देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 366, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 366
| अ० २२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सविष्टरं चाचमनीयमर्घ्यं<br>वस्त्रद्वयं गामथ कुण्डले द्वे।<br>समर्प्य तस्मै विधिवन्नरेन्द्र<br>ऐच्छत्सुतादानमहीनमत्त्वः ॥ ९ | वरको विष्टर, आचमन, अर्घ्य, दो वस्त्र, गौ और दो कुण्डल विधिवत् प्रदान करके महामनस्वी राजा सुबाहुने कन्यादान कर दिया ॥ ९ ॥ |
| सोऽप्यग्रहीत्सर्वमदीनचेताः<br>शशाम चिन्ताथ मनोरमायाः।<br>कन्यां सुकेशीं निधिकन्यकासमां<br>मेने तदात्मानमनुत्तमञ्च ॥ १० | उदार हृदयवाले सुदर्शनने भी सभी वस्तुएँ स्वीकार कर लीं। अब मनोरमाकी चिन्ता दूर हो गयी। उस समय कुबेरपुत्रीके समान उस सुन्दर केशोंवाली शशिकलाको पाकर सुदर्शनने अपने आपको परम धन्य समझा॥ १०॥ |
| सुपूजितं भूषणवस्त्रदानै-<br>र्वरोत्तमं तं सचिवास्तदानीम्।<br>निन्युश्च ते कौतुकमण्डपान्त-<br>र्मुदान्विता वीतभयाश्च सर्वे॥ ११ | उस समय आनन्दित एवं निर्भीक सभी मन्त्री राजाद्वारा आभूषण तथा वस्त्र देकर सम्यक् रूपसे पूजित श्रेष्ठ वर सुदर्शनको कौतुकमण्डपमें ले गये ॥ ११ ॥ |
| समाप्तभूषां विधिवद्विधिज्ञाः<br>स्त्रियश्च तां राजसुतां सुयाने।<br>आरोप्य निन्युर्वरसन्निधानं<br>चतुष्कयुक्ते किल मण्डपे वै॥ १२ | तदनन्तर विधिकी जानकार स्त्रियाँ राजकुमारीको वस्त्राभूषणोंसे विधिवत् सुसज्जित करके उसे सुन्दर पालकीमें बिठाकर चौकोर वेदीसे युक्त मण्डपमें वरके पास ले गयीं ॥ १२ ॥ |
| अग्निं समाधाय पुरोहितः स<br>हुत्वा यथावच्च तदन्तराले।<br>आह्वयायत्तौ कृतकौतुकौ तु<br>वधूवरौ प्रेमयुतौ निकामम्॥ १३<br>लाजाविसर्गं विधिवद्विधाय<br>कृत्वा हुताशस्य प्रदक्षिणाञ्च।<br>तौ चक्रतुस्तत्र यथोचितं तत्<br>सर्वं विधानं कुलगोत्रजातम्॥ १४ | उस वेदीपर पुरोहितने अग्नि-स्थापन करके और विधिवत् घृताहुति देकर कौतुकागारमें कौतुक किये हुए प्रेमरससे अत्यन्त सिक्त वर-वधूको बुलाया। उन दोनोंने विधिवत् लाजाहोम करनेके बाद अग्निकी प्रदक्षिणा करके अपने-अपने कुल तथा गोत्रकी समस्त रीतियाँ सम्पन्न कीं ॥ १३-१४॥ |
| शतद्वयं चाश्वयुजां रथानां<br>सुभूषितं चापि शरौघसंयुक्तम्।<br>ददौ नृपेन्द्रस्तु सुदर्शनाय<br>सुपूजितं पारिबर्हं विवाहे ॥ १५<br>मदोत्कटान्हेमविभूषितांश्च<br>गजानगेः शृङ्गसमानदेहान्।<br>शतं सपादं नृपसूनवेऽसौ<br>ददावथ प्रेमयुतो नृपेन्द्रः॥ १६ | महाराज सुबाहुने घोड़ोंसे जुते तथा अत्यधिक बाणोंसे लदे हुए दो सौ सुसज्जित रथ सुदर्शनको विवाहमें उपहारस्वरूप दिये। उन्होंने मदमत्त, सुवर्णके भूषणोंसे विभूषित तथा पर्वतके शिखरके समान शरीरवाले सवा सौ हाथी राजकुमार सुदर्शनको प्रेमपूर्वक प्रदान किये ॥ १५-१६ ॥ |