देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
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| क्वाहं सुमन्दमतिराशु तवावलोकं<br>क्वेदं भवानि भवभेषजमद्वितीयम्।<br>ज्ञातासि देवि सततं किल भावयुक्ता<br>भक्तानुकम्पनपरामरवर्गपूज्या ॥ ४९ | हे भवानि ! कहाँ अतिशय मन्दमति मैं और कहाँ भवरूपी रोगके लिये औषधिस্বরূপ आपका यह शीघ्र अद्वितीय दर्शन ! हे देवि ! मुझे ज्ञात हो गया कि आप सदा भावनायुक्त रहती हैं। देवसमूहद्वारा पूजी जानेवाली आप अपने भक्तोंपर अनुकम्पा करती हैं ॥ ४९ ॥ | | किं वर्णयामि तव देवि चरित्रमेतद्<br>यद्रक्षितोऽस्ति विषमेऽत्र सुदर्शनोऽयम्।<br>शत्रू हतौ सुबलिनौ तरसा त्वयाद्य<br>भक्तानुकम्पि चरितं परमं पवित्रम्॥ ५० | हे देवि ! आपने इस भीषण संकटके समय जिस प्रकार इस सुदर्शनकी रक्षा की है, आपके इस चरित्रका मैं किस तरह वर्णन करूँ? आपने आज इसके दो बलवान् शत्रुओंको तत्काल मार डाला। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाला आपका यह चरित्र परम पवित्र है ॥ ५० ॥ | | नाश्चर्यमेतदिति देवि विचारितेऽर्थे<br>त्वं पासि सर्वमखिलं स्थिरजङ्गमं वै।<br>त्रातस्त्वया च विनिहत्य रिपुर्दयातः<br>संरक्षितोऽयमधुना ध्रुवसन्थिसूनुः॥ ५१ | हे देवि ! विशेष विचार करनेपर ज्ञात होता है कि आपका ऐसा करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आप अखिल स्थावर-जंगम जगत्की रक्षा करती हैं। आपने शत्रुको मारकर दयालुतावश ध्रुवसन्धिके पुत्र इस सुदर्शनकी इस समय रक्षा की ॥ ५१ ॥ | | भक्तस्य सेवनपरस्य स्वयशोऽतिदीप्तं<br>कर्तुं भवानि रचितं चरितं त्वयैतत्।<br>नोचेत्कथं सुपरिगृह्य सुतां मदीयां<br>युद्धे भवेत्कुशलवाननवद्यशीलः॥ ५२ | हे भवानि ! अपने सेवापरायण भक्तके यशको अत्यन्त उज्ज्वल बनानेके लिये ही आपने इस चरित्रकी रचना की है, नहीं तो मेरी कन्याका पाणिग्रहण करके यह असमर्थ सुदर्शन युद्धमें सकुशल जीवित कैसे बच सकता था ? ॥ ५२ ॥ | | शक्तासि जन्ममरणादिभयान्विहन्तुं<br>किं चित्रमत्र किल भक्तजनस्य कामम्।<br>त्वं गीयसे जननि भक्तजनैरपारा<br>त्वं पापपुण्यरहिता सगुणागुणा च॥ ५३ | जब आप अपने भक्तोंके जन्म-मरण आदि भयोंको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, तब उसकी लौकिक अभिलाषा पूर्ण कर देना कौन बड़ी बात है ? हे जननि ! आप पाप-पुण्यसे रहित, सगुणा तथा निर्गुणा हैं; इसी कारण भक्तजन सदा आपके गुण गाते रहते हैं ॥ ५३ ॥ | | त्वद्दर्शनादहमहो सुकृती कृतार्थो<br>जातोऽस्मि देवि भुवनेश्वरि धन्यजन्मा।<br>बीजं न ते न भजनं किल वेद्मि मात-<br>र्ज्ञातस्तवाद्य महिमा प्रकटप्रभावः॥ ५४ | हे देवि ! हे भुवनेश्वरि ! आज आपके दर्शनसे मैं पवित्र, कृतार्थ और धन्य जन्मवाला हो गया। हे माता! मैं न आपका भजन जानता हूँ और न तो बीजमन्त्र जानता हूँ। मैं आपकी प्रत्यक्ष प्रभाववाली महिमाको आज जान गया ॥ ५४ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी प्रसन्नवदना शिवा।<br>उवाच तं नृपं देवी वरं वरय सुव्रत॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**महाराज सुबाहुके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती शिवाका मुखमण्डल प्रसन्नतासे भर गया। तब भगवतीने उन राजासे कहा—हे सुव्रत ! तुम वर माँगो ॥ ५५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुबाहुकृतदेवीस्तुतिवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥