देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 372, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 372
| अ० २३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| केचिच्च प्रेक्षकास्तस्य सहानीकैः स्थितास्तदा ।<br>युधाजिदग्रतो गत्वा सुदर्शनमुपस्थितः ॥ १६<br><br>शत्रुजित्तेन सहितो हन्तुं भ्रातरमानुजः ।<br>परस्परं ते बाणौघैस्ततक्षुः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ १७<br><br>सम्मर्दः सुमहांस्तत्र सम्प्रवृत्तः सुमार्गणेः ।<br>काशीपतिस्तदा तूर्णं सैन्येन बहुना वृतः ॥ १८ | सन्नद्ध थे। उनमें कुछ राजागण अपनी सेनाके साथ दर्शकके रूपमें खड़े थे। तभी युधाजित् आगे बढ़कर सुदर्शनके समक्ष जा डटा। उसके साथ शत्रुजित् भी अपने भाईका वध करनेके लिये आ गया। तब क्रोधके वशीभूत होकर वे सब परस्पर एक-दूसरेपर बाणोंसे प्रहार करने लगे। इस प्रकार वहाँ बाणोंद्वारा बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया। तब काशीनरेश सुबाहु एक विशाल सेना लेकर अपने सुशंसित जामाताकी सहायताके लिये जा पहुँचे ॥ १५-१८ १/२ ॥ |
| साहाय्यार्थं जगामाशु जामातरमनिन्दितम्।<br>एवं प्रवृत्ते संग्रामे दारुणे लोमहर्षणे ॥ १९<br><br>प्रादुर्बभूव सहसा देवी सिंहोपरि स्थिता ।<br>नानायुधधरा रम्या वराभूषणभूषिता ॥ २० | इस प्रकार भयानक लोमहर्षक संग्राम छिड़ जानेपर सहसा भगवती प्रकट हो गयीं। वे सिंहपर सवार थीं, विविध प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण किये थीं, अत्यन्त मनोहर थीं तथा उत्तम आभूषणोंसे अलंकृत थीं, दिव्य वस्त्र पहने थीं और मन्दारकी मालासे सुशोभित थीं ॥ १९-२० १/२ ॥ |
| दिव्याम्बरपरीधाना मन्दारस्रक्सुसंयुता ।<br>तां दृष्ट्वा तेऽथ भूपाला विस्मयं परमं गताः ॥ २१<br><br>केयं सिंहसमारूढा कुतो वेति समुत्थिता ।<br>सुदर्शनस्तु तां वीक्ष्य सुबाहुमिति चाब्रवीत् ॥ २२<br><br>पश्य राजन् महादेवीमागतां दिव्यदर्शनाम्।<br>अनुग्रहाय मे नूनं प्रादुर्भूता दयान्विता ॥ २३ | उन्हें देखकर वे राजागण अत्यन्त चकित हो गये। वे कहने लगे कि सिंहपर सवार यह स्त्री कौन है और कहाँसे प्रकट हो गयी है? उन्हें देखकर सुदर्शनने सुबाहुसे कहा—हे राजन्! यहाँ प्रादुर्भूत हुई इन दिव्य दर्शनवाली महादेवीको आप देखें। ये दयामयी भगवती निश्चय ही मुझपर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई हैं। हे महाराज! मैं निर्भय तो पहले ही था, किंतु अब और भी अधिक निर्भय हो गया ॥ २१-२३ १/२ ॥ |
| निर्भयोऽहं महाराज जातोऽस्मि निर्भयादपि ।<br>सुदर्शनः सुबाहुश्च तामालोक्य वराननाम् ॥ २४<br><br>प्रणामं चक्रतुस्तस्या मुदितौ दर्शनेन च।<br>ननाद च तदा सिंहो गजास्त्रस्ताश्चकम्पिरे ॥ २५ | सुदर्शन और सुबाहुने उन सुमुखी भगवतीको देखकर उन्हें प्रणाम किया। उनके दर्शनसे वे दोनों प्रसन्न हो गये। उसी समय भगवतीके सिंहने भीषण गर्जन किया, जिससे उस रणभूमिमें विद्यमान सभी हाथी भयसे काँपने लगे। उस समय महाभीषण आँधी चलने लगी और सभी दिशाएँ अत्यन्त भयानक हो गयीं ॥ २४-२५ १/२ ॥ |
| ववुर्वाता महाघोरा दिशश्चासान्त्सुदारुणाः ।<br>सुदर्शनस्तदा प्राह निजं सेनापतिं प्रति ॥ २६<br><br>मार्गे व्रज त्वं तरसा भूपाला यत्र संस्थिताः ।<br>किं करिष्यन्ति राजानः कुपिता दुष्टचेतसः ॥ २७<br><br>शरणार्थञ्च सम्प्राप्ता देवी भगवती हि नः।<br>निरातङ्कैश्च गन्तव्यं मार्गेऽस्मिन्भूपसङ्कुले ॥ २८ | तब सुदर्शनने अपने सेनापतिसे कहा कि जहाँ ये राजागण [मार्ग रोककर] खड़े हैं, उधर ही तुम वेगसे आगे बढ़ो। ये दुष्ट तथा कुपित राजालोग हमारा क्या कर लेंगे? अब हमें शरण देनेके लिये स्वयं भगवती जगदम्बा आ गयी हैं। अतएव हमें निर्भय होकर राजाओंसे भरे इस मार्गपर आगे बढ़ना |