भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 371

३६२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुदर्शनस्तदोवाच श्वशुरं संशितव्रतः।<br>अस्मान्विसर्जयाशु त्वं गमिष्यामो ह्यशङ्किताः॥ ४तब व्रतपरायण सुदर्शनने अपने श्वसुरसे कहा—आप हमें शीघ्र विदा कर दीजिये, हम निःशंक होकर चले जायँगे॥ ४॥
भारद्वाजाश्रमं पुण्यं गत्वा तत्र समाहिताः।<br>निवासाय विचारो वै कर्तव्यः सर्वथा नृप॥ ५हे राजन्! भारद्वाजमुनिके पवित्र आश्रममें पहुँचनेपर वहीं सावधानीके साथ आगे रहनेके लिये विचार कर लिया जायगा॥ ५॥
नृपेभ्यश्च न कर्तव्यं भयं किञ्चित्त्वयानघ।<br>जगन्माता भवानी मे साहाय्यं वै करिष्यति॥ ६अतः हे पुण्यात्मन्! उन राजाओंसे आप कुछ भी भय न करें; क्योंकि जगज्जननी भगवती मेरी सहायता अवश्य करेंगी॥ ६॥
व्यास उवाच<br>तस्येति मतमाज्ञाय जामातुर्नृपसत्तमः।<br>विससर्ज धनं दत्त्वा प्रतस्थे सोऽपि सत्वरः॥ ७<br>बलेन महताविष्टो ययावनु नृपोत्तमः।<br>सुदर्शनो वृतस्तत्र चचाल पथि निर्भयः॥ ८व्यासजी बोले—अपने जामाता सुदर्शनका ऐसा विचार जानकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उन्हें धन देकर विदा कर दिया और वे सुदर्शन भी तत्काल चल पड़े। नृपश्रेष्ठ सुबाहु भी एक विशाल सेना लेकर उनके पीछे-पीछे चले। इस प्रकार उन सैनिकोंसे आवृत सुदर्शन निर्भय होकर मार्गमें चले जा रहे थे॥ ७-८॥
रथैः परिवृतः शूरः सदारो रथसंस्थितः।<br>गच्छन्ददर्श सैन्यानि नृपाणां रघुनन्दनः॥ ९रथोंसे घिरे हुए एक रथपर अपनी पत्नीके साथ बैठकर जाते हुए रघुनन्दन सुदर्शनने मार्गमें उन राजाओंके सैनिकोंको देखा॥ ९॥
सुबाहुरपि तान्वीक्ष्य चिन्ताविष्टो बभूव ह।<br>विधिवत्स शिवां चित्ते जगाम शरणं मुदा॥ १०<br>जजापैकाक्षरं मन्त्रं कामराजमनुत्तमम्।<br>निर्भयो वीतशोकश्च पत्या सह नवोढया॥ ११राजा सुबाहु भी उन सैनिकोंको देखकर चिन्तित हुए। तब सुदर्शनने विधिपूर्वक अपने मनमें भगवती जगदम्बाका ध्यान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी शरण ली। उस समय सुदर्शन एकाक्षर कामराज नामक सर्वोत्तम मन्त्रका जप कर रहे थे, उसके प्रभावसे वे अपनी नवविवाहिता पत्नीके साथ निर्भय तथा चिन्तामुक्त थे॥ १०-११॥
ततः सर्वे महीपालाः कृत्वा कोलाहलं तदा।<br>उत्थिताः सैन्यसंयुक्ता हन्तुकामास्तु कन्यकाम्॥ १२इसी बीच सभी राजा एक साथ कोलाहल करके कन्याका हरण करनेकी इच्छासे अपनी-अपनी सेनाके साथ उनकी ओर बढ़े॥ १२॥
काशिराजस्तु तान्दृष्ट्वा हन्तुकामो बभूव ह।<br>निवारितस्तदात्यर्थं राघवेण जिगीषता॥ १३उन्हें ऐसा करते देखकर काशीनरेश सुबाहुने उनको मारनेका विचार किया, किंतु विजयकी इच्छावाले रघुवंशी सुदर्शनने उन्हें मना कर दिया॥ १३॥
तत्रापि नेदुः शङ्खाश्च भेर्यश्चानकदुन्दुभिः।<br>सुबाहोश्च नृपाणाञ्च परस्परजिघांसताम्॥ १४उस समय एक दूसरेको मार डालनेकी अभिलाषावाले महाराज सुबाहु तथा अन्य राजाओंकी सेनाओंमें शंख भेरी, नगाड़े और दुन्दुभि बजने लगे॥ १४॥
शत्रुजित्तु सुसंवृत्तः स्थितस्तत्र जिघांसया।<br>युधाजित्तत्सहायार्थं सन्नद्धः प्रबभूव ह॥ १५सुदर्शनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुजित् सैन्य-बलसे युक्त होकर बड़ी तत्परतासे तैयार खड़ा था और राजा युधाजित् भी उसकी सहायताके लिये