देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 370, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 370
| अ० २३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६१ |
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| कन्ययासौ वृतो भूपः किं करोमि हिताहितम्।<br>भवद्भिरस्तु शमः कार्यो महान्तो हि दयालवः॥ ४२ | लिये मेरे घर आयें। कन्याने तो उस राजकुमार सुदर्शनका पतिरूपमें वरण कर लिया है। मैं इस विषयमें अच्छा-बुरा क्या कर सकता हूँ? अब आपलोग शान्त हो जायें; क्योंकि महान् लोग दयालु होते हैं॥ ४१-४२॥ |
| तन्निशम्य वचस्तस्य नृपाः क्रोधपरप्लुताः।<br>प्रत्यूचुर्भुक्तमस्माभिः स्वगृहं नृपते व्रज॥ ४३ | राजा सुबाहुकी बात सुनकर सभी राजा क्रोधसे तमतमा उठे। उन्होंने कहा—राजन्! हमलोग भोजन कर चुके, अब आप अपने घर जाइये। आपको जो अच्छा लगा, उसे आपने कर लिया। जो कार्य शेष हों उन सबको भी जाकर कर लीजिये। अब सभी राजागण अपने-अपने घर चले जायेंगे॥ ४३-४४॥ |
| कुरु कार्याण्यशेषाणि यथेष्टं सुकृतं कृतम्।<br>नृपाः सर्वे प्रयान्त्वद्य स्वानि स्वानि गृहाणि वै॥ ४४ | |
| सुबाहुरपि तच्छ्रुत्वा जगाम शङ्कितो गृहम्।<br>किं करिष्यन्ति संविग्नाः क्रोधयुक्ता नृपोत्तमाः॥ ४५ | सुबाहु भी यह सुनकर घर चले गये और शंका करने लगे कि ये क्षुब्ध तथा कुपित राजागण अब न जाने क्या कर डालेंगे॥ ४५॥ |
| गते तस्मिन्महीपालाश्चक्रुश्च समयं पुनः।<br>रुद्ध्वा मार्गं ग्रहीष्यामः कन्यां हत्वा सुदर्शनम्॥ ४६ | राजा सुबाहुके चले जानेपर उन नरेशोंने यह निश्चय किया कि अब हमलोग मार्ग रोककर सुदर्शनको मारकर कन्याको छीन लेंगे॥ ४६॥ |
| केचनोचुः किमस्माकं हन्त तेन नृपेण वै।<br>दृष्ट्वा तु कौतुकं सर्वं गमिष्यामो यथागतम्॥ ४७ | उनमेंसे कुछ राजाओंने कहा—अरे! उस राजकुमार सुदर्शनसे हमारा क्या वैर? हमने यहाँका सब कौतुक देख लिया। अब हम जैसे आये थे, वैसे ही घर लौट चलें॥ ४७॥ |
| इत्युक्त्वा ते नृपाः सर्वे मार्गमाक्रम्य संस्थिताः।<br>चकारोत्तरकार्याणि सुबाहुः स्वगृहं गतः॥ ४८ | ऐसा कहकर वे सब [विरोधी] राजागण मार्ग रोककर खड़े हो गये और राजा सुबाहु अपने भवन पहुँचकर आगेके कृत्य सम्पादित करने लगे॥ ४८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
सुदर्शनशशिकलयोर्विवाहवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
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अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
सुदर्शनका शशिकलाके साथ भारद्वाज-आश्रमके लिये प्रस्थान, युधाजित् तथा अन्य राजाओंसे सुदर्शनका घोर संग्राम, भगवती सिंहवाहिनी दुर्गाका प्राकट्य, भगवतीद्वारा युधाजित् और शत्रुजित्का वध, सुबाहुद्वारा भगवतीकी स्तुति
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| तस्मै गौरवभोज्यानि विधाय विधिवत्तदा।<br>वासराणि च षड्राजा भोजयामास भक्तितः॥ १ | [हे राजन्!] उस समय राजा सुबाहुने छः दिनोंतक विविध प्रकारके भोजन बनवाकर सुदर्शनको प्रेमपूर्वक खिलाया॥ १॥ |
| एवं विवाहकार्याणि कृत्वा सर्वाणि पार्थिवः।<br>पारिबर्हं प्रदत्त्वाथ मन्त्रयन्सचिवैः सह॥ २<br>दूतैस्तु कथितं श्रुत्वा मार्गसंरोधनं कृतम्।<br>बभूव विमना राजा सुबाहुरमितद्युतिः॥ ३ | इस प्रकार विवाहके सभी कृत्य करके राजा सुबाहु सुदर्शनको उपहार प्रदान करके सचिवोंके साथ मन्त्रणा कर रहे थे, उसी समय अपने दूतोंका यह कथन सुनकर कि विरोधी राजाओंने मार्ग रोक रखा है, वे अमित तेजवाले राजा सुबाहु खिन्नमनस्क हो गये॥ २-३॥ |