देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 376, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 376
अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३६७
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः
सुबाहुद्वारा भगवती दुर्गासे सदा काशीमें रहनेका वरदान माँगना तथा देवीका वरदान देना, सुदर्शनद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीका उसे अयोध्या जाकर राज्य करनेका आदेश देना, राजाओंका सुदर्शनसे अनुमति लेकर अपने-अपने राज्योंको प्रस्थान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भवान्याः स नृपोत्तमः।<br>प्रोवाच वचनं तत्र सुबाहुर्भक्तिसंयुतः॥ १ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उन भवानीका वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने भक्तिसे युक्त होकर यह बात कही— ॥ १ ॥ |
| सुबाहुरुवाच<br>एकतो देवलोकस्य राज्यं भूमण्डलस्य च।<br>एकतो दर्शनं ते वै न च तुल्यं कदाचन॥ २ | **सुबाहु बोले—**हे माता! एक ओर देवलोक तथा समस्त भूमण्डलका राज्य और दूसरी ओर आपका दर्शन; वे दोनों तुल्य कभी नहीं हो सकते ॥ २ ॥ |
| दर्शनात्सदृशं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु नास्ति मे।<br>कं वरं देवि याचेऽहं कृतार्थोऽस्मि धरातले॥ ३ | आपके दर्शनसे बढ़कर समस्त त्रिलोकीमें कोई भी वस्तु नहीं है। हे देवि! मैं आपसे क्या वर माँगूँ? मैं तो इस जगतीतलममें आपके दर्शनसे ही कृतकृत्य हो गया ॥ ३ ॥ |
| एतदिच्छाम्यहं मातर्याचितुं वाञ्छितं वरम्।<br>तव भक्तिः सदा मेऽस्तु निश्चला ह्यनपायिनी॥ ४ | हे माता! मैं तो यही अभीष्ट वर माँगना चाहता हूँ कि आपकी स्थिर तथा अखण्ड भक्ति मेरे हृदयमें बनी रहे ॥ ४ ॥ |
| नगरेऽत्र त्वया मातः स्थातव्यं मम सर्वदा।<br>दुर्गादेवीति नाम्ना वै त्वं शक्तिरिह संस्थिता॥ ५<br>रक्षा त्वया च कर्तव्या सर्वदा नगरस्य ह।<br>यथा सुदर्शनस्त्रातो रिपुसंघादनामयः॥ ६<br>तथात्र रक्षा कर्तव्या वाराणस्यास्त्वयाम्बिके।<br>यावत्पुरी भवेद्भूभौ सुप्रतिष्ठा सुसंस्थिताः॥ ७<br>तावत्त्वयात्र स्थातव्यं दुर्गे देवि कृपानिधे।<br>वरोऽयं मम ते देयः किमन्यत्प्रार्थयाम्यहम्॥ ८ | हे माता! आप मेरी नगरी काशीमें सदा निवास करें। आप शक्तिस्वरूपा होकर दुर्गादेवीके नामसे यहाँ विराजमान रहें और सर्वदा नगरकी रक्षा करती रहें। हे अम्बिके! इस समय आपने जिस तरह शत्रुदलसे सुदर्शनकी रक्षा की है और उसे विकार-रहित बना दिया है, उसी तरह आप सदा वाराणसीकी रक्षा करें। हे देवि! हे कृपानिधे! जबतक भूलोकमें काशीनगरी सुप्रतिष्ठित होकर विद्यमान रहे, तबतक आप यहाँ विराजमान रहें— आप मुझे यही वरदान दें, इसके अतिरिक्त मैं आपसे और दूसरा क्या माँगूँ? ॥ ५–८ ॥ |
| विविधांन्सकलांकामांदेहि मे विद्विषो जहि।<br>अभद्राणां विनाशञ्च कुरु लोकस्य सर्वदा॥ ९ | आप मेरी विविध प्रकारकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करें, मेरे शत्रुओंका नाश करें और जगत्के सभी अमंगलोंको सदाके लिये नष्ट कर डालें ॥ ९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति सम्प्रार्थिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी।<br>तमुवाच नृपं तत्र स्तुत्वा वै संस्थितं पुरः॥ १० | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार राजा सुबाहुके सम्यक् प्रार्थना करनेपर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा स्तुति करके अपने समक्ष खड़े राजा सुबाहुसे कहने लगीं— ॥ १० ॥ |
| दुर्गोवाच<br>राजन् सदा निवासो मे मुक्तिपुर्यां भविष्यति।<br>रक्षार्थं सर्वलोकानां यावत्तिष्ठति मेदिनी॥ ११ | **दुर्गाजी बोलीं—**हे राजन्! जबतक यह पृथिवी रहेगी, तबतक सभी लोकोंकी रक्षाके लिये मैं निरन्तर इस मुक्तिपुरी काशीमें निवास करूँगी ॥ ११ ॥ |