भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| ३५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ | | :--- | :--- |

| दासीशतं काञ्चनभूषितं च<br>करेणुकानां च शतं सुचारु।<br>समर्पयामास वराय राजा<br>विवाहकाले मुदितोऽनुवेलम् ॥ १७<br>अदात्पुनर्दाससहस्रमेकं<br>सर्वायुधैः सम्भृतभूषितञ्च।<br>रत्नानि वासांसि यथोचितानि<br>दिव्यानि चित्राणि तथाविकानि ॥ १८ | विवाहके समय राजाने स्वर्णभूषणोंसे अलंकृत सौ दासियाँ और सुन्दर-सुन्दर सौ हथिनियाँ प्रसन्नतापूर्वक बार-बार वरको समर्पित कीं। उन्होंने सब प्रकारके आयुधों और आभूषणोंसे सुसज्जित एक हजार सेवक, बहुत-से रत्न, रंग-बिरंगे दिव्य सूती तथा ऊनी वस्त्र यथोचित रूपसे दिये ॥ १७-१८ ॥ | | ददौ पुनर्वासगृहाणि तस्मै<br>रम्याणि दीर्घाणि विचित्रितानि।<br>सिन्धूद्भवानां तुरगोत्तमाना-<br>मदात्सहस्रद्वितयं सुरम्यम् ॥ १९<br>क्रमेलकानां च शतत्रयं वै<br>प्रत्यादिशद्भारभृतां सुचारु।<br>शतद्वयं वै शकटोत्तमानां<br>तस्मै ददौ धान्यरसैः प्रपूरितम् ॥ २० | निवासके लिये रंग-बिरंगे, सुन्दर और विशाल भवन, सिन्धुदेशके उत्तम दो हजार घोड़े, भार ढोनेमें कुशल सुन्दर तीन सौ ऊँट, अन्न एवं रससे परिपूर्ण दो सौ उत्तम बैलगाड़ियाँ भी प्रदान कीं ॥ १९-२० ॥ | | मनोरमां राजसुतां प्रणम्य<br>जगाद वाक्यं विहिताञ्जलिः पुरः।<br>दासोऽस्मि ते राजसुते वरिष्ठे<br>तद् ब्रूहि यत्स्यात्तु मनोगतं ते ॥ २१ | पश्चात् राजा सुबाहुने हाथ जोड़कर राजमाता मनोरमाको प्रणाम करके कहा—हे राजकुमारी! मैं आपका सेवक हूँ, अतः आपका जो मनोवांछित हो उसे कहिये ॥ २१ ॥ | | तं चारुवाक्यं निजगाद सापि<br>स्वस्त्यस्तु ते भूप कुलस्य वृद्धिः।<br>सम्मानिताहं मम सूनवे त्वया<br>दत्ता यतो रत्नवरा स्वकन्या ॥ २२ | तब उस मनोरमाने भी सुबाहुसे मधुर वाणीमें कहा—हे राजन्! आपका कल्याण हो, आपके वंशकी वृद्धि हो। आपने मेरा बहुत सम्मान किया; क्योंकि आपने अपनी रत्नमयी कन्या मेरे पुत्रको प्रदान की है ॥ २२ ॥ | | न बन्दिपुत्री नृप मागधी वा<br>स्तौमीह किं त्वां स्वजनं महत्तरम्।<br>सुमेरुतुल्यस्तु कृतः सुतोऽद्य मे<br>सम्बन्धिना भूपतिनोत्तमेन ॥ २३<br>अहोऽतिचित्रं नृपतेश्चरित्रं<br>परं पवित्रं तव किं वदामि।<br>यद् भ्रष्टराज्याय सुताय मेऽद्य<br>दत्ता त्वया पूज्यसुता वरिष्ठा ॥ २४<br>वनाधिवासाय किलाधनाय<br>पित्रा विहीनाय विसैन्यकाय।<br>सर्वानिमान्भूमिपतीन्विहाय<br>फलाशनायार्थविवर्जिताय ॥ २५ | हे राजन्! मैं [यश गानेमें कुशल] बन्दीजन और मागधोंकी पुत्री नहीं हूँ, [जो भलीभाँति आपकी प्रशंसा कर सकूँ।] आप तो अपने ही हैं, अतः आप श्रेष्ठ स्वजनकी मैं क्या स्तुति करूँ ? आप एक उत्तम नरेश हैं और मेरे सम्बन्धी हो गये हैं; आपने मेरे पुत्रको सुमेरुके समान बना दिया है। अहो! महान् आश्चर्य है! आप-जैसे राजाके पवित्र चरित्रका वर्णन कहाँतक करूँ, जो कि आपने इन सभी राजाओंको छोड़कर राज्यसे च्युत, वनमें निवास करनेवाले, धनहीन, पिताविहीन, सेनारहित, फलके आहारपर ही रहनेवाले तथा सम्पत्तिहीन मेरे पुत्रको अपनी प्रिय तथा कुलीन कन्या प्रदान कर दी ॥ २३–२५ ॥ |