देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० २२ ] | तृतीय स्कन्ध | ३५९ | | :--- | :--- | | समानवित्तेऽथ कुले बले च<br>ददाति पुत्रीं नृपतिश्च भूयः।<br>न कोऽपि मे भूप सुतेऽर्थहीने<br>गुणान्वितां रूपवतीञ्च दद्यात्॥ २६ | अपने समान धन, कुल और बलवालेको ही कोई अपनी पुत्री प्रदान करता है। हे राजन्! आपको छोड़कर कोई भी राजा मेरे धनहीन पुत्रको अपनी रूपगुणसम्पन्ना पुत्री नहीं दे सकता॥ २६॥ | | वैरं तु सर्वैः सह संविधाय<br>नृपैर्वरिष्ठैर्बलसंयुतैश्च।<br>सुदर्शनायाथ सुतार्पिता मे<br>किं वर्णये धैर्यमिदं त्वदीयम्॥ २७ | सभी महान् तथा बलशाली राजाओंसे शत्रुता लेकर आपने मेरे सुदर्शनको अपनी कन्या अर्पित की है—हे राजन्! मैं आपके इस धैर्यका वर्णन क्या करूँ?॥ २७॥ | | निशम्य वाक्यानि नृपः प्रहृष्टः<br>कृताञ्जलिर्वाक्यमुवाच भूयः।<br>गृहाण राज्यं मम सुप्रसिद्धं<br>भवामि सेनापतिरद्य चाहम्॥ २८<br>नोचेत्तदर्धं प्रतिगृह्य चात्र<br>सुतान्वितो राज्यफलानि भुङ्क्ष्व।<br>विहाय वाराणसिकानिवासं<br>वने पुरे वा स मतो न मेऽस्ति॥ २९ | इस प्रकार मनोरमाके [कृतज्ञतापूर्ण] वचन सुनकर महाराज सुबाहुने प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर पुनः यह वचन कहा—मेरा यह अति प्रसिद्ध राज्य आप ले लीजिये और आजसे मैं आपका सेनापति हो जा रहा हूँ; नहीं तो आप आधा राज्य ही ले लें और अपने पुत्रके साथ यहीं रहकर राजसी भोग भोगें; क्योंकि अब काशीमें निवास छोड़कर किसी वन या ग्राममें आपलोग रहें—ऐसा मेरा विचार नहीं है॥ २८-२९॥ | | नृपास्तु सन्त्येव रुषान्विता वै<br>गत्वा करिष्ये प्रथमं तु सान्त्वनम्।<br>ततः परं द्वावपरावुपायौ<br>नोचेत्ततो युद्धमहं करिष्ये॥ ३० | सभी उपस्थित भूपगण मुझपर अत्यन्त रुष्ट हैं। मैं जाकर पहले उन्हें शान्त करूँगा। इसके बाद दान एवं भेदनीतिका विधान करूँगा। यदि इसपर भी वे अनुकूल न होंगे तो उनसे युद्ध करूँगा॥ ३०॥ | | जयाजयौ दैववशौ तथापि<br>धर्मे जयो नैव कृतेऽप्यधर्मे।<br>तेषां किलाधर्मवतां नृपाणां<br>कथं भविष्यत्यनुचिन्तितं वै॥ ३१ | यद्यपि हार और जीत तो दैवाधीन हैं तथापि जिस पक्षमें धर्म रहता है, उसकी विजय होती है; अधर्मके पक्षवालेकी कभी नहीं। अतः अधर्मसे युक्त उन राजाओंका अपना सोचा हुआ कैसे हो सकता है?॥ ३१॥ | | आकर्ण्य तद्भाषितमर्थवच्च<br>जगाद वाक्यं हितकारकं तम्।<br>मनोरमा मानमवाप्य तस्मात्<br>सर्वात्मना मोदयुता प्रसन्ना॥ ३२<br>राजञ्छिवं तेऽस्तु कुरुष्व राज्यं<br>त्यक्त्वा भयं त्वं स्वसुतैः समेतः।<br>सुतोऽपि मे नूनमवाप्य राज्यं<br>साकेतपुर्यां प्रचरिष्यतीह॥ ३३ | उन सुबाहुसे सम्मान पाकर पूर्णरूपसे आनन्दमग्न मनोरमा उनकी सारगर्भित वाणी सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे हितकर वचन कहने लगी—हे राजन्! आपका कल्याण हो। आप निर्भय होकर अपने पुत्रोंके साथ राज्य कीजिये। मेरा पुत्र भी निश्चय ही अपना राज्य पाकर साकेतपुरी अयोध्यामें शासन करेगा॥ ३२-३३॥ |