केचनोचुः किमस्माकं हन्त तेन नृपेण वै।<br>दृष्ट्वा तु कौतुकं सर्वं गमिष्यामो यथागतम्॥ ४७उनमेंसे कुछ राजाओंने कहा—अरे! उस राजकुमार सुदर्शनसे हमारा क्या वैर? हमने यहाँका सब कौतुक देख लिया। अब हम जैसे आये थे, वैसे ही घर लौट चलें॥ ४७॥
इत्युक्त्वा ते नृपाः सर्वे मार्गमाक्रम्य संस्थिताः।<br>चकारोत्तरकार्याणि सुबाहुः स्वगृहं गतः॥ ४८ऐसा कहकर वे सब [विरोधी] राजागण मार्ग रोककर खड़े हो गये और राजा सुबाहु अपने भवन पहुँचकर आगेके कृत्य सम्पादित करने लगे॥ ४८॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
सुदर्शनशशिकलयोर्विवाहवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
~~ ~~

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

सुदर्शनका शशिकलाके साथ भारद्वाज-आश्रमके लिये प्रस्थान, युधाजित् तथा अन्य राजाओंसे सुदर्शनका घोर संग्राम, भगवती सिंहवाहिनी दुर्गाका प्राकट्य, भगवतीद्वारा युधाजित् और शत्रुजित्का वध, सुबाहुद्वारा भगवतीकी स्तुति

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तस्मै गौरवभोज्यानि विधाय विधिवत्तदा।<br>वासराणि च षड्राजा भोजयामास भक्तितः॥ १[हे राजन्!] उस समय राजा सुबाहुने छः दिनोंतक विविध प्रकारके भोजन बनवाकर सुदर्शनको प्रेमपूर्वक खिलाया॥ १॥
एवं विवाहकार्याणि कृत्वा सर्वाणि पार्थिवः।<br>पारिबर्हं प्रदत्त्वाथ मन्त्रयन्सचिवैः सह॥ २<br>दूतैस्तु कथितं श्रुत्वा मार्गसंरोधनं कृतम्।<br>बभूव विमना राजा सुबाहुरमितद्युतिः॥ ३इस प्रकार विवाहके सभी कृत्य करके राजा सुबाहु सुदर्शनको उपहार प्रदान करके सचिवोंके साथ मन्त्रणा कर रहे थे, उसी समय अपने दूतोंका यह कथन सुनकर कि विरोधी राजाओंने मार्ग रोक रखा है, वे अमित तेजवाले राजा सुबाहु खिन्नमनस्क हो गये॥ २-३॥

३६२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २३

३६२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुदर्शनस्तदोवाच श्वशुरं संशितव्रतः।<br>अस्मान्विसर्जयाशु त्वं गमिष्यामो ह्यशङ्किताः॥ ४तब व्रतपरायण सुदर्शनने अपने श्वसुरसे कहा—आप हमें शीघ्र विदा कर दीजिये, हम निःशंक होकर चले जायँगे॥ ४॥
भारद्वाजाश्रमं पुण्यं गत्वा तत्र समाहिताः।<br>निवासाय विचारो वै कर्तव्यः सर्वथा नृप॥ ५हे राजन्! भारद्वाजमुनिके पवित्र आश्रममें पहुँचनेपर वहीं सावधानीके साथ आगे रहनेके लिये विचार कर लिया जायगा॥ ५॥
नृपेभ्यश्च न कर्तव्यं भयं किञ्चित्त्वयानघ।<br>जगन्माता भवानी मे साहाय्यं वै करिष्यति॥ ६अतः हे पुण्यात्मन्! उन राजाओंसे आप कुछ भी भय न करें; क्योंकि जगज्जननी भगवती मेरी सहायता अवश्य करेंगी॥ ६॥
व्यास उवाच<br>तस्येति मतमाज्ञाय जामातुर्नृपसत्तमः।<br>विससर्ज धनं दत्त्वा प्रतस्थे सोऽपि सत्वरः॥ ७<br>बलेन महताविष्टो ययावनु नृपोत्तमः।<br>सुदर्शनो वृतस्तत्र चचाल पथि निर्भयः॥ ८व्यासजी बोले—अपने जामाता सुदर्शनका ऐसा विचार जानकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उन्हें धन देकर विदा कर दिया और वे सुदर्शन भी तत्काल चल पड़े। नृपश्रेष्ठ सुबाहु भी एक विशाल सेना लेकर उनके पीछे-पीछे चले। इस प्रकार उन सैनिकोंसे आवृत सुदर्शन निर्भय होकर मार्गमें चले जा रहे थे॥ ७-८॥
रथैः परिवृतः शूरः सदारो रथसंस्थितः।<br>गच्छन्ददर्श सैन्यानि नृपाणां रघुनन्दनः॥ ९रथोंसे घिरे हुए एक रथपर अपनी पत्नीके साथ बैठकर जाते हुए रघुनन्दन सुदर्शनने मार्गमें उन राजाओंके सैनिकोंको देखा॥ ९॥
सुबाहुरपि तान्वीक्ष्य चिन्ताविष्टो बभूव ह।<br>विधिवत्स शिवां चित्ते जगाम शरणं मुदा॥ १०<br>जजापैकाक्षरं मन्त्रं कामराजमनुत्तमम्।<br>निर्भयो वीतशोकश्च पत्या सह नवोढया॥ ११राजा सुबाहु भी उन सैनिकोंको देखकर चिन्तित हुए। तब सुदर्शनने विधिपूर्वक अपने मनमें भगवती जगदम्बाका ध्यान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी शरण ली। उस समय सुदर्शन एकाक्षर कामराज नामक सर्वोत्तम मन्त्रका जप कर रहे थे, उसके प्रभावसे वे अपनी नवविवाहिता पत्नीके साथ निर्भय तथा चिन्तामुक्त थे॥ १०-११॥
ततः सर्वे महीपालाः कृत्वा कोलाहलं तदा।<br>उत्थिताः सैन्यसंयुक्ता हन्तुकामास्तु कन्यकाम्॥ १२इसी बीच सभी राजा एक साथ कोलाहल करके कन्याका हरण करनेकी इच्छासे अपनी-अपनी सेनाके साथ उनकी ओर बढ़े॥ १२॥
काशिराजस्तु तान्दृष्ट्वा हन्तुकामो बभूव ह।<br>निवारितस्तदात्यर्थं राघवेण जिगीषता॥ १३उन्हें ऐसा करते देखकर काशीनरेश सुबाहुने उनको मारनेका विचार किया, किंतु विजयकी इच्छावाले रघुवंशी सुदर्शनने उन्हें मना कर दिया॥ १३॥
तत्रापि नेदुः शङ्खाश्च भेर्यश्चानकदुन्दुभिः।<br>सुबाहोश्च नृपाणाञ्च परस्परजिघांसताम्॥ १४उस समय एक दूसरेको मार डालनेकी अभिलाषावाले महाराज सुबाहु तथा अन्य राजाओंकी सेनाओंमें शंख भेरी, नगाड़े और दुन्दुभि बजने लगे॥ १४॥
शत्रुजित्तु सुसंवृत्तः स्थितस्तत्र जिघांसया।<br>युधाजित्तत्सहायार्थं सन्नद्धः प्रबभूव ह॥ १५सुदर्शनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुजित् सैन्य-बलसे युक्त होकर बड़ी तत्परतासे तैयार खड़ा था और राजा युधाजित् भी उसकी सहायताके लिये

| अ० २३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
केचिच्च प्रेक्षकास्तस्य सहानीकैः स्थितास्तदा ।<br>युधाजिदग्रतो गत्वा सुदर्शनमुपस्थितः ॥ १६<br><br>शत्रुजित्तेन सहितो हन्तुं भ्रातरमानुजः ।<br>परस्परं ते बाणौघैस्ततक्षुः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ १७<br><br>सम्मर्दः सुमहांस्तत्र सम्प्रवृत्तः सुमार्गणेः ।<br>काशीपतिस्तदा तूर्णं सैन्येन बहुना वृतः ॥ १८सन्नद्ध थे। उनमें कुछ राजागण अपनी सेनाके साथ दर्शकके रूपमें खड़े थे। तभी युधाजित् आगे बढ़कर सुदर्शनके समक्ष जा डटा। उसके साथ शत्रुजित् भी अपने भाईका वध करनेके लिये आ गया। तब क्रोधके वशीभूत होकर वे सब परस्पर एक-दूसरेपर बाणोंसे प्रहार करने लगे। इस प्रकार वहाँ बाणोंद्वारा बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया। तब काशीनरेश सुबाहु एक विशाल सेना लेकर अपने सुशंसित जामाताकी सहायताके लिये जा पहुँचे ॥ १५-१८ १/२ ॥
साहाय्यार्थं जगामाशु जामातरमनिन्दितम्।<br>एवं प्रवृत्ते संग्रामे दारुणे लोमहर्षणे ॥ १९<br><br>प्रादुर्बभूव सहसा देवी सिंहोपरि स्थिता ।<br>नानायुधधरा रम्या वराभूषणभूषिता ॥ २०इस प्रकार भयानक लोमहर्षक संग्राम छिड़ जानेपर सहसा भगवती प्रकट हो गयीं। वे सिंहपर सवार थीं, विविध प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण किये थीं, अत्यन्त मनोहर थीं तथा उत्तम आभूषणोंसे अलंकृत थीं, दिव्य वस्त्र पहने थीं और मन्दारकी मालासे सुशोभित थीं ॥ १९-२० १/२ ॥
दिव्याम्बरपरीधाना मन्दारस्रक्सुसंयुता ।<br>तां दृष्ट्वा तेऽथ भूपाला विस्मयं परमं गताः ॥ २१<br><br>केयं सिंहसमारूढा कुतो वेति समुत्थिता ।<br>सुदर्शनस्तु तां वीक्ष्य सुबाहुमिति चाब्रवीत् ॥ २२<br><br>पश्य राजन् महादेवीमागतां दिव्यदर्शनाम्।<br>अनुग्रहाय मे नूनं प्रादुर्भूता दयान्विता ॥ २३उन्हें देखकर वे राजागण अत्यन्त चकित हो गये। वे कहने लगे कि सिंहपर सवार यह स्त्री कौन है और कहाँसे प्रकट हो गयी है? उन्हें देखकर सुदर्शनने सुबाहुसे कहा—हे राजन्! यहाँ प्रादुर्भूत हुई इन दिव्य दर्शनवाली महादेवीको आप देखें। ये दयामयी भगवती निश्चय ही मुझपर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई हैं। हे महाराज! मैं निर्भय तो पहले ही था, किंतु अब और भी अधिक निर्भय हो गया ॥ २१-२३ १/२ ॥
निर्भयोऽहं महाराज जातोऽस्मि निर्भयादपि ।<br>सुदर्शनः सुबाहुश्च तामालोक्य वराननाम् ॥ २४<br><br>प्रणामं चक्रतुस्तस्या मुदितौ दर्शनेन च।<br>ननाद च तदा सिंहो गजास्त्रस्ताश्चकम्पिरे ॥ २५सुदर्शन और सुबाहुने उन सुमुखी भगवतीको देखकर उन्हें प्रणाम किया। उनके दर्शनसे वे दोनों प्रसन्न हो गये। उसी समय भगवतीके सिंहने भीषण गर्जन किया, जिससे उस रणभूमिमें विद्यमान सभी हाथी भयसे काँपने लगे। उस समय महाभीषण आँधी चलने लगी और सभी दिशाएँ अत्यन्त भयानक हो गयीं ॥ २४-२५ १/२ ॥
ववुर्वाता महाघोरा दिशश्चासान्त्सुदारुणाः ।<br>सुदर्शनस्तदा प्राह निजं सेनापतिं प्रति ॥ २६<br><br>मार्गे व्रज त्वं तरसा भूपाला यत्र संस्थिताः ।<br>किं करिष्यन्ति राजानः कुपिता दुष्टचेतसः ॥ २७<br><br>शरणार्थञ्च सम्प्राप्ता देवी भगवती हि नः।<br>निरातङ्कैश्च गन्तव्यं मार्गेऽस्मिन्भूपसङ्कुले ॥ २८तब सुदर्शनने अपने सेनापतिसे कहा कि जहाँ ये राजागण [मार्ग रोककर] खड़े हैं, उधर ही तुम वेगसे आगे बढ़ो। ये दुष्ट तथा कुपित राजालोग हमारा क्या कर लेंगे? अब हमें शरण देनेके लिये स्वयं भगवती जगदम्बा आ गयी हैं। अतएव हमें निर्भय होकर राजाओंसे भरे इस मार्गपर आगे बढ़ना
३६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३ ]

| स्मृता मया महादेवी रक्षणार्थमुपागता।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं सेनापतिस्तेन पथाव्रजत्॥ २९ | चाहिये। मेरे स्मरण करते ही मेरी रक्षाके लिये ये भगवती आ गयी हैं। सुदर्शनका वचन सुनकर सेनापति उसी मार्गसे आगे बढ़ा॥ २६—२९॥ | | युधाजित्तु सुसंक्रुद्धस्तानुवाच महीपतीन्।<br>किं स्थिता भयसन्त्रस्ता निघ्नन्तु कन्यकान्वितम्॥ ३० | अतिशय कुपित होकर युधाजित्ने उन राजाओंसे कहा—तुमलोग भयभीत होकर खड़े क्यों हो; कन्यासहित इस सुदर्शनको मार डालो॥ ३०॥ | | अवमन्य च नः सर्वान्बलहीनो बलाधिकान्।<br>कन्यां गृहीत्वा संयाति निर्भयस्तरसा शिशुः॥ ३१ | हम सभी बलवानोंका तिरस्कार करके यह बलहीन बालक कन्याको लेकर निर्भीकतापूर्वक बड़े वेगसे चला जा रहा है॥ ३१॥ | | किं भीताः कामिनीं वीक्ष्य सिंहोपरि सुसंस्थिताम्।<br>नोपेक्ष्यो हि महाभागा हन्तव्योऽत्र समाहितैः॥ ३२ | सिंहपर विराजमान उस स्त्रीको देखकर तुमलोग क्यों डरते हो? हे महाभाग राजाओ! इस समय सुदर्शनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये और अत्यन्त सावधान होकर इसका वध कर देना चाहिये॥ ३२॥ | | हत्वैनं संग्रहीष्यामः कन्यां चारुविभूषणाम्।<br>नायं केसरिणादत्तां छेत्तुमर्हति जम्बुकः॥ ३३ | इसे मारकर हम सुन्दर आभूषण धारण करनेवाली कन्याको छीन लेंगे। हम सिंहसदृश वीरोंके भागको यह सियार नहीं ले जा सकता॥ ३३॥ | | इत्युक्त्वा सैन्यसंयुक्तः शत्रुजित्सहितस्तदा।<br>योद्धुकामः सुसम्प्राप्तो युधाजित्क्रोधसंवृतः॥ ३४ | ऐसा कहकर वह युधाजित् अत्यन्त कुपित हो [अपने दौहित्र] शत्रुजित् तथा विशाल सेनाको साथ लिये हुए युद्धकी इच्छासे आ डटा॥ ३४॥ | | मुमोच विशिखांस्तूर्णं समपुंखाञ्छिलाशितान्।<br>धनुराकृष्य कर्णान्तं कर्मारपरिमार्जितान्॥ ३५ | अब वह कानतक धनुष खींचकर लोहारके द्वारा सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए, शिलापर घिसकर तेज किये गये तथा समान पुच्छयुक्त बाणोंको शीघ्रतापूर्वक छोड़ने लगा॥ ३५॥ | | हन्तुकामः सुदुर्मेधाः सुदर्शनमथोपरि।<br>सुदर्शनस्तु तान्बाणैश्चिच्छेदापततः क्षणात्॥ ३६ | इस प्रकार उसके ऊपर प्रहार करके वह दुर्बुद्धि युधाजित् सुदर्शनको मार डालना चाहता था, किंतु सुदर्शनने उसके बाणोंको छूटते ही अपने बाणोंसे क्षणभरमें काट डाला॥ ३६॥ | | एवं युद्धे प्रवृत्तेऽथ चुकोप चण्डिका भृशम्।<br>दुर्गादेवी मुमोचाथ बाणान्युधाजितं प्रति॥ ३७ | वह भीषण युद्ध छिड़ जानेपर भगवती चण्डिका अत्यन्त क्रुद्ध हो उठीं और युधाजित्पर बाण बरसाने लगीं॥ ३७॥ | | नानारूपा तदा जाता नानाशास्त्रधरा शिवा।<br>सम्प्राप्ता तुमुलं तत्र चकार जगदम्बिका॥ ३८ | उस समय कल्याणमयी जगदम्बिका विविध रूप धारण कर लेती थीं। वे नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र लेकर घमासान युद्ध कर रही थीं॥ ३८॥ | | शत्रुजिन्निहतस्तत्र युधाजिदपि पार्थिवः।<br>पतितौ तौ रथाभ्यां तु जयशब्दस्तदाभवत्॥ ३९ | कुछ ही क्षणोंमें शत्रुजित् और राजा युधाजित्—दोनों मार डाले गये और अपने-अपने रथोंसे गिर पड़े। उस समय जयजयकारकी ध्वनि होने लगी॥ ३९॥ | | विस्मयं परमं प्राप्ता भूपाः सर्वे विलोक्य ताम्।<br>निधनं मातुलस्यापि भागिनेयस्य संयुगे॥ ४० | उस युद्धमें भगवतीको तथा मामा और भांजेकी (नाना-नातीकी) मृत्यु देखकर सभी राजा बहुत विस्मयमें पड़ गये॥ ४०॥ |

अ० २३ ] तृतीय स्कन्ध ३६५

अ० २३ ] तृतीय स्कन्ध ३६५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुबाहुरपि तद् दृष्ट्वा निधनं संयुगे तयोः।<br>तुष्टाव परमप्रीतो दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ ४१महाराज सुबाहु भी रणभूमिमें उन दोनोंका मरण देखकर बहुत प्रसन्न हुए और दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गाकी स्तुति करने लगे॥ ४१॥
सुबाहुरुवाच<br>नमो देव्यै जगद्धात्र्यै शिवायै सततं नमः।<br>दुर्गायै भगवत्यै ते कामदायै नमो नमः॥ ४२सुबाहु बोले— जगत्को धारण करनेवाली देवीको नमस्कार है। भगवती शिवाको निरन्तर नमस्कार है। मनोरथ पूर्ण करनेवाली आप भगवती दुर्गाको बार-बार नमस्कार है॥ ४२॥
नमः शिवायै शान्त्यै ते विद्यायै मोक्षदे नमः।<br>विश्वव्याप्त्यै जगन्मातर्जगद्धात्र्यै नमः शिवे॥ ४३आप शिवा और शान्तिदेवीको नमस्कार है। हे मोक्षदायिनि! आप विद्यास्वरूपिणीको नमस्कार है। हे जगन्माता! हे शिवे! आप विश्वव्यापिनी तथा जगज्जननीको नमस्कार है॥ ४३॥
नाहं गतिं तव धिया परिचिन्तयन्वै<br>जानामि देवि सगुणः किल निर्गुणायाः।<br>किं स्तौमि विश्वजननीं प्रकटप्रभावां<br>भक्तार्तिनाशनपरां परमां च शक्तिम्॥ ४४हे देवि! मैं सगुण प्राणी अपनी बुद्धिसे बहुत प्रकारसे चिन्तन करके भी आप निर्गुणा भगवतीकी गतिको नहीं जान पाता। हे विश्वजननि! प्रत्यक्ष प्रभाववाली, भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेमें तत्पर तथा परम शक्तिस्वरूपा आपकी स्तुति मैं कैसे करूँ?॥ ४४॥
वाग्देवता त्वमसि सर्वगतैव बुद्धि-<br>र्विद्या मतिश्च गतिरप्यसि सर्वजन्तोः।<br>त्वां स्तौमि किं त्वमसि सर्वमनोनियन्त्री<br>किं स्तूयते हि सततं खलु चात्मरूपम्॥ ४५आप ही देवी सरस्वती हैं, आप ही बुद्धिरूपसे सबके भीतर विराजमान हैं, आप ही सब प्राणियोंकी विद्या, मति और गति हैं और आप ही सबके मनका नियन्त्रण करती हैं, तब मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? सर्वव्यापी आत्माके रूपकी भी स्तुति भला कभी की जा सकती है?॥ ४५॥
ब्रह्मा हरश्च हरिरप्यनिशं स्तुवन्तो<br>नान्तं गताः सुरवराः किल ते गुणानाम्।<br>क्वाहं विभेदमतिरम्ब गुणैर्वृतो वै<br>वक्तुं क्षमस्तव चरित्रमहोऽप्रसिद्धः॥ ४६देवताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु और शिव निरन्तर आपकी स्तुति करते हुए भी आपके गुणोंके पार नहीं जा सके। तब हे अम्ब! भेदबुद्धिवाला, सत्त्व आदि गुणोंसे आबद्ध तथा अप्रसिद्ध एक तुच्छ जीव मैं आपके चरित्रका वर्णन करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ?॥ ४६॥
सत्सङ्गतिः कथमहो न करोति कामं<br>प्रासङ्गिकापि विहिता खलु चित्तशुद्धिः।<br>जामातुरस्य विहितेन समागमेन<br>प्राप्तं मयाऽद्भुतमिदं तव दर्शनं वै॥ ४७अहो! सत्संग कौन-सा मनोरथ पूर्ण नहीं कर देता? आपके इस प्रासंगिक संगसे ही मेरा चित्त शुद्ध हो गया। [आपके भक्त] अपने इस जामाता सुदर्शनके संगके प्रभावसे मैंने अनायास आपका यह अद्भुत दर्शन पा लिया॥ ४७॥
ब्रह्मापि वाञ्छति सदैव हरो हरिश्च<br>सेन्द्राः सुराश्च मुनयो विदितार्थतत्त्वाः।<br>यद्दर्शनं जननि तेऽद्य मया दुरापं<br>प्राप्तं विना दमशमादिसमाधिभिश्च॥ ४८हे जननि! ब्रह्मा, शिव, भगवान् विष्णु, इन्द्र-सहित सभी देवता तथा तत्त्वज्ञानी मुनिलोग भी आपके जिस दर्शनको चाहते हैं, वह आपका दुर्लभ दर्शन मुझे बिना शम, दम तथा समाधि आदिके ही प्राप्त हो गया॥ ४८॥
३६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३

| क्वाहं सुमन्दमतिराशु तवावलोकं<br>क्वेदं भवानि भवभेषजमद्वितीयम्।<br>ज्ञातासि देवि सततं किल भावयुक्ता<br>भक्तानुकम्पनपरामरवर्गपूज्या ॥ ४९ | हे भवानि ! कहाँ अतिशय मन्दमति मैं और कहाँ भवरूपी रोगके लिये औषधिस্বরূপ आपका यह शीघ्र अद्वितीय दर्शन ! हे देवि ! मुझे ज्ञात हो गया कि आप सदा भावनायुक्त रहती हैं। देवसमूहद्वारा पूजी जानेवाली आप अपने भक्तोंपर अनुकम्पा करती हैं ॥ ४९ ॥ | | किं वर्णयामि तव देवि चरित्रमेतद्<br>यद्रक्षितोऽस्ति विषमेऽत्र सुदर्शनोऽयम्।<br>शत्रू हतौ सुबलिनौ तरसा त्वयाद्य<br>भक्तानुकम्पि चरितं परमं पवित्रम्॥ ५० | हे देवि ! आपने इस भीषण संकटके समय जिस प्रकार इस सुदर्शनकी रक्षा की है, आपके इस चरित्रका मैं किस तरह वर्णन करूँ? आपने आज इसके दो बलवान् शत्रुओंको तत्काल मार डाला। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाला आपका यह चरित्र परम पवित्र है ॥ ५० ॥ | | नाश्चर्यमेतदिति देवि विचारितेऽर्थे<br>त्वं पासि सर्वमखिलं स्थिरजङ्गमं वै।<br>त्रातस्त्वया च विनिहत्य रिपुर्दयातः<br>संरक्षितोऽयमधुना ध्रुवसन्थिसूनुः॥ ५१ | हे देवि ! विशेष विचार करनेपर ज्ञात होता है कि आपका ऐसा करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आप अखिल स्थावर-जंगम जगत्की रक्षा करती हैं। आपने शत्रुको मारकर दयालुतावश ध्रुवसन्धिके पुत्र इस सुदर्शनकी इस समय रक्षा की ॥ ५१ ॥ | | भक्तस्य सेवनपरस्य स्वयशोऽतिदीप्तं<br>कर्तुं भवानि रचितं चरितं त्वयैतत्।<br>नोचेत्कथं सुपरिगृह्य सुतां मदीयां<br>युद्धे भवेत्कुशलवाननवद्यशीलः॥ ५२ | हे भवानि ! अपने सेवापरायण भक्तके यशको अत्यन्त उज्ज्वल बनानेके लिये ही आपने इस चरित्रकी रचना की है, नहीं तो मेरी कन्याका पाणिग्रहण करके यह असमर्थ सुदर्शन युद्धमें सकुशल जीवित कैसे बच सकता था ? ॥ ५२ ॥ | | शक्तासि जन्ममरणादिभयान्विहन्तुं<br>किं चित्रमत्र किल भक्तजनस्य कामम्।<br>त्वं गीयसे जननि भक्तजनैरपारा<br>त्वं पापपुण्यरहिता सगुणागुणा च॥ ५३ | जब आप अपने भक्तोंके जन्म-मरण आदि भयोंको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, तब उसकी लौकिक अभिलाषा पूर्ण कर देना कौन बड़ी बात है ? हे जननि ! आप पाप-पुण्यसे रहित, सगुणा तथा निर्गुणा हैं; इसी कारण भक्तजन सदा आपके गुण गाते रहते हैं ॥ ५३ ॥ | | त्वद्दर्शनादहमहो सुकृती कृतार्थो<br>जातोऽस्मि देवि भुवनेश्वरि धन्यजन्मा।<br>बीजं न ते न भजनं किल वेद्मि मात-<br>र्ज्ञातस्तवाद्य महिमा प्रकटप्रभावः॥ ५४ | हे देवि ! हे भुवनेश्वरि ! आज आपके दर्शनसे मैं पवित्र, कृतार्थ और धन्य जन्मवाला हो गया। हे माता! मैं न आपका भजन जानता हूँ और न तो बीजमन्त्र जानता हूँ। मैं आपकी प्रत्यक्ष प्रभाववाली महिमाको आज जान गया ॥ ५४ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी प्रसन्नवदना शिवा।<br>उवाच तं नृपं देवी वरं वरय सुव्रत॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**महाराज सुबाहुके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती शिवाका मुखमण्डल प्रसन्नतासे भर गया। तब भगवतीने उन राजासे कहा—हे सुव्रत ! तुम वर माँगो ॥ ५५ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुबाहुकृतदेवीस्तुतिवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३६७

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३६७

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सुबाहुद्वारा भगवती दुर्गासे सदा काशीमें रहनेका वरदान माँगना तथा देवीका वरदान देना, सुदर्शनद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीका उसे अयोध्या जाकर राज्य करनेका आदेश देना, राजाओंका सुदर्शनसे अनुमति लेकर अपने-अपने राज्योंको प्रस्थान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भवान्याः स नृपोत्तमः।<br>प्रोवाच वचनं तत्र सुबाहुर्भक्तिसंयुतः॥ १व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उन भवानीका वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने भक्तिसे युक्त होकर यह बात कही— ॥ १ ॥
सुबाहुरुवाच<br>एकतो देवलोकस्य राज्यं भूमण्डलस्य च।<br>एकतो दर्शनं ते वै न च तुल्यं कदाचन॥ २**सुबाहु बोले—**हे माता! एक ओर देवलोक तथा समस्त भूमण्डलका राज्य और दूसरी ओर आपका दर्शन; वे दोनों तुल्य कभी नहीं हो सकते ॥ २ ॥
दर्शनात्सदृशं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु नास्ति मे।<br>कं वरं देवि याचेऽहं कृतार्थोऽस्मि धरातले॥ ३आपके दर्शनसे बढ़कर समस्त त्रिलोकीमें कोई भी वस्तु नहीं है। हे देवि! मैं आपसे क्या वर माँगूँ? मैं तो इस जगतीतलममें आपके दर्शनसे ही कृतकृत्य हो गया ॥ ३ ॥
एतदिच्छाम्यहं मातर्याचितुं वाञ्छितं वरम्।<br>तव भक्तिः सदा मेऽस्तु निश्चला ह्यनपायिनी॥ ४हे माता! मैं तो यही अभीष्ट वर माँगना चाहता हूँ कि आपकी स्थिर तथा अखण्ड भक्ति मेरे हृदयमें बनी रहे ॥ ४ ॥
नगरेऽत्र त्वया मातः स्थातव्यं मम सर्वदा।<br>दुर्गादेवीति नाम्ना वै त्वं शक्तिरिह संस्थिता॥ ५<br>रक्षा त्वया च कर्तव्या सर्वदा नगरस्य ह।<br>यथा सुदर्शनस्त्रातो रिपुसंघादनामयः॥ ६<br>तथात्र रक्षा कर्तव्या वाराणस्यास्त्वयाम्बिके।<br>यावत्पुरी भवेद्भूभौ सुप्रतिष्ठा सुसंस्थिताः॥ ७<br>तावत्त्वयात्र स्थातव्यं दुर्गे देवि कृपानिधे।<br>वरोऽयं मम ते देयः किमन्यत्प्रार्थयाम्यहम्॥ ८हे माता! आप मेरी नगरी काशीमें सदा निवास करें। आप शक्तिस्वरूपा होकर दुर्गादेवीके नामसे यहाँ विराजमान रहें और सर्वदा नगरकी रक्षा करती रहें। हे अम्बिके! इस समय आपने जिस तरह शत्रुदलसे सुदर्शनकी रक्षा की है और उसे विकार-रहित बना दिया है, उसी तरह आप सदा वाराणसीकी रक्षा करें। हे देवि! हे कृपानिधे! जबतक भूलोकमें काशीनगरी सुप्रतिष्ठित होकर विद्यमान रहे, तबतक आप यहाँ विराजमान रहें— आप मुझे यही वरदान दें, इसके अतिरिक्त मैं आपसे और दूसरा क्या माँगूँ? ॥ ५–८ ॥
विविधांन्सकलांकामांदेहि मे विद्विषो जहि।<br>अभद्राणां विनाशञ्च कुरु लोकस्य सर्वदा॥ ९आप मेरी विविध प्रकारकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करें, मेरे शत्रुओंका नाश करें और जगत्‌के सभी अमंगलोंको सदाके लिये नष्ट कर डालें ॥ ९ ॥
व्यास उवाच<br>इति सम्प्रार्थिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी।<br>तमुवाच नृपं तत्र स्तुत्वा वै संस्थितं पुरः॥ १०**व्यासजी बोले—**इस प्रकार राजा सुबाहुके सम्यक् प्रार्थना करनेपर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा स्तुति करके अपने समक्ष खड़े राजा सुबाहुसे कहने लगीं— ॥ १० ॥
दुर्गोवाच<br>राजन् सदा निवासो मे मुक्तिपुर्यां भविष्यति।<br>रक्षार्थं सर्वलोकानां यावत्तिष्ठति मेदिनी॥ ११**दुर्गाजी बोलीं—**हे राजन्! जबतक यह पृथिवी रहेगी, तबतक सभी लोकोंकी रक्षाके लिये मैं निरन्तर इस मुक्तिपुरी काशीमें निवास करूँगी ॥ ११ ॥

| ३६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ | | :--- | :--- |

| अथो सुदर्शनस्तत्र समागम्य मुदान्वितः।<br>प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टाव जगदम्बिकाम्॥ १२ | इसके बाद सुदर्शन बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आकर उन्हें प्रणाम करके परम भक्तिके साथ उनकी स्तुति करने लगे— ॥ १२॥ | | अहो कृपा ते कथयाम्यहं किं<br>त्रातस्त्वया यत्किल भक्तिहीनः।<br>भक्तानुकम्पी सकलो जनोऽस्ति<br>विमुक्तभक्तेरवनं व्रतं ते॥ १३ | अहो! मैं आपकी कृपाका वर्णन कहाँतक करूँ! आपने मुझ जैसे भक्तिहीनकी भी रक्षा कर ली। अपने भक्तोंपर तो सभी लोग अनुकम्पा करते हैं, किंतु भक्तिरहित प्राणीकी भी रक्षा करनेका व्रत आपने ही ले रखा है॥ १३॥ | | त्वं देवि सर्वं सृजसि प्रपञ्चं<br>श्रुतं मया पालयसि स्वसृष्टम्।<br>त्वमत्सि संहारपरे च काले<br>न तेऽत्र चित्रं मम रक्षणं वै॥ १४ | मैंने सुना है कि आप ही समस्त विश्व-प्रपंचकी रचना करती हैं और अपनेद्वारा सृजित उस जगत्का पालन करती हैं तथा यथोचित समय उपस्थित होनेपर उसे अपनेमें समाहित कर लेती हैं; तब आपने जो मेरी रक्षा की, उसमें कोई आश्चर्य नहीं॥ १४॥ | | करोमि किं ते वद देवि कार्यं<br>क्व वा ब्रजामीत्यनुमोदयाशु।<br>कार्ये विमूढोऽस्मि तवाज्ञयाहं<br>गच्छामि तिष्ठे विहरामि मातः॥ १५ | हे देवि! अब यह बताइये कि मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ; मैं कहाँ जाऊँ? मुझे शीघ्र आदेश दीजिये। मैं इस समय किंकर्तव्यविमूढ हो रहा हूँ। हे माता! मैं आपकी ही आज्ञासे जाऊँगा, ठहरूँगा या विहार करूँगा॥ १५॥ | | व्यास उवाच<br>तं तथा भाषमाणं तु देवी प्राह दयान्विता।<br>गच्छायोध्यां महाभाग कुरु राज्यं कुलोचितम्॥ १६ | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहते हुए उस सुदर्शनसे भगवतीने दयापूर्वक कहा—हे महाभाग! अब तुम अयोध्या जाओ और अपने कुलकी मर्यादाके अनुसार राज्य करो॥ १६॥ | | स्मरणीया सदाहं ते पूजनीया प्रयत्नतः।<br>शं विधास्याम्यहं नित्यं राज्ये ते नृपसत्तम॥ १७ | हे नृपश्रेष्ठ! तुम प्रयत्नके साथ सदा मेरा स्मरण तथा पूजन करते रहना और मैं भी तुम्हारे राज्यका सर्वदा कल्याण करती रहूँगी॥ १७॥ | | अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः।<br>मम पूजा प्रकर्तव्या बलिदानविधानतः॥ १८<br>अर्चा मदीया नगरे स्थापनीया त्वयानघ।<br>पूजनीया प्रयत्नेन त्रिकालं भक्तिपूर्वकम्॥ १९ | अष्टमी, चतुर्दशी और विशेष करके नवमी तिथिको विधि-विधानसे मेरी पूजा अवश्य करते रहना। हे अनघ! तुम अपने नगरमें मेरी प्रतिमा स्थापित करना और प्रयत्नके साथ भक्तिपूर्वक तीनों समय मेरा पूजन करते रहना॥ १८-१९॥ | | शरत्काले महापूजा कर्तव्या मम सर्वदा।<br>नवरात्रविधानेन भक्तिभावयुतेन च॥ २०<br>चैत्रेऽश्विने तथाषाढे माघे कार्यो महोत्सवः।<br>नवरात्रे महाराज पूजा कार्या विशेषतः॥ २१ | शरत्कालमें सर्वदा नवरात्रविधानके अनुसार भक्तिभावसे युक्त होकर मेरी महापूजा करनी चाहिये। हे महाराज! चैत्र, आश्विन, आषाढ़ तथा माघमासमें नवरात्रके अवसरपर मेरा महोत्सव मनाना चाहिये और विशेषरूपसे मेरी महापूजा करनी चाहिये॥ २०-२१॥ | | कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां मम भक्तिसमन्वितैः।<br>कर्तव्या नृपशार्दूल तथाष्टम्यां सदा बुधैः॥ २२ | हे नृपशार्दूल! विज्ञजनोंको चाहिये कि वे भक्तियुक्त होकर कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तथा अष्टमीको सदा मेरी पूजा करें॥ २२॥ |

| अ० २४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६१ | | :--- | :--- | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्हिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी।<br>नता सुदर्शनेनाथ स्तुता च बहुविस्तरम्॥ २३ | व्यासजी बोले— राजा सुदर्शनके स्तुति तथा प्रणाम करनेके अनन्तर ऐसा कहकर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा अन्तर्धान हो गयीं॥ २३॥ | | अन्तर्हितां तु तां दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते।<br>प्रणेमुस्तं समागम्य यथा शक्रं सुरास्तथा॥ २४ | उन भगवतीको अन्तर्हित देखकर वहाँ उपस्थित सभी राजाओंने आकर सुदर्शनको उसी प्रकार प्रणाम किया जैसे देवता इन्द्रको प्रणाम करते हैं॥ २४॥ | | सुबाहुरपि तं नत्वा स्थितश्चाग्रे मुदान्वितः।<br>ऊचुः सर्वे महीपाला अयोध्याधिपतिं तदा॥ २५ | महाराज सुबाहु भी उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षपूर्वक उनके समक्ष खड़े हो गये। तदनन्तर उन सभी राजाओंने अयोध्यापति सुदर्शनसे कहा—॥ २५॥ | | त्वमस्माकं प्रभुः शास्ता सेवकास्ते वयं सदा।<br>कुरु राज्यमयोध्यायां पालयास्मान्नृपोत्तम॥ २६ | हे नृपश्रेष्ठ! आप हमारे स्वामी तथा शासक हैं और हम आपके सेवक हैं। अब आप अयोध्यामें राज्य करें और हमारा पालन करें॥ २६॥ | | त्वत्प्रसादान्महाराज दृष्टा विश्वेश्वरी शिवा।<br>आदिशक्तिर्भवानी सा चतुर्वर्गफलप्रदा॥ २७ | हे महाराज! आपकी कृपासे हमने धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली उन विश्वेश्वरी, शिवा और आदिशक्ति भवानीका दर्शन पा लिया॥ २७॥ | | धन्यस्त्वं कृतकृत्योऽसि बहुपुण्यो धरातले।<br>यस्माच्च त्वत्कृते देवी प्रादुर्भूता सनातनी॥ २८ | आप इस धरतीपर धन्य, कृतकृत्य और बड़े पुण्यात्मा हैं; क्योंकि आपके लिये साक्षात् सनातनी देवी प्रकट हुईं॥ २८॥ | | न जानीमो वयं सर्वे प्रभावं नृपसत्तम।<br>चण्डिकायास्तमोयुक्ता मायया मोहिताः सदा॥ २९<br>धनदारसुतानां च चिन्तनेऽभिरताः सदा।<br>मग्ना महार्णवे घोरे कामक्रोधझषाकुले॥ ३० | हे नृपसत्तम! तमोगुणसे युक्त और सदा मायासे मोहित रहनेवाले हम सभी लोग भगवती चण्डिकाका प्रभाव नहीं जानते। हम सदा धन, स्त्री और पुत्रोंकी चिन्तामें व्यग्र रहकर काम-क्रोधरूपी मत्स्योंसे भरे घोर महासागरमें डूबे रहते हैं॥ २९-३०॥ | | पृच्छामस्त्वां महाभाग सर्वज्ञोऽसि महामते।<br>केयं शक्तिः कुतो जाता किंप्रभावा वदस्व तत्॥ ३१ | हे महाभाग! हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव हम आपसे यह पूछ रहे हैं कि ये शक्ति कौन हैं, कहाँसे उत्पन्न हुई हैं और इनका कैसा प्रभाव है? वह सब बताइये॥ ३१॥ | | भव त्वं नौश्च संसारे साधवोऽति दयापराः।<br>तस्मान्नो वद काकुत्स्थ देवीमाहात्म्यमुत्तमम्॥ ३२ | साधु पुरुष बड़े दयालु होते हैं। अतएव आप हमारे लिये इस संसार-सागरकी नौका बन जाइये। हे काकुत्स्थ! अब आप भगवतीके उत्तम माहात्म्यका वर्णन कीजिये॥ ३२॥ | | यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा।<br>तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामस्त्वं ब्रूहि नृवरोत्तम॥ ३३ | हे नृपश्रेष्ठ! उनका जो प्रभाव हो, जो स्वरूप हो तथा वे जैसे प्रकट हुई हों; यह सब हम आपसे सुनना चाहते हैं, आप बतायें॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तदा तैस्तु ध्रुवसंधिसुतो नृपः।<br>विचिन्त्य मनसा देवीं तानुवाच मुदान्वितः॥ ३४ | व्यासजी बोले— राजाओंके यह पूछनेपर ध्रुवसन्धिके पुत्र राजा सुदर्शन मन-ही-मन भगवतीका स्मरण करके हर्षपूर्वक उनसे कहने लगे—॥ ३४॥ |

३७०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २४

| सुदर्शन उवाच | **सुदर्शन बोले—**हे राजाओ! उन जगदम्बाके उत्तम चरित्रको मैं क्या कहूँ; क्योंकि ब्रह्मा आदि तथा इन्द्रसहित सभी देवता भी उन्हें नहीं जानते॥ ३५॥ | | किं ब्रवीमि महीपालास्तस्याश्चरितमुत्तमम्।<br>ब्रह्मादयो न जानन्ति सेशाः सुरगणास्तथा॥ ३५ | | | सर्वस्याद्या महालक्ष्मीर्वरेण्या शक्तिरुत्तमा।<br>सात्त्विकीयं महीपाला जगत्पालनतत्परा॥ ३६ | हे राजाओ! वे भगवती सबकी आदिरूपा हैं, महालक्ष्मीके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, वे वरेण्य हैं और उत्तम सात्त्विकी शक्तिके रूपमें समस्त विश्वका पालन करनेमें तत्पर रहती हैं॥ ३६॥ | | सृजते या रजोरूपा सत्त्वरूपा च पालने।<br>संहारे च तमोरूपा त्रिगुणा सा सदा मता॥ ३७ | वे अपने रजोगुणी स्वरूपसे सृष्टि करती, सत्त्वगुणी स्वरूपसे पालन करती और तमोगुणी स्वरूपसे इसका संहार करती हैं, इसी कारण वे त्रिगुणात्मिका कही गयी हैं। | | निर्गुणा परमा शक्तिः सर्वकामफलप्रदा।<br>सर्वेषां कारणं सा हि ब्रह्मादीनां नृपोत्तमाः॥ ३८ | परम शक्तिस्वरूपा निर्गुणा भगवती समस्त कामनाएँ पूर्ण कर देती हैं। हे श्रेष्ठ राजाओ! वे ब्रह्मा आदि सभी देवताओंकी भी आदिकारण हैं॥ ३७-३८॥ | | निर्गुणा सर्वथा ज्ञातुमशक्या योगिभिर्नृपाः।<br>सगुणा सुखसेव्या सा चिन्तनीया सदा बुधैः॥ ३९ | हे राजाओ! योगीलोग भी निर्गुणा भगवतीको जाननेमें सर्वथा असमर्थ हैं। अतः बुद्धिमानोंको चाहिये कि सरलतापूर्वक सेवनीय सगुणा भगवतीकी निरन्तर आराधना करें॥ ३९॥ | | राजान ऊचुः<br>बाल एव वनं प्राप्तस्त्वं तु नूनं भयातुरः।<br>कथं ज्ञाता त्वया देवी परमा शक्तिरुत्तमा॥ ४० | **राजागण बोले—**बाल्यावस्थामें ही आप वनवासी हो गये थे तथा भयसे व्याकुल थे। तब आपको उन उत्तम परमा शक्तिका ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?॥ ४०॥ | | उपासिता कथं चैव पूजिता च कथं नृप।<br>या प्रसन्ना तु साहाय्यं चकार त्वरयान्विता॥ ४१ | हे नृप! आपने उनकी उपासना और पूजा कैसे की, जिससे शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न होकर उन्होंने आपकी सहायता की॥ ४१॥ | | सुदर्शन उवाच<br>बालभावान्मया प्राप्तं बीजं तस्याः सुसम्मतम्।<br>स्मरामि प्रजपन्नित्यं कामबीजाभिधं नृपाः॥ ४२ | **सुदर्शन बोले—**हे राजाओ! बाल्यकालमें ही मुझे उनका अतिश्रेष्ठ बीजमन्त्र प्राप्त हो गया था। मैं उसी कामराज नामक बीजमन्त्रका सदा जप करता हुआ भगवतीका स्मरण करता रहता हूँ॥ ४२॥ | | ऋषिभिः कथ्यमाना सा मया ज्ञाताम्बिका शिवा।<br>स्मरामि तां दिवारात्रं भक्त्या परमया पराम्॥ ४३ | ऋषियोंके द्वारा उन कल्याणमयी भगवतीके विषयमें बताये जानेपर मैंने उन्हें जाना और तभीसे मैं परम भक्तिके साथ दिन-रात उन परा शक्तिका स्मरण किया करता हूँ॥ ४३॥ | | व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य राजानो भक्तितत्पराः।<br>तां मत्वा परमां शक्तिं निर्ययुः स्वगृहान्प्रति॥ ४४ | **व्यासजी बोले—**सुदर्शनका वचन सुनकर वे राजा भी भक्तिपरायण हो गये और उन देवीको ही परम शक्ति मानकर अपने-अपने घर चले गये॥ ४४॥ | | सुबाहुरगमत्काश्यां तमापृच्छ्य सुदर्शनम्।<br>सुदर्शनोऽपि धर्मात्मा निर्जगाम सुकोसलान्॥ ४५ | सुदर्शनसे अनुमति लेकर महाराज सुबाहु काशी चले गये और धर्मात्मा सुदर्शन वहाँसे अयोध्याकी ओर चल पड़े॥ ४५॥ |