भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

| अ० २४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६१ | | :--- | :--- | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्हिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी।<br>नता सुदर्शनेनाथ स्तुता च बहुविस्तरम्॥ २३ | व्यासजी बोले— राजा सुदर्शनके स्तुति तथा प्रणाम करनेके अनन्तर ऐसा कहकर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा अन्तर्धान हो गयीं॥ २३॥ | | अन्तर्हितां तु तां दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते।<br>प्रणेमुस्तं समागम्य यथा शक्रं सुरास्तथा॥ २४ | उन भगवतीको अन्तर्हित देखकर वहाँ उपस्थित सभी राजाओंने आकर सुदर्शनको उसी प्रकार प्रणाम किया जैसे देवता इन्द्रको प्रणाम करते हैं॥ २४॥ | | सुबाहुरपि तं नत्वा स्थितश्चाग्रे मुदान्वितः।<br>ऊचुः सर्वे महीपाला अयोध्याधिपतिं तदा॥ २५ | महाराज सुबाहु भी उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षपूर्वक उनके समक्ष खड़े हो गये। तदनन्तर उन सभी राजाओंने अयोध्यापति सुदर्शनसे कहा—॥ २५॥ | | त्वमस्माकं प्रभुः शास्ता सेवकास्ते वयं सदा।<br>कुरु राज्यमयोध्यायां पालयास्मान्नृपोत्तम॥ २६ | हे नृपश्रेष्ठ! आप हमारे स्वामी तथा शासक हैं और हम आपके सेवक हैं। अब आप अयोध्यामें राज्य करें और हमारा पालन करें॥ २६॥ | | त्वत्प्रसादान्महाराज दृष्टा विश्वेश्वरी शिवा।<br>आदिशक्तिर्भवानी सा चतुर्वर्गफलप्रदा॥ २७ | हे महाराज! आपकी कृपासे हमने धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली उन विश्वेश्वरी, शिवा और आदिशक्ति भवानीका दर्शन पा लिया॥ २७॥ | | धन्यस्त्वं कृतकृत्योऽसि बहुपुण्यो धरातले।<br>यस्माच्च त्वत्कृते देवी प्रादुर्भूता सनातनी॥ २८ | आप इस धरतीपर धन्य, कृतकृत्य और बड़े पुण्यात्मा हैं; क्योंकि आपके लिये साक्षात् सनातनी देवी प्रकट हुईं॥ २८॥ | | न जानीमो वयं सर्वे प्रभावं नृपसत्तम।<br>चण्डिकायास्तमोयुक्ता मायया मोहिताः सदा॥ २९<br>धनदारसुतानां च चिन्तनेऽभिरताः सदा।<br>मग्ना महार्णवे घोरे कामक्रोधझषाकुले॥ ३० | हे नृपसत्तम! तमोगुणसे युक्त और सदा मायासे मोहित रहनेवाले हम सभी लोग भगवती चण्डिकाका प्रभाव नहीं जानते। हम सदा धन, स्त्री और पुत्रोंकी चिन्तामें व्यग्र रहकर काम-क्रोधरूपी मत्स्योंसे भरे घोर महासागरमें डूबे रहते हैं॥ २९-३०॥ | | पृच्छामस्त्वां महाभाग सर्वज्ञोऽसि महामते।<br>केयं शक्तिः कुतो जाता किंप्रभावा वदस्व तत्॥ ३१ | हे महाभाग! हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव हम आपसे यह पूछ रहे हैं कि ये शक्ति कौन हैं, कहाँसे उत्पन्न हुई हैं और इनका कैसा प्रभाव है? वह सब बताइये॥ ३१॥ | | भव त्वं नौश्च संसारे साधवोऽति दयापराः।<br>तस्मान्नो वद काकुत्स्थ देवीमाहात्म्यमुत्तमम्॥ ३२ | साधु पुरुष बड़े दयालु होते हैं। अतएव आप हमारे लिये इस संसार-सागरकी नौका बन जाइये। हे काकुत्स्थ! अब आप भगवतीके उत्तम माहात्म्यका वर्णन कीजिये॥ ३२॥ | | यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा।<br>तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामस्त्वं ब्रूहि नृवरोत्तम॥ ३३ | हे नृपश्रेष्ठ! उनका जो प्रभाव हो, जो स्वरूप हो तथा वे जैसे प्रकट हुई हों; यह सब हम आपसे सुनना चाहते हैं, आप बतायें॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तदा तैस्तु ध्रुवसंधिसुतो नृपः।<br>विचिन्त्य मनसा देवीं तानुवाच मुदान्वितः॥ ३४ | व्यासजी बोले— राजाओंके यह पूछनेपर ध्रुवसन्धिके पुत्र राजा सुदर्शन मन-ही-मन भगवतीका स्मरण करके हर्षपूर्वक उनसे कहने लगे—॥ ३४॥ |