देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
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| सुखमिच्छसि चेन्मह्यं तुभ्यं वा मृगलोचने।<br>इति मात्रा बोधितां तां पश्चाद्राजाप्यबोधयत्॥ ३६<br>उभयोर्वचनं श्रुत्वा निर्भयोवाच कन्यका। | इस प्रकार माताके समझानेके बाद पिताने भी उसे समझाया। उन दोनोंकी बातें सुनकर कन्या शशिकला निर्भय होकर कहने लगी॥ ३६ १/२॥ | | कन्योवाच<br>सत्यमुक्तं नृपश्रेष्ठ जानासि च व्रतं मम॥ ३७<br>नान्यं वृणोमि भूपाल सुदर्शनमृते क्वचित्।<br>विभेषि यदि राजेन्द्र नृपेभ्यः किल कातरः॥ ३८<br>सुदर्शनाय दत्त्वा मां विसर्जय पुराद्वहिः।<br>स मां रथे समारोप्य निर्गमिष्यति ते पुरात्॥ ३९<br>भवितव्यं तु पश्चाद्वै भविष्यति न चान्यथा।<br>नात्र चिन्ता त्वया कार्या भवितव्ये नृपोत्तम॥ ४०<br>यद्भावि तद्भवत्येव सर्वथात्र न संशयः। | कन्या बोली—हे नृपश्रेष्ठ! आप ठीक कह रहे हैं किंतु आप मेरे प्रणको तो जानते ही हैं। हे राजन्! मैं सुदर्शनको छोड़कर और किसीका भी वरण नहीं कर सकती। हे राजेन्द्र! यदि आप राजाओंसे डरते हैं और बहुत घबड़ाये हुए हैं तो मुझे सुदर्शनको सौंपकर नगरसे बाहर कर दीजिये। वे मुझे रथपर बैठाकर आपके नगरसे बाहर निकल जायँगे। हे नृपश्रेष्ठ! जो होना है वह तो बादमें अवश्य होगा; इसके विपरीत नहीं होगा। अब आप होनीके विषयमें चिन्ता न करें; क्योंकि जो होना है वह तो निश्चितरूपसे होता ही है; इसमें संशय नहीं है॥ ३७—४० १/२॥ | | राजोवाच<br>न पुत्रि साहसं कार्यं मतिमद्भिः कदाचन॥ ४१<br>बहुभिर्न विरोद्धव्यमिति वेदविदो विदुः।<br>विस्रक्ष्यामि कथं कन्यां दत्त्वा राजसुताय च॥ ४२<br>राजानो वैरसंयुक्ताः किन्नु कुर्युःसाम्प्रतम्।<br>यदि ते रोचते वत्से पणं संविदधाम्यहम्॥ ४३<br>जनकेन यथा पूर्वं कृतः सीतास्वयंवरे।<br>शैव धनुर्यथा तेन धृतं कृत्वा पणं तथा॥ ४४<br>तथाहमपि तन्वङ्गि करोम्यद्य दुरासदम्।<br>विवादो येन राज्ञां वै कृते सति शमं व्रजेत्॥ ४५<br>पालयिष्यति यः कामं स ते भर्ता भविष्यति।<br>सुदर्शनस्तथान्य वा यः कश्चिद् बलवत्तरः॥ ४६<br>पालयित्वा पणं त्वां वै वरयिष्यति सर्वथा।<br>एवं कृते नृपाणां तु विवादः शमितो भवेत्॥ ४७<br>सुखेनाहं विवाहं ते करिष्यामि ततः परम्। | राजा बोले—हे पुत्रि! बुद्धिमानोंको कभी ऐसा साहस नहीं करना चाहिये। वेदज्ञोंने कहा है कि बहुतोंसे विरोध नहीं करना चाहिये। पुत्रीको उस राजकुमारको सौंपकर कैसे विदा कर दूँ? मुझसे वैर साधे हुए ये राजागण न जाने कौन-सा अनिष्ट कर डालेंगे। इसलिये हे पुत्रि! यदि तुम पसन्द करो तो मैं कोई शर्त रख दूँ, जैसा कि पूर्वकालमें राजा जनकने सीतास्वयंवरमें किया था। हे तन्वंगि! जैसे उन्होंने शिव-धनुष तोड़नेकी शर्त रख दी थी, वैसे ही मैं भी कोई ऐसी कठोर शर्त रख दूँ जिससे ऐसा कर देनेपर राजाओंका विवाद ही समाप्त हो जाय। जो उस प्रतिज्ञाको पूरा करेगा, वही तुम्हारा पति होगा। सुदर्शन हो अथवा कोई दूसरा—जो भी अधिक बलशाली होगा, वह मेरी प्रतिज्ञा पूरी करके तुम्हारा वरण कर लेगा। ऐसा करनेसे राजाओंमें उत्पन्न कलह निश्चितरूपसे शान्त हो जायगा और उसके बाद मैं आनन्दपूर्वक तुम्हारा विवाह कर दूँगा॥ ४१—४७ १/२॥ | | कन्योवाच<br>सन्देहे नैव मज्जामि मूर्खकृत्यमिदं यतः॥ ४८<br>मया सुदर्शनः पूर्वं धृतश्चेतसि नान्यथा।<br>कारणं पुण्यपापानां मन एव महीपते॥ ४९ | कन्या बोली—मैं इस सन्दिग्ध कार्यमें नहीं पहूँगी; क्योंकि यह मूर्खोंका काम है। मैंने अपने मनमें सुदर्शनका पहलेसे ही वरण कर लिया है, अब दूसरेको स्वीकार नहीं कर सकती। हे महाराज! पुण्य तथा पापका कारण तो मन ही है। इसलिये हे |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 B