देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 379, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ |
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| सुदर्शन उवाच | **सुदर्शन बोले—**हे राजाओ! उन जगदम्बाके उत्तम चरित्रको मैं क्या कहूँ; क्योंकि ब्रह्मा आदि तथा इन्द्रसहित सभी देवता भी उन्हें नहीं जानते॥ ३५॥ | | किं ब्रवीमि महीपालास्तस्याश्चरितमुत्तमम्।<br>ब्रह्मादयो न जानन्ति सेशाः सुरगणास्तथा॥ ३५ | | | सर्वस्याद्या महालक्ष्मीर्वरेण्या शक्तिरुत्तमा।<br>सात्त्विकीयं महीपाला जगत्पालनतत्परा॥ ३६ | हे राजाओ! वे भगवती सबकी आदिरूपा हैं, महालक्ष्मीके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, वे वरेण्य हैं और उत्तम सात्त्विकी शक्तिके रूपमें समस्त विश्वका पालन करनेमें तत्पर रहती हैं॥ ३६॥ | | सृजते या रजोरूपा सत्त्वरूपा च पालने।<br>संहारे च तमोरूपा त्रिगुणा सा सदा मता॥ ३७ | वे अपने रजोगुणी स्वरूपसे सृष्टि करती, सत्त्वगुणी स्वरूपसे पालन करती और तमोगुणी स्वरूपसे इसका संहार करती हैं, इसी कारण वे त्रिगुणात्मिका कही गयी हैं। | | निर्गुणा परमा शक्तिः सर्वकामफलप्रदा।<br>सर्वेषां कारणं सा हि ब्रह्मादीनां नृपोत्तमाः॥ ३८ | परम शक्तिस्वरूपा निर्गुणा भगवती समस्त कामनाएँ पूर्ण कर देती हैं। हे श्रेष्ठ राजाओ! वे ब्रह्मा आदि सभी देवताओंकी भी आदिकारण हैं॥ ३७-३८॥ | | निर्गुणा सर्वथा ज्ञातुमशक्या योगिभिर्नृपाः।<br>सगुणा सुखसेव्या सा चिन्तनीया सदा बुधैः॥ ३९ | हे राजाओ! योगीलोग भी निर्गुणा भगवतीको जाननेमें सर्वथा असमर्थ हैं। अतः बुद्धिमानोंको चाहिये कि सरलतापूर्वक सेवनीय सगुणा भगवतीकी निरन्तर आराधना करें॥ ३९॥ | | राजान ऊचुः<br>बाल एव वनं प्राप्तस्त्वं तु नूनं भयातुरः।<br>कथं ज्ञाता त्वया देवी परमा शक्तिरुत्तमा॥ ४० | **राजागण बोले—**बाल्यावस्थामें ही आप वनवासी हो गये थे तथा भयसे व्याकुल थे। तब आपको उन उत्तम परमा शक्तिका ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?॥ ४०॥ | | उपासिता कथं चैव पूजिता च कथं नृप।<br>या प्रसन्ना तु साहाय्यं चकार त्वरयान्विता॥ ४१ | हे नृप! आपने उनकी उपासना और पूजा कैसे की, जिससे शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न होकर उन्होंने आपकी सहायता की॥ ४१॥ | | सुदर्शन उवाच<br>बालभावान्मया प्राप्तं बीजं तस्याः सुसम्मतम्।<br>स्मरामि प्रजपन्नित्यं कामबीजाभिधं नृपाः॥ ४२ | **सुदर्शन बोले—**हे राजाओ! बाल्यकालमें ही मुझे उनका अतिश्रेष्ठ बीजमन्त्र प्राप्त हो गया था। मैं उसी कामराज नामक बीजमन्त्रका सदा जप करता हुआ भगवतीका स्मरण करता रहता हूँ॥ ४२॥ | | ऋषिभिः कथ्यमाना सा मया ज्ञाताम्बिका शिवा।<br>स्मरामि तां दिवारात्रं भक्त्या परमया पराम्॥ ४३ | ऋषियोंके द्वारा उन कल्याणमयी भगवतीके विषयमें बताये जानेपर मैंने उन्हें जाना और तभीसे मैं परम भक्तिके साथ दिन-रात उन परा शक्तिका स्मरण किया करता हूँ॥ ४३॥ | | व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य राजानो भक्तितत्पराः।<br>तां मत्वा परमां शक्तिं निर्ययुः स्वगृहान्प्रति॥ ४४ | **व्यासजी बोले—**सुदर्शनका वचन सुनकर वे राजा भी भक्तिपरायण हो गये और उन देवीको ही परम शक्ति मानकर अपने-अपने घर चले गये॥ ४४॥ | | सुबाहुरगमत्काश्यां तमापृच्छ्य सुदर्शनम्।<br>सुदर्शनोऽपि धर्मात्मा निर्जगाम सुकोसलान्॥ ४५ | सुदर्शनसे अनुमति लेकर महाराज सुबाहु काशी चले गये और धर्मात्मा सुदर्शन वहाँसे अयोध्याकी ओर चल पड़े॥ ४५॥ |