देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३७१
| मन्त्रिणस्तु नृपं श्रुत्वा हतं शत्रुजितं मृधे।<br>जितं सुदर्शनञ्चैव बभूवुः प्रेमसंयुताः ॥ ४६ | राजा शत्रुजित् युद्धमें मारा गया और सुदर्शन विजयी हुए—यह सुनकर मन्त्रीलोग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे ॥ ४६ ॥ |
| आगच्छन्तं नृपं श्रुत्वा तं साकेतनिवासिनः।<br>उपायनान्युपादाय प्रययुः सम्मुखे जनाः ॥ ४७<br><br>तथा प्रकृतयः सर्वे नानोपायनपाणयः।<br>ध्रुवसन्धिसुतं मत्वा मुदिताः प्रययुः प्रजाः ॥ ४८ | राजा सुदर्शनके आगमनका समाचार सुनकर साकेतके निवासी विविध प्रकारके उपहार लेकर उनके सम्मुख उपस्थित हुए और सब राजकर्मचारीगण भी हाथोंमें नाना प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर आये। महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शनको राजाके रूपमें जानकर अयोध्याकी समस्त प्रजा आनन्दविभोर हो गयी ॥ ४७-४८ ॥ |
| स्त्रियोपसंयुतः सोऽथ प्राप्यायोध्यां सुदर्शनः।<br>सम्मान्य सर्वलोकांश्च ययौ राजा निवेशनम् ॥ ४९<br><br>बन्दिभिः स्तूयमानस्तु वन्द्यमानश्च मन्त्रिभिः।<br>कन्याभिः कीर्यमाणश्च लाजैः सुमनसैस्तथा ॥ ५० | अपनी स्त्रीके साथ अयोध्यामें पहुँचकर सब लोगोंका सम्मान करके राजा सुदर्शन राजभवनमें गये। उस समय बन्दीजन उनकी स्तुति कर रहे थे, मन्त्रीगण उनकी वन्दना कर रहे थे और कन्याएँ उनके ऊपर लाजा (धानका लावा) तथा पुष्प बिखेर रही थीं ॥ ४९-५० ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुदर्शनेन देवीमहिमवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
सुदर्शनका शत्रुजित्की माताको सान्त्वना देना, सुदर्शनद्वारा अयोध्यामें तथा राजा सुबाहुद्वारा काशीमें देवी दुर्गाकी स्थापना
| व्यास उवाच<br>गत्वायोध्यां नृपश्रेष्ठो गृहं राज्ञः सुहृद्वृतः।<br>शत्रुजिन्मातरं प्राह प्रणम्य शोकसंकुलाम् ॥ १<br><br>मातर्न ते मया पुत्रः संग्रामे निहतः किल।<br>न पिता ते युधाजिच्च शपे ते चरणौ तथा ॥ २ | व्यासजी बोले—अयोध्या पहुँचकर नृपश्रेष्ठ सुदर्शन अपने मित्रोंके साथ राजभवनमें गये। वहाँपर शत्रुजित्की परम शोकाकुल माताको प्रणामकर उन्होंने कहा—हे माता! मैं आपके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके पुत्र तथा आपके पिता युधाजित्को युद्धमें मैंने नहीं मारा है ॥ १-२ ॥ |
| दुर्गया तौ हतौ संख्ये नापराधो ममात्र वै।<br>अवश्यंभाविभावेषु प्रतीकारो न विद्यते ॥ ३ | स्वयं भगवती दुर्गाने रणभूमिमें उनका वध किया है; इसमें मेरा अपराध नहीं है। होनी तो अवश्य होकर रहती है, उसे टालनेका कोई उपाय नहीं है ॥ ३ ॥ |
| न शोकोऽत्र त्वया कार्यों मृतपुत्रस्य मानिनी।<br>स्वकर्मवशगो जीवो भुङ्क्ते भोगान्सुखासुखान् ॥ ४ | हे मानिनि! अपने मृत पुत्रके विषयमें आप शोक न करें; क्योंकि जीव अपने पूर्वकर्मोंके अधीन होकर सुख-दुःखरूपी भोगोंको भोगता है ॥ ४ ॥ |