देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः
शशिकलाका गुप्त स्थानमें सुदर्शनके साथ विवाह, विवाहकी बात जानकर राजाओंका सुबाहुके प्रति क्रोध प्रकट करना तथा सुदर्शनका मार्ग रोकनेका निश्चय करना
| व्यास उवाच | |
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| श्रुत्वा सुतावाक्यमनिन्दितात्मा<br>नृपांश्च गत्वा नृपतिर्जगाद।<br>व्रजन्तु कामं शिविराणि भूपाः<br>श्वो वा विवाहं किल संविधास्ये॥ १ ॥ | **व्यासजी बोले—**पवित्र अन्तःकरणवाले राजा सुबाहु कन्याकी बात सुनकर राजाओंके पास जाकर बोले—हे महाराजाओ! आपलोग इस समय अपने-अपने शिविरमें जायें, मैं कन्याका विवाह कल करूँगा॥ १ ॥ |
| भक्ष्याणि पेयानि मयार्पितानि<br>गृह्णन्तु सर्वे मयि सुप्रसन्नाः।<br>श्वो भावि कार्यं किल मण्डपेऽत्र<br>समेत्य सर्वैरिह संविधेयम्॥ २ ॥ | आपलोग मुझपर कृपा करके मेरे द्वारा अर्पित की गयी भोज्य वस्तुएँ स्वीकार करें। अब यह विवाहकार्य कल पुनः इसी स्वयंवर-मण्डपमें होगा। हम सब मिलकर उसे सम्पन्न करेंगे॥ २ ॥ |
| नायाति पुत्री किल मण्डपेऽद्य<br>करोमि किं भूपतयोऽत्र कामम्।<br>प्रातः समाश्वास्य सुतां नयिष्ये<br>गच्छन्तु तस्माच्छिविराणि भूपाः॥ ३ ॥ | हे नृपतिगण! आज मेरी पुत्री मण्डपमें नहीं आ रही है। मैं क्या करूँ? कल प्रातः पुत्रीको समझा-बुझाकर अवश्य लाऊँगा। अब सभी राजागण अपने-अपने शिविरमें चलें। बुद्धिमानोंको अपने आश्रितजनोंके प्रति विरोधभाव नहीं रखना चाहिये और अपनी सन्तानपर तो निरन्तर विशेष कृपा करनी चाहिये। हे नृपगण! प्रातःकाल समझा-बुझाकर मैं अपनी पुत्रीको यहाँ ले आऊँगा; इस समय आपलोग जायें॥ ३-४॥ |
| न विग्रहो बुद्धिमतां निजाश्रिते<br>कृपा विधेया सततं ह्यपत्ये।<br>विधाय तां प्रातरिहानयिष्ये<br>सुतां तु गच्छन्तु नृपा यथेष्टम्॥ ४ ॥ | |
| इच्छापणं वा परिचिन्त्य चित्ते<br>प्रातः करिष्याम्यथ संविवाहम्।<br>सर्वैः समेत्यात्र नृपैः समेतैः<br>स्वयंवरः सर्वमतेन कार्यः॥ ५ ॥ | मैं इच्छास्वयंवरकी बातको भलीभाँति सोचकर प्रातः कन्याका विवाह कर दूँगा। एक साथ सभी राजाओंके उपस्थित हो जानेपर सबकी सम्मतिसे स्वयंवरका कार्य सम्पन्न होगा॥ ५॥ |
| श्रुत्वा नृपास्तेऽवितथं विदित्वा<br>वचो ययुः स्वानि निकेतनानि।<br>विधाय पार्श्वे नगरस्य रक्षां<br>चक्रुः क्रिया मध्यदिनोदिताश्च॥ ६ ॥ | सुबाहुकी वाणी सुनकर सभी राजागण उसे सच मानकर अपने-अपने शिविरमें चले गये और नगरके आस-पास रक्षाका सम्यक् प्रबन्ध करके वे मध्याह्नकालकी क्रियाओंमें संलग्न हो गये॥ ६॥ |
| सुबाहुरप्यार्यजनैः समेत-<br>श्चकार कार्याणि विवाहकाले।<br>पुत्रीं समाहूय गृहे सुगुप्ते<br>पुरोहितैर्वेदविदां वरिष्ठैः॥ ७ ॥ | उधर राजा सुबाहु भी श्रेष्ठजनोंके साथ अपने अन्तःपुरके एक गुप्त स्थानमें अपनी पुत्रीको बुलाकर वरिष्ठ वैदिक पुरोहितोंद्वारा विवाह-कृत्य सम्पन्न करनेका प्रयत्न करने लगे॥ ७॥ |
| स्नानादिकं कर्म वरस्य कृत्वा<br>विवाहभूषाकरणं तथैव।<br>आनाय्य वेदीरचिते गृहे वै<br>तस्यार्हणां भूमिपतिश्चकार॥ ८ ॥ | वरको स्नानादि कर्म कराकर उसे विवाहके योग्य वस्त्राभूषण पहनाकर और उसे वेदीरचित गृहमें ले आकर राजा सुबाहुने उसका पूजन किया॥ ८॥ |
1897 श्रीमद्देवी...महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 D