भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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३६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३ ]

| स्मृता मया महादेवी रक्षणार्थमुपागता।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं सेनापतिस्तेन पथाव्रजत्॥ २९ | चाहिये। मेरे स्मरण करते ही मेरी रक्षाके लिये ये भगवती आ गयी हैं। सुदर्शनका वचन सुनकर सेनापति उसी मार्गसे आगे बढ़ा॥ २६—२९॥ | | युधाजित्तु सुसंक्रुद्धस्तानुवाच महीपतीन्।<br>किं स्थिता भयसन्त्रस्ता निघ्नन्तु कन्यकान्वितम्॥ ३० | अतिशय कुपित होकर युधाजित्ने उन राजाओंसे कहा—तुमलोग भयभीत होकर खड़े क्यों हो; कन्यासहित इस सुदर्शनको मार डालो॥ ३०॥ | | अवमन्य च नः सर्वान्बलहीनो बलाधिकान्।<br>कन्यां गृहीत्वा संयाति निर्भयस्तरसा शिशुः॥ ३१ | हम सभी बलवानोंका तिरस्कार करके यह बलहीन बालक कन्याको लेकर निर्भीकतापूर्वक बड़े वेगसे चला जा रहा है॥ ३१॥ | | किं भीताः कामिनीं वीक्ष्य सिंहोपरि सुसंस्थिताम्।<br>नोपेक्ष्यो हि महाभागा हन्तव्योऽत्र समाहितैः॥ ३२ | सिंहपर विराजमान उस स्त्रीको देखकर तुमलोग क्यों डरते हो? हे महाभाग राजाओ! इस समय सुदर्शनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये और अत्यन्त सावधान होकर इसका वध कर देना चाहिये॥ ३२॥ | | हत्वैनं संग्रहीष्यामः कन्यां चारुविभूषणाम्।<br>नायं केसरिणादत्तां छेत्तुमर्हति जम्बुकः॥ ३३ | इसे मारकर हम सुन्दर आभूषण धारण करनेवाली कन्याको छीन लेंगे। हम सिंहसदृश वीरोंके भागको यह सियार नहीं ले जा सकता॥ ३३॥ | | इत्युक्त्वा सैन्यसंयुक्तः शत्रुजित्सहितस्तदा।<br>योद्धुकामः सुसम्प्राप्तो युधाजित्क्रोधसंवृतः॥ ३४ | ऐसा कहकर वह युधाजित् अत्यन्त कुपित हो [अपने दौहित्र] शत्रुजित् तथा विशाल सेनाको साथ लिये हुए युद्धकी इच्छासे आ डटा॥ ३४॥ | | मुमोच विशिखांस्तूर्णं समपुंखाञ्छिलाशितान्।<br>धनुराकृष्य कर्णान्तं कर्मारपरिमार्जितान्॥ ३५ | अब वह कानतक धनुष खींचकर लोहारके द्वारा सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए, शिलापर घिसकर तेज किये गये तथा समान पुच्छयुक्त बाणोंको शीघ्रतापूर्वक छोड़ने लगा॥ ३५॥ | | हन्तुकामः सुदुर्मेधाः सुदर्शनमथोपरि।<br>सुदर्शनस्तु तान्बाणैश्चिच्छेदापततः क्षणात्॥ ३६ | इस प्रकार उसके ऊपर प्रहार करके वह दुर्बुद्धि युधाजित् सुदर्शनको मार डालना चाहता था, किंतु सुदर्शनने उसके बाणोंको छूटते ही अपने बाणोंसे क्षणभरमें काट डाला॥ ३६॥ | | एवं युद्धे प्रवृत्तेऽथ चुकोप चण्डिका भृशम्।<br>दुर्गादेवी मुमोचाथ बाणान्युधाजितं प्रति॥ ३७ | वह भीषण युद्ध छिड़ जानेपर भगवती चण्डिका अत्यन्त क्रुद्ध हो उठीं और युधाजित्पर बाण बरसाने लगीं॥ ३७॥ | | नानारूपा तदा जाता नानाशास्त्रधरा शिवा।<br>सम्प्राप्ता तुमुलं तत्र चकार जगदम्बिका॥ ३८ | उस समय कल्याणमयी जगदम्बिका विविध रूप धारण कर लेती थीं। वे नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र लेकर घमासान युद्ध कर रही थीं॥ ३८॥ | | शत्रुजिन्निहतस्तत्र युधाजिदपि पार्थिवः।<br>पतितौ तौ रथाभ्यां तु जयशब्दस्तदाभवत्॥ ३९ | कुछ ही क्षणोंमें शत्रुजित् और राजा युधाजित्—दोनों मार डाले गये और अपने-अपने रथोंसे गिर पड़े। उस समय जयजयकारकी ध्वनि होने लगी॥ ३९॥ | | विस्मयं परमं प्राप्ता भूपाः सर्वे विलोक्य ताम्।<br>निधनं मातुलस्यापि भागिनेयस्य संयुगे॥ ४० | उस युद्धमें भगवतीको तथा मामा और भांजेकी (नाना-नातीकी) मृत्यु देखकर सभी राजा बहुत विस्मयमें पड़ गये॥ ४०॥ |