देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 364, कुल 889 में से
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अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५५
| मनसा विधृतं त्यक्त्वा कथमन्यं वृणे पितः।<br>कृते पणे महाराज सर्वेषां वशगा ह्यहम्॥ ५०<br><br>एकः पालयिता द्वौ वा बहवो वा भवन्ति चेत्।<br>किं कर्तव्यं तदा तात विवादे समुपस्थिते॥ ५१<br><br>संशयाधिष्ठिते कार्ये मतिं नाहं करोम्यतः।<br>मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र देहि सुदर्शनाय माम्॥ ५२<br><br>विवाहं विधिना कृत्वा शं विधास्यति चण्डिका।<br>यन्नामकीर्तनादेव दुःखौघो विलयं व्रजेत्॥ ५३<br><br>तां स्मृत्वा परमां शक्तिं कुरु कार्यमतन्द्रितः। | पिताजी! मनसे वरण किये गये सुदर्शनको छोड़कर मैं दूसरेका वरण कैसे करूँ? हे महाराज! दूसरी बात यह भी है कि पणस्वयंवर करनेमें मुझे सबके अधीन रहना पड़ेगा। हे तात! यदि इनमेंसे एक, दो या अनेकने आपका प्रण पूरा कर दिया तब उस समय विवादकी स्थिति उत्पन्न हो जानेपर आप क्या करेंगे? अतः मैं किसी संशयात्मक कार्यमें पड़ना नहीं चाहती। हे राजेन्द्र! आप चिन्ता न करें और विधिपूर्वक मेरा विवाह करके मुझे सुदर्शनको सौंप दीजिये। जिनके नामका संकीर्तन करनेसे समस्त दुःखराशि विलीन हो जाती है, वे भगवती चण्डिका अवश्य कल्याण करेंगी। अब आप उन्हीं महाशक्तिका स्मरण करके पूरी तत्परताके साथ यह कार्य कीजिये॥ ४८—५३ १/२॥ |
| गत्वा वद नृपेभ्यस्त्वं कृताञ्जलिपुटोऽद्य वै॥ ५४<br><br>आगन्तव्यञ्च श्वः सर्वैरिह भूपैः स्वयंवरे।<br>इत्युक्त्वा त्वं विसृज्याशु सर्वं नृपतिमण्डलम्॥ ५५<br><br>विवाहं कुरु रात्रौ मे वेदोक्तविधिना नृप।<br>पारिबर्हं यथायोग्यं दत्त्वा तस्मै विसर्जया॥ ५६ | अभी जा करके दोनों हाथ जोड़कर आप उन राजाओंसे कहिये कि आप सभी राजागण इस स्वयंवरमें कल पधारें। ऐसा कहकर सम्पूर्ण राजसमुदायको शीघ्र ही विसर्जित करके वैदिक रीतिसे सुदर्शनके साथ रातमें मेरा विवाह कर दीजिये। हे राजन्! तत्पश्चात् उन्हें यथोचित उपहार देकर विदा कर दीजिये॥ ५४—५६॥ |
| गमिष्यति गृहीत्वा मां ध्रुवसन्धिंसुतः किल।<br>कदाचित्ते नृपाः क्रुद्धाः संग्रामं कर्तुमुद्यताः॥ ५७<br><br>भविष्यन्ति तदा देवी साहाय्यं नः करिष्यति।<br>सोऽपि राजसुतस्तैस्तु संग्रामं संविधास्यति॥ ५८<br><br>दैवान्मृधे मृते तस्मिन्मरिष्याम्यहमप्युत।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गृहे तिष्ठ दत्त्वा मां सहसैन्यकः॥ ५९<br><br>एकैवाहं गमिष्यामि तेन सार्धं रिरंसया। | तदनन्तर महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन मुझे साथ लेकर चले जायेंगे। इससे कुपित हुए राजा यदि युद्ध करनेको उद्यत होंगे तो उस समय भगवती हमारी सहायता करेंगी, जिससे वे राजकुमार सुदर्शन भी उन लोगोंके साथ संग्राम करनेमें अवश्य समर्थ होंगे। दैवयोगसे यदि वे युद्धमें मारे गये तो मैं प्राण त्याग दूँगी। आपका कल्याण हो। आप मुझे सुदर्शनको सौंपकर अपनी सेनाके साथ महलमें सुखपूर्वक रहें। मैं भी विहार करनेकी कामनासे उनके साथ अकेली ही चली जाऊँगी॥ ५७—५९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्या वचः श्रुत्वा राजासौ कृतनिश्चयः।<br>मतिं चक्रे तथाकर्तुं विश्वासं प्रतिपद्य च॥ ६० | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उस शशिकलाका वचन सुनकर दृढ़प्रतिज्ञ राजा सुबाहुने उसे पूर्णरूपसे विश्वस्त करके ठीक वैसा ही करनेका निश्चय कर लिया॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कन्यया स्वपितरं प्रति सुदर्शनेन सह विवाहार्थकथनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 C