देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ३ ] प्रथम स्कन्ध ७७
अ० ३ ] प्रथम स्कन्ध ७७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अल्पायुषोऽल्पबुद्धींश्च विप्रान् ज्ञात्वा कलावथ।<br>पुराणसंहितां पुण्यां कुरुतेऽसौ युगे युगे॥ २० | विशेषकर कलियुगमें ब्राह्मणोंको अल्पायु एवं अल्पबुद्धि जानकर वे युग-युगमें पवित्र पुराण-संहिताओंका निर्माण करते हैं॥ २०॥ |
| स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां न वेदश्रवणं मतम्।<br>तेषामेव हितार्थाय पुराणानि कृतानि च॥ २१ | स्त्रियों, शूद्रों तथा भ्रष्ट द्विजातियोंको वेद-श्रवणका अधिकार नहीं है, इसलिये उनके कल्याणके लिये व्यासजीने पुराणोंकी रचना की है॥ २१॥ |
| मन्वन्तरे सप्तमेऽत्र शुभे वैवस्वताभिधे।<br>अष्टाविंशतिमे प्राप्ते द्वापरे मुनिसत्तमाः॥ २२<br>व्यासः सत्यवतीसूनुर्गुरुर्मे धर्मवित्तमः।<br>एकोनत्रिंशत्संप्राप्ते द्रौणिर्व्यासो भविष्यति॥ २३<br>अतीतास्तु तथा व्यासाः सप्तविंशतिरेव च।<br>पुराणसंहितास्तैस्तु कथितास्तु युगे युगे॥ २४ | हे श्रेष्ठ मुनिगण! इस वैवस्वत नामक शुभ सातवें मन्वन्तरके अट्ठाइसवें द्वापरयुगमें परम धर्मनिष्ठ सत्यवतीपुत्र मेरे गुरु श्रीव्यासजी हुए और उनतीसवें द्वापरमें द्रौणि नामके व्यास होंगे। इनके पूर्व भी सत्ताईस व्यास हो चुके हैं, जिन्होंने प्रत्येक युगमें अनेक पुराण-संहिताएँ रची हैं॥ २२–२४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>ब्रूहि सूत महाभाग व्यासाः पूर्वयुगोद्भवाः।<br>वक्तारस्तु पुराणानां द्वापरे द्वापरे युगे॥ २५ | ऋषियोंने कहा— हे महाभाग सूतजी! अब आप पूर्वकालमें प्रत्येक द्वापरयुगमें अवतीर्ण हुए पुराणवक्ता व्यासोंकी कथा कहिये॥ २५॥ |
| सूत उवाच<br>द्वापरे प्रथमे व्यस्ताः स्वयं वेदाः स्वयम्भुवा।<br>प्रजापतिर्द्वितीये तु द्वापरे व्यासकार्यकृत्॥ २६<br>तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे तु बृहस्पतिः।<br>पञ्चमे सविता व्यासः षष्ठे मृत्युस्तथापरे॥ २७ | सूतजी बोले— सृष्टिके बाद सर्वप्रथम द्वापरयुगमें स्वयं ब्रह्माजीने ही 'व्यास' के रूपमें प्रकट होकर वेदोंका विभाजन किया। दूसरे द्वापरमें 'प्रजापति' व्यास बने, तीसरे द्वापरमें 'शुक्राचार्य', चौथे द्वापरमें 'बृहस्पति', पाँचवेंमें 'सूर्य' तथा छठेमें 'यमराज' ही साक्षात् व्यास बने थे॥ २६–२७॥ |
| मघवा सप्तमे प्राप्ते वसिष्ठस्त्वष्टमे स्मृतः।<br>सारस्वतस्तु नवमे त्रिधामा दशमे तथा॥ २८ | सातवें द्वापरमें 'इन्द्र', आठवेंमें 'वसिष्ठमुनि', नवेंमें 'सारस्वत' और दसवें द्वापरमें 'त्रिधामाजी' व्यास हुए॥ २८॥ |
| एकादशेऽथ त्रिवृषो भरद्वाजस्ततः परम्।<br>त्रयोदशे चान्तरिक्षो धर्मश्चापि चतुर्दशे॥ २९ | ग्यारहवेंमें 'त्रिवृष', बारहवेंमें 'भरद्वाजमुनि', तेरहवेंमें 'अन्तरिक्ष' और चौदहवें द्वापरमें 'धर्मराज' स्वयं व्यास बने॥ २९॥ |
| त्रय्यारुणिः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>मेधातिथिः सप्तदशे व्रती ह्यष्टादशे तथा॥ ३० | पन्द्रहवें द्वापरमें 'त्रय्यारुणि', सोलहवेंमें 'धनंजय', सत्रहवेंमें 'मेधातिथि' तथा अठारहवें द्वापरमें 'व्रतीमुनि' व्यास हुए॥ ३०॥ |
| अत्रिरेकोनविंशेऽथ गौतमस्तु ततः परम्।<br>उत्तमश्चैकविंशेऽथ हर्यात्मा परिकीर्तितः॥ ३१ | उन्नीसवेंमें 'अत्रि', बीसवेंमें 'गौतम' और इक्कीसवें द्वापरमें हर्यात्मा 'उत्तम' नामक व्यास कहे गये हैं॥ ३१॥ |
| वेनो वाजश्रवाश्चैव सोमोऽमुष्यायणस्तथा।<br>तृणबिन्दुस्तथा व्यासो भार्गवस्तु ततः परम्॥ ३२ | बाईसवेंमें 'वाजश्रवा वेन', तेईसवेंमें 'आमुष्यायण सोम', चौबीसवेंमें 'तृणविन्दु' तथा पचीसवें द्वापरमें 'भार्गव' व्यास हुए॥ ३२॥ |
| ७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः शक्तिर्जातुकर्ण्यः कृष्णद्वैपायनस्ततः।<br>अष्टाविंशतिसंख्येयं कथिता या मया श्रुता॥ ३३ | छब्बीसवेंमें 'शक्ति', सत्ताईसवेंमें 'जातुकर्ण्य' और अट्ठाईसवें द्वापरमें 'कृष्णद्वैपायनजी' व्यास हुए। इस प्रकार अट्ठाईस व्यासोंके नाम जैसा मैंने सुना था, वैसा बता दिया॥ ३३॥ |
| कृष्णद्वैपायनात्प्रोक्तं पुराणं च मया श्रुतम्।<br>श्रीमद्भागवतं पुण्यं सर्वदुःखौघनाशनम्॥ ३४ | इन्हीं कृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा कहे गये श्रीमद्देवीभागवतपुराणको मैंने सुना था; जो पुण्यप्रद, सब प्रकारके दुःखोंका नाश करनेवाला, सब प्रकारके मनोरथ पूर्ण करनेवाला, मोक्षदाता, वैदिक भावोंसे ओत-प्रोत तथा सभी आगमोंके रसोंसे परिपूर्ण, अत्यन्त मनोहर एवं मुमुक्षुजनोंको सदा प्रिय लगनेवाला है॥ ३४-३५॥ |
| कामदं मोक्षदं चैव वेदार्थपरिबृंहितम्।<br>सर्वागमरसारामं मुमुक्षूणां सदा प्रियम्॥ ३५ | |
| व्यासेन कृत्वातिशुभं पुराणं<br>शुकाय पुत्राय महात्मने यत्।<br>वैराग्ययुक्ताय च पाठितं वै<br>विज्ञाय चैवारणिसम्भवाय॥ ३६ | जिस अत्यन्त पवित्र पुराणको रचकर व्यासजीने अरणीके गर्भसे उत्पन्न, विद्वान्, महात्मा एवं विरक्त अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया था; हे मुनिवृन्द! उसी रहस्यमय महापुराण (श्रीमद्देवीभागवत)-को मैंने भी करुणासागर अपने गुरु व्यासजीके मुखसे सम्पूर्णरूपसे यथार्थतः सुना तथा उनकी कृपासे उसे हृदयंगम कर लिया है॥ ३६-३७॥ |
| श्रुतं मया तत्र तथा गृहीतं<br>यथार्थवद्व्यासमुखान्मुनीन्द्राः ।<br>पुराणगुह्यं सकलं समेतं<br>गुरोः प्रसादात्करुणानिधेश्च॥ ३७ | |
| सूतेन पृष्टः सकलं जगाद<br>द्वैपायनस्तत्र पुराणगुह्यम्।<br>अयौनिजेनाद्भुतबुद्धिना वै<br>श्रुतं मया तत्र महाप्रभावम्॥ ३८ | जिस समय अयोनoutputिज एवं अपूर्व बुद्धिमान् अपने पुत्र शुकदेवजीके प्रश्न करनेपर व्यासजीने रहस्ययुक्त इस पुराणको सुनाया, उस समय मैंने भी एक साधारण श्रोताके रूपमें इस महान् प्रभाववाले श्रीमद्देवी-भागवतमहापुराणको सुन लिया॥ ३८॥ |
| श्रीमद्भागवतामरांघ्रिपफलास्वादादरः सत्तमाः<br>संसारार्णवदुविर्गाह्यसलिलं सन्तर्तुकामः शुकः।<br>नानाख्यानरसालयं श्रुतिपुटैः प्रेम्णाशृणोदद्भुतं<br>तच्छ्रुत्वा न विमुच्यते कलिभयादेवंविधः कः क्षितौ॥ ३९ | हे सर्वश्रेष्ठ मुनिजन! श्रीमद्भागवतरूपी इस कल्पवृक्षके फलके स्वादके प्रति आदरबुद्धि रखनेवाले तथा अपार संसार-सागरसे पार पानेके लिये श्रीशुकदेवजीने अनेक प्रकारकी सुन्दर एवं रसमयी कथाओंसे युक्त जिस अद्भुत महापुराणको विधिवत् अपने कर्णपुटसे प्रेमपूर्वक सुना है, उसे श्रवण करके भी जो कलिकालके भयसे मुक्त न हुआ, भला ऐसा प्राणी इस भूतलपर कौन होगा?॥ ३९॥ |
| पापीयानपि वेदधर्मरहितः स्वाचारहीनाशयो<br>व्याजेनापि शृणोति यः परमिदं श्रीमत्पुराणोत्तमम्।<br>भुक्त्वा भोगकलापमत्र विपुलं देहावसानेऽचलं<br>योगिप्राप्यमवाप्नुयाद्भगवतीनामाङ्कितं सुन्दरम्॥ ४० | वैदिक धर्मसे रहित तथा निकृष्ट विचार रखनेवाला बड़े-से-बड़ा पापी मनुष्य भी यदि किसी बहाने इस उत्तम श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कर लेता है तो वह भी निश्चय ही समस्त सांसारिक सुखोंको भोगकर अन्तमें योगिजनोंके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य, भगवतीके नामसे चिह्नित, मनोरम तथा अचल पदको प्राप्त कर लेता है॥ ४०॥ |
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ७९
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ७९
| या निर्गुणा हरिहरादिभिरप्यलभ्या<br>विद्या सतां प्रियतमाथ समाधिगम्या।<br>सा तस्य चित्तकुहरे प्रकरोति भावं<br>यः संशृणोति सततं तु सतीपुराणम्॥ ४१ | जो प्राणी इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणको प्रतिदिन प्रेमसे सुनता है, उसके हृदयरूपी गुहामें विष्णु, शिव आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ, सर्वश्रेष्ठ विद्यारूपिणी, सज्जनोंकी एकमात्र प्रिया, गुणातीता एवं समाधिद्वारा जाननेयोग्य वे भगवती निवास करने लगती हैं ॥ ४१ ॥ | | सम्प्राप्य मानुषभवं सकलाङ्गयुक्तं<br>पोतं भवार्णवजलोत्तरणाय कामम्।<br>सम्प्राप्य वाचकमहो न शृणोति मूढः<br>स वञ्चितोऽत्र विधिना सुखदं पुराणम्॥ ४२ | अतः सर्वांगसुन्दर इस मानव-तनको पाकर संसार-सागरके अगाध सलिलसे पार होनेके लिये जलयानके समान परम सुखदायी श्रीमद्देवीभागवतपुराण एवं उसके वक्ताको प्राप्त करके भी जो मूर्ख इसका श्रवण नहीं करता, वह विधाताके द्वारा वंचित ही कहा जायगा ॥ ४२ ॥ | | यः प्राप्य कर्णयुगलं पटुमानुषत्वे<br>रागी शृणोति सततं च परापवादान्।<br>सर्वार्थदं रसनिधिं विमलं पुराणं<br>नष्टः कुतो न शृणुते भुवि मन्दबुद्धिः॥ ४३ | इस दुर्लभ मनुष्य देहमें दोनों कानोंको प्राप्त करके भी जो सांसारिक मनुष्य केवल दूसरोंके दुर्गुणोंको ही सुना करता है, वह अधम मन्दबुद्धि चारों उत्तम पदार्थोंको देनेवाले तथा सब रसोंसे परिपूर्ण इस निर्मल पुराणको भूतलपर क्यों नहीं सुनता ? ॥ ४३ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुराणवर्णन-पूर्वकतत्तद्युगीयव्यासवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
नारदजीद्वारा व्यासजीको देवीकी महिमा बताना
| ऋषय ऊचुः<br>सौम्य व्यासस्य भार्यायां कस्यां जातः सुतः शुकः।<br>कथं वा कीदृशो येन पठितेयं सुसंहिता॥ १ | ऋषिगण बोले—हे सौम्य ! महर्षि व्यासकी किस पत्नीसे शुकदेवजी उत्पन्न हुए ? उनका जन्म किस प्रकार हुआ और किस प्रकारसे उन्होंने इस संहिताका सम्यक् अध्ययन कर लिया ? ॥ १ ॥ | | अयोनिजस्त्वया प्रोक्तस्तथा चारणिजः शुकः।<br>सन्देहोऽस्ति महांस्तत्र कथयाद्य महामते॥ २ | आपके द्वारा ही वे अयोनिज कहे गये हैं तो फिर अरणीसे उनकी उत्पत्ति कैसे हुई ? हे महामते ! इसमें हमें महान् संशय हो रहा है, आप उसका समाधान करें ॥ २ ॥ | | गर्भयोगी श्रुतः पूर्वं शुको नाम महातपाः।<br>कथं च पठितं तेन पुराणं बहुविस्तरम्॥ ३ | हमलोगोंने पहले ही सुना है कि महातपस्वी शुकदेवजी गर्भयोगी थे। ऐसी स्थितिमें उन्होंने इतने विस्तृत पुराण (श्रीमद्देवीभागवत)-का अध्ययन कैसे कर लिया ? ॥ ३ ॥ | | सूत उवाच<br>पुरा सरस्वतीतीरे व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>आश्रमे कलविंकौ तु दृष्ट्वा विस्मयमागतः॥ ४ | सूतजी बोले—प्राचीन कालमें एक समय सत्यवतीके पुत्र व्यासजी सरस्वतीनदीके किनारे अपने आश्रममें गौरैया पक्षीका जोड़ा देखकर आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४ ॥ |
८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| जातंमात्रं शिशुं नीडे मुक्तमण्डान्मनोहरम्।<br>ताम्रास्यं शुभसर्वाङ्गं पिच्छांकुरविवर्जितम्॥ ५<br>तौ तु भक्ष्यार्थमत्यन्तं रतौ श्रमपरायणौ।<br>शिशोश्चंचुपुटे भक्ष्यं क्षिपन्तौ च पुनः पुनः॥ ६<br>अङ्गेनाङ्गानि बालस्य घर्षयन्तौ मुदान्वितौ।<br>चुम्बन्तौ च मुखं प्रेम्णा कलविंकौ शिशोः शुभम्॥ ७ | अण्डेसे तत्काल पैदा हुए लाल मुखवाले, सुन्दर अंगोंवाले एवं पंखरहित शिशुको घोंसलेमें ही छोड़कर वे दोनों उड़ गये और अत्यन्त परिश्रमसे चारा लाकर उस शिशुके चोंचमें डालते हुए दोनों पक्षी अत्यन्त आह्लादयुक्त होकर उस शिशुके अंगोंको अपने अंगोंसे रगड़ते हुए प्रेमपूर्वक उसके सुन्दर मुखको चूम रहे थे॥५-७॥ |
|---|---|
| वीक्ष्य प्रेमाद्भुतं तत्र बाले चटकयोस्तदा।<br>व्यासश्चिन्तातुरः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ ८<br>तिरश्चामपि यत्प्रेम पुत्रे समभिलक्ष्यते।<br>किं चित्रं यन्मनुष्याणां सेवाफलमभीप्सताम्॥ ९<br>किमेतौ चटकौ चास्य विवाहं सुखसाधनम्।<br>विरच्य सुखिनौ स्यातां दृष्ट्वा वध्वा मुखं शुभम्॥ १०<br>अथवा वार्धके प्राप्ते परिचर्यां करिष्यति।<br>पुत्रः परमधर्म्मिष्ठः पुण्यार्थं कलविंकयोः॥ ११<br>अर्जयित्वाथवा द्रव्यं पितरौ तर्पयिष्यति।<br>अथवा प्रेतकार्याणि करिष्यति यथाविधि॥ १२<br>अथवा किं गयाश्राद्धं गत्वा संवितरिष्यति।<br>नीलोत्सर्गं च विधिवत्प्रकरिष्यति बालकः॥ १३ | व्यासजी उस शिशुमें उन दोनों पक्षियोंका ऐसा अद्भुत प्रेम देखकर चिन्तामें पड़ गये और मन-ही-मन सोचने लगे। यदि अपने पुत्रके प्रति पक्षियोंमें ऐसा प्रेम दिखायी दे रहा है तो अपनी सेवाका फल चाहनेवाले मनुष्योंमें ऐसा प्रेम-व्यवहार होनेमें आश्चर्य ही क्या! क्या ये दोनों पक्षी इसका सुख-साधनस्वरूप विवाह करके स्वयं सुखी रहते हुए इसकी वधूका सुन्दर मुख देख पायेंगे? क्या इनकी वृद्धावस्थामें यह धर्मनिष्ठ पुत्र पुण्य-प्राप्तिके लिये इन दोनोंकी सेवा करेगा? धन आदि अर्जित करके क्या यह अपने माता-पिताको सन्तुष्ट रखेगा और इनकी मृत्युके उपरान्त क्या इनका विधि-पूर्वक प्रेतकर्म करेगा? अथवा क्या गयातीर्थ जाकर यह बालक उनके श्राद्ध आदि कर्म करके उनका उद्धार करेगा तथा उनके परलोकसाधनहेतु क्या यह विधिपूर्वक नीलोत्सर्ग (नील वृषभ छोड़नेका कर्म) करेगा?॥८-१३॥ |
| संसारेऽत्र समाख्यातं सुखानामुत्तमं सुखम्।<br>पुत्रगात्रपरिष्वंगो लालनञ्च विशेषतः॥ १४ | पुत्रके शरीरका आलिंगन और विशेषरूपसे उसका लालन-पालन इस संसारमें सभी सुखोंमें उत्तम सुख कहा गया है॥ १४॥ |
| अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च।<br>पुत्रादन्यत्तरन्नास्ति परलोकस्य साधनम्॥ १५ | पुत्ररहित मनुष्यकी न तो सद्गति होती है और न तो उसे स्वर्गकी ही प्राप्ति होती है। अतः परलोकसाधनके लिये पुत्रसे बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है॥ १५॥ |
| मन्वादिभिश्च मुनिभिर्धर्मशास्त्रेषु भाषितम्।<br>पुत्रवान्स्वर्गमाप्नोति नापुत्रस्तु कथञ्चन॥ १६ | मनु आदि ऋषियोंने भी धर्मशास्त्रोंमें कहा है कि पुत्रवान् मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है और पुत्रहीन व्यक्तिको स्वर्ग-प्राप्ति कभी भी नहीं होती है॥ १६॥ |
| दृश्यतेऽत्र समक्षं तन्नानुमानेन साध्यते।<br>पुत्रवान्मुच्यते पापादाप्तवाक्यं च शाश्वतम्॥ १७ | इस बातमें अनुमानकी कोई आवश्यकता ही नहीं है अपितु यह प्रत्यक्षरूपमें भी देखा जाता है; साथ ही यह वेद, स्मृति आदिका भी सनातन वचन है कि पुत्रवान् मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १७॥ |
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ८१
अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आतुरे मृत्युकालेऽपि भूमिशय्यागतो नरः।<br>करोति मनसा चिन्तां दुःखितः पुत्रवर्जितः॥ १८<br>धनं मे विपुलं गेहे पात्राणि विविधानि च।<br>मन्दिरं सुन्दरं चैतत्कोऽस्य स्वामी भविष्यति॥ १९ | रोगावस्था में तथा मरणकालमें भूमि-शय्यापर पड़ा हुआ सन्तानहीन प्राणी दुःखित होकर अपने मनमें विचार करता है कि मेरे घरमें पर्याप्त धन है, अनेक प्रकारके पात्र हैं तथा मेरा यह भवन भी अत्यन्त सुन्दर है; किंतु अब इन सबका स्वामी कौन होगा ? ॥ १८-१९ ॥ |
| मृत्युकाले मनस्तस्य दुःखेन भ्रमते यतः।<br>अतोऽस्य दुर्गतिर्नूनं भ्रान्तचित्तस्य सर्वथा॥ २० | चूँकि मृत्युकालमें उस प्राणीका मन अति दुःखी होकर भ्रमित होता रहता है, इसलिये उस भ्रान्त मनवाले प्राणीकी दुर्गति अवश्य ही होती है॥ २०॥ |
| एवं बहुविधां चिन्तां कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>निःश्वस्य बहुधा चोष्णं विमनाः सम्बभूव ह॥ २१ | इस प्रकार अनेकानेक चिन्तन करके और बार-बार लम्बी तथा गर्म साँसें लेकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीका मन अत्यन्त खिन्न हो गया॥ २१॥ |
| विचार्य मनसात्यर्थं कृत्वा मनसि निश्चयम्।<br>जगाम च तपस्तप्तुं मेरुपर्वतसन्निधौ॥ २२ | इसके बाद मनमें बहुत सोच-विचार करके अन्ततः दृढ़ निश्चय करके वे तपश्चर्याके लिये मेरुपर्वतपर चले गये॥ २२॥ |
| मनसा चिन्तयामास कं देवं समुपास्महे।<br>वरप्रदाननिपुणं वाञ्छितार्थप्रदं तथा॥ २३<br>विष्णुं रुद्रं सुरेन्द्रं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>गणेशं कार्तिकेयं च पावकं वरुणं तथा॥ २४ | उन्होंने मनमें विचार किया कि मैं विष्णु, रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, कार्तिकेय, अग्नि एवं वरुण—इन देवताओंमें किस देवताकी आराधना करूँ, जो वरप्रदान करनेमें उदार तथा अभीष्ट फलोंको देनेवाला हो॥ २३-२४॥ |
| एवं चिन्तयतस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः।<br>यदृच्छया समायातो वीणापाणिः समाहितः॥ २५ | इस प्रकार व्यासजी विचार कर ही रहे थे कि उसी समय संयोगवश मुनिश्रेष्ठ नारदजी हाथोंमें वीणा धारण किये हुए वहाँ आ गये॥ २५॥ |
| तं दृष्ट्वा परमप्रीतो व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>कृत्वार्घ्यमासनं दत्त्वा पप्रच्छ कुशलं मुनिम्॥ २६ | उन्हें देखकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अर्घ्य तथा आसन प्रदान करके उन मुनिसे कुशल-क्षेम पूछा॥ २६॥ |
| श्रुत्वाथ कुशलप्रश्नं पप्रच्छ मुनिसत्तमः।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं द्वैपायन वदस्व मे॥ २७ | कुशल-प्रश्न सुन लेनेके पश्चात् मुनिवर नारदजीने पूछा—हे द्वैपायन! आप किस कारणसे चिन्ताग्रस्त हैं? मुझे बतायें॥ २७॥ |
| व्यास उवाच<br>अपुत्रस्य गतिर्नास्ति न सुखं मानसे यतः।<br>तदर्थं दुःखितश्चाहं चिन्तयामि पुनः पुनः॥ २८ | व्यासजी बोले—सन्तानहीन व्यक्तिकी सद्गति नहीं होती और कभी भी उसके मनमें सुखानुभूति नहीं होती है। इसी बातको लेकर मैं अत्यन्त दुःखित हूँ और बार-बार यही सोचता रहता हूँ॥ २८॥ |
| तपसा तोषयाम्यद्य कं देवं वाञ्छितार्थदम्।<br>इति चिन्तातुरोऽस्म्यद्य त्वामहं शरणं गतः॥ २९ | मैं अभिलषित फल देनेवाले किस देवताको अपनी तपःसाधनासे प्रसन्न करूँ, इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं [अब इसके समाधानहेतु] आपकी शरणमें हूँ॥ २९॥ |
| ८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| सर्वज्ञोऽसि महर्षे त्वं कथयाशु कृपानिधे।<br>कं देवं शरणं यामि यो मे पुत्रं प्रदास्यति॥ ३० | हे महर्षे! आप सब कुछ जाननेवाले हैं। हे कृपासिन्धु! आप मुझे शीघ्र ही बतायें कि मैं किस देवताकी शरणमें जाऊँ, जो प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान कर दे॥ ३०॥ | | सूत उवाच<br>इति व्यासेन पृष्टस्तु नारदो वेदविन्मुनिः।<br>उवाच परया प्रीत्या कृष्णं प्रति महामनाः॥ ३१ | **सूतजी बोले—**व्यासजीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदवेत्ता तथा महामना महर्षि नारद अत्यन्त प्रेमपूर्वक कृष्णद्वैपायनसे कहने लगे॥ ३१॥ | | नारद उवाच<br>पाराशर्य महाभाग यत्त्वं पृच्छसि मामिह।<br>तमेवार्थं पुरा पृष्टः पित्रा मे मधुसूदनः॥ ३२ | **नारदजी बोले—**हे पराशरतपनय! हे महाभाग! आपके द्वारा जो प्रश्न यहाँ मुझसे पूछा गया है, वैसा ही प्रश्न पूर्वकालमें मेरे पिता ब्रह्माजीने मधुसूदन भगवान् विष्णुसे किया था॥ ३२॥ | | ध्यानस्थं च हरिं दृष्ट्वा पिता मे विस्मयं गतः।<br>पर्यपृच्छत देवेशं श्रीनाथं जगतः पतिम्॥ ३३<br>कौस्तुभोद्भासितं दिव्यं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>पीताम्बरं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ३४<br>कारणं सर्वलोकानां देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>वासुदेवं जगन्नाथं तप्यमानं महत्त्पः॥ ३५ | मेरे पिता ब्रह्माजी कौस्तुभमणिकी प्रभासे दीप्तिमान्, शंख-चक्र-गदा और पद्म धारण करनेवाले, पीत वस्त्र धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्षःस्थलवाले, सभी लोकोंके कारणस्वरूप, देवाधिदेव, जगद्गुरु, जगदीश्वर, वासुदेव, देवेश, जगत्पति, श्रीनाथ विष्णुको ध्यानमें अवस्थित होकर कठोर तप करते हुए देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा॥ ३३—३५॥ | | ब्रह्मोवाच<br>देवदेव जगन्नाथ भूतभव्यभवत्प्रभो।<br>तपश्चरसि कस्मात्त्वं किं ध्यायसि जनार्दन॥ ३६ | **ब्रह्माजी बोले—**हे देवाधिदेव ! हे जगन्नाथ ! हे भूत-भविष्य-वर्तमानके स्वामी ! आप किसलिये यह कठोर तपस्या कर रहे हैं ? हे जनार्दन ! आप किसके ध्यानमें लीन हैं ?॥ ३६॥ | | विस्मयोऽयं ममात्यर्थं त्वं सर्वजगतां प्रभुः।<br>ध्यानयुक्तोऽसि देवेश किं च चित्रमतः परम्॥ ३७ | हे देवेश ! [यह देखकर] मैं परम विस्मयमें पड़ गया हूँ कि समस्त विश्वका स्वामी होते हुए भी आप ऐसा ध्यान कर रहे हैं; भला इससे बढ़कर अन्य कौन-सी विचित्र बात होगी !॥ ३७॥ | | त्वन्नाभिकमलाज्जातः कर्ताहमखिलस्य ह।<br>त्वत्तः कोऽप्यधिकोऽस्त्यत्र तं देवं ब्रूहि मापते॥ ३८ | आपके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत होकर मैं सम्पूर्ण लोकोंके कर्ताके रूपमें अधिष्ठित हूँ। हे लक्ष्मीपते ! आपसे भी श्रेष्ठतर कौन देवता है ? उस देवताको मुझे बताइये॥ ३८॥ | | जानाम्यहं जगन्नाथ त्वमादिः सर्वकारणम्।<br>कर्ता पालयिता हर्ता समर्थः सर्वकार्यकृत्॥ ३९ | हे जगन्नाथ ! मैं तो यही जानता हूँ कि आप ही आदिस্বরূপ, सबके कारण, निर्माता, पालनकर्ता, संहारक तथा सभी कार्योंको सम्पादित करनेवाले हैं॥ ३९॥ | | इच्छया ते महाराज सृजाम्यहमिदं जगत्।<br>हरः संहरते काले सोऽपि ते वचने सदा॥ ४० | हे महाराज ! आपकी इच्छासे ही मैं इस जगत्के रचनाकार्यमें प्रवृत्त होता हूँ और सदा आपके ही आदेशसे शंकरजी प्रलयावस्थामें जगत्का संहार करते हैं॥ ४०॥ |
| अ० ४ ] | प्रथम स्कन्ध | ८३ | | :--- | :--- |
| सूर्यो भ्रमति चाकाशे वायुर्वाति शुभाशुभः।<br>अग्निस्तपति पर्जन्यो वर्षतीश त्वदाज्ञया॥ ४१ | हे ईश! आपकी आज्ञासे ही सूर्य आकाशमें [नियमित रूपसे] भ्रमण करता है, शुभ तथा अशुभ हवा चलती है, अग्नि ताप धारण करती है और मेघ वृष्टि करता है॥ ४१॥ | | त्वं तु ध्यायसि कं देवं संशयोऽयं महान्मम।<br>त्वत्तः परं न पश्यामि देवं वै भुवनत्रये॥ ४२ | आप किस देवताका ध्यान कर रहे हैं? यह मेरी महती शंका है। मैं तो तीनों लोकोंमें आपसे बढ़कर अन्य किसी देवताको नहीं जानता हूँ॥ ४२॥ | | कृपां कृत्वा वदस्वाद्य भक्तोऽस्मि तव सुव्रत।<br>महतां नैव गोप्यं हि प्रायः किञ्चिदिति स्मृतिः॥ ४३ | हे सुव्रत! मैं आपका भक्त हूँ, अतः कृपा करके [अपनी तपस्याका रहस्य] बताइये; क्योंकि यह सर्वविदित है कि महान् लोग अपने भक्तोंसे कुछ भी गोपनीय नहीं रखते हैं॥ ४३॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरिराह प्रजापतिम्।<br>शृणुष्वैकमना ब्रह्मंस्त्वां ब्रवीमि मनोगतम्॥ ४४ | ब्रह्माजीका वचन सुनकर भगवान् विष्णु उनसे बोले—हे ब्रह्मन्! आपको अपने मनकी बात बताता हूँ, आप उसे एकाग्रचित्त होकर सुनें॥ ४४॥ | | यद्यपि त्वां शिवं मां च स्थितिसृष्ट्यन्तकारणम्।<br>ते जानन्ति जनाः सर्वे सदेवासुरमानुषाः॥ ४५<br><br>स्रष्टा त्वं पालकश्चाहं हरः संहारकारकः।<br>कृताः शक्त्येति संतर्कः क्रियते वेदपारगैः॥ ४६ | यद्यपि सभी देव, दानव और मानव यही जानते हैं कि आप जगत्की रचना, मैं जगत्के पालन और शिवजी जगत्के संहारके परम कारण हैं तथापि वेद-तत्त्वज्ञ विद्वान् यह तर्कना करते हैं कि किसी शक्तिके द्वारा ही आप सृष्टिके कर्ता हैं, मैं भर्ता हूँ और शंकरजी हर्ता हैं॥ ४५-४६॥ | | जगत्संजनने शक्तिस्त्वयि तिष्ठति राजसी।<br>सात्त्विकी मयि रुद्रे च तामसी परिकीर्तिता॥ ४७ | जगत्की रचनाके लिये आपमें राजसी शक्ति विद्यमान है, मुझमें सात्त्विकी शक्ति स्थित है तथा शिवजीमें तामसी शक्ति बतायी गयी है॥ ४७॥ | | तया विरहितस्त्वं न तत्कर्मकरणे प्रभुः।<br>नाहं पालयितुं शक्तः संहर्तुं नापि शङ्करः॥ ४८ | उस शक्तिके न रहनेपर आप न तो सृष्टि-रचना कर सकते हैं, न मैं पालन-कार्य करनेमें समर्थ हो सकता हूँ और न तो शंकर संहार कर सकते हैं॥ ४८॥ | | तदधीना वयं सर्वे वर्तामः सततं विभो।<br>प्रत्यक्षे च परोक्षे च दृष्टान्तं शृणु सुव्रत॥ ४९ | हे विभो! हम सभी निरन्तर उसी शक्तिके अधीन रहते हैं। हे सुव्रत! अब प्रत्यक्ष तथा परोक्षसे सम्बन्धित दृष्टान्त भी आप सुनिये॥ ४९॥ | | शेषे स्वपिमि पर्यङ्के परतन्त्रो न संशयः।<br>तदधीनः सदोत्तिष्ठे काले कालवशं गतः॥ ५० | इसमें कोई संशय नहीं कि मैं परतन्त्र होकर शेष-शय्यापर शयन करता हूँ और उसी शक्तिके अधीन होकर समयपर कालका वशवर्ती होकर मैं शयनसे उठता हूँ॥ ५०॥ | | तपश्चरामि सततं तदधीनोऽस्म्यहं सदा।<br>कदाचित्सह लक्ष्म्या च विहरामि यथासुखम्॥ ५१<br><br>कदाचिद्दानवैः सार्धं संग्रामं प्रकरोम्यहम्।<br>दारुणं देहदमनं सर्वलोकभयङ्करम्॥ ५२ | उसी शक्तिका अवलम्बन प्राप्तकर मैं सदा तपश्चरण करता रहता हूँ। मैं कभी लक्ष्मीके साथ सुखपूर्वक विहार करता हूँ और कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण, शरीरको चूर्ण कर देनेवाला तथा लोगोंको भयभीत कर देनेवाला युद्ध भी करता हूँ॥ ५१-५२॥ |
८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रत्यक्षं तव धर्मज्ञ तस्मिन्नेकार्णवे पुरा।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुयुद्धं मया कृतम्॥ ५३ | हे धर्मज्ञ! आप यह तो प्रत्यक्ष जानते हैं कि पूर्व समयमें मेरे द्वारा उस महासिन्धुमें पाँच हजार वर्षोंतक भीषण बाहुयुद्ध किया गया था॥ ५३॥ |
| तौ कर्णमलजौ दुष्टौ दानवौ मदगर्वितौ।<br>देव देव्याः प्रसादेन निहतौ मधुकैटभौ॥ ५४<br><br>तदा त्वया न किं ज्ञातं कारणं तु परात्परम्।<br>शक्तिरूपं महाभाग किं पृच्छसि पुनः पुनः॥ ५५ | हे देव! कानकी मैलसे उत्पन्न अत्यन्त दुष्ट, मदोन्मत्त तथा अहंकारी मधु-कैटभ नामक दोनों दानवोंका मैंने देवीकी कृपासे ही संहार किया था। हे महाभाग! क्या आप उस समय परात्पर कारणस्वरूपा महाशक्तिको नहीं जान पाये थे? अतः बार-बार क्यों पूछ रहे हैं?॥ ५४-५५॥ |
| यदिच्छः पुरुषो भूत्वा विचरामि महार्णवे।<br>कच्छपः कोलसिंहश्च वामनश्च युगे युगे॥ ५६ | उसी शक्तिकी इच्छासे मैं परमपुरुषके रूपमें महासागरमें विचरण करता हूँ और विभिन्न युगोंमें कच्छप, वराह, नृसिंह तथा वामनके रूपमें अवतरित होता रहता हूँ॥ ५६॥ |
| न कस्यापि प्रियो लोके तिर्यग्योनिषु सम्भवः।<br>नाभवं स्वेच्छया वामवराहादिषु योनिषु॥ ५७ | तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होना किसीके लिये भी प्रिय नहीं होता। मैं अपनी इच्छासे वामन, वराह आदि योनियोंमें उत्पन्न नहीं होता हूँ। [अपितु इसमें उसी शक्तिकी प्रेरणा ही परम कारण है]॥ ५७॥ |
| विहाय लक्ष्म्या सह संविहारं<br>को याति मत्स्यादिषु हीनयोनिषु।<br>शय्यां च मुक्त्वा गरुडासनस्थः<br>करोमि युद्धं विपुलं स्वतन्त्रः॥ ५८ | भला ऐसा कौन होगा, जो लक्ष्मीके साथ सुखदायक विहारका त्याग करके मत्स्यादि नीच योनियोंमें जन्म लेगा? यदि मैं स्वतन्त्र होता तो [सुखदायिनी] शय्याको छोड़कर गरुडरूपी आसनपर बैठकर महाभयंकर युद्ध क्यों करता!॥ ५८॥ |
| पुरा पुरस्तेऽज शिरो मदीयं<br>गतं धनुर्ज्यास्खलनात्क्व चापि।<br>त्वया तदा वाजिशिरो गृहीत्वा<br>संयोजितं शिल्पिवरेण भूयः॥ ५९ | हे अज! प्राचीन कालमें एक बार आपके समक्ष ही धनुषकी प्रत्यंचा टूट जानेके कारण मेरा सिर छिन्न हो गया था। तब शिल्पकारोंमें श्रेष्ठ आपने फिरसे मेरे धड़पर घोड़ेका सिर जोड़ दिया था॥ ५९॥ |
| हयाननोऽहं परिकीर्तितश्च<br>प्रत्यक्षमेतत्तव लोककर्तः।<br>विडम्बनेयं किल लोकमध्ये<br>कथं भवेदात्मपरो यदि स्याम्॥ ६० | हे लोकनिर्माता! उसी समयसे मैं 'हयग्रीव' नामसे लोकप्रसिद्ध हुआ, यह सब आपके सामने घटित हुआ था। यदि मैं स्वाधीन होता तो संसारमें यह विडम्बना कैसे होती?॥ ६०॥ |
| तस्मान्नाहं स्वतन्त्रोऽस्मि शक्त्यधीनोऽस्मि सर्वथा।<br>तामेव शक्तिं सततं ध्यायामि च निरन्तरम्॥ ६१<br><br>नातः परतरं किञ्चिज्जानामि कमलोद्भव। | अतएव मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ, अपितु सर्वथा उसी शक्तिके अधीन हूँ। मैं निरन्तर उसी शक्तिका ध्यान करता रहता हूँ। हे कमलोद्भव! मैं इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं जानता॥ ६१ १/२॥ |
| नारद उवाच<br>इत्युक्तं विष्णुना तेन पद्मयोनेस्तु सन्निधौ॥ ६२ | नारदजी बोले—हे व्यासजी! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा था। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे पिता |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ८५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेन चाप्यहमुक्तोऽस्मि तथैव मुनिपुङ्गव।<br>तस्मात्त्वमपि कल्याण पुरुषार्थाप्तिहेतवे॥ ६३<br><br>असंशयं हृदम्भोजे भज देवीपदाम्बुजम्।<br>सर्वं दास्यति सा देवी यद्यदिष्टं भवेत्तव॥ ६४ | ब्रह्माजीने वे सब बातें मुझसे कही थीं। अतः आप भी कल्याणकारी पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे सर्वथा संशयरहित होकर अपने हृदयकमलमें देवी भगवतीके चरणारविन्दका ध्यान कीजिये। वे देवी आपके समस्त अभिलषित फलोंको अवश्य प्रदान करेंगी॥ ६२-६४॥ |
| सूत उवाच<br>नारदेनैवमुक्तस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>देवीपादाब्जनिष्ठातस्तपसे प्रययौ गिरौ॥ ६५ | सूतजी बोले—नारदजीके ऐसा कहनेपर सत्यवतीपुत्र व्यासजी देवीके चरणारविन्दमें अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए तपश्चर्याहेतु पर्वतपर चले गये॥ ६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे देवीसर्वोत्तमतेकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
भगवती लक्ष्मीके शापसे विष्णुका मस्तक कट जाना, वेदोंद्वारा स्तुति करनेपर देवीका प्रसन्न होना, भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>सूतास्माकं मनः कामं मग्नं संशयसागरे।<br>यथोक्तं महदाश्चर्यं जगद्विस्मयकारकम्॥ १<br><br>यन्मूर्धा माधवस्यापि गतो देहात्पुनः परम्।<br>हयग्रीवस्ततो जातः सर्वकर्ता जनार्दनः॥ २ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! हमारा चित्त सन्देहरूपी सागरमें पूर्णतः डूबता जा रहा है; क्योंकि आपने महान् आश्चर्यजनक तथा संसारको विस्मित कर देनेवाली यह बात कह दी कि विष्णुके शरीरसे उनका सिर अलग हो गया था और वे सर्वपालक जनार्दन पुनः हयग्रीव हो गये थे॥ १-२॥ |
| वेदोऽपि स्तौति यं देवं देवाः सर्वे यदाश्रयाः।<br>आदिदेवो जगन्नाथः सर्वकारणकारणः॥ ३<br><br>तस्यापि वदनं छिन्नं दैवयोगात्कथं तदा।<br>तत्सर्वं कथयाशु त्वं विस्तरेण महामते॥ ४ | वेद भी जिन भगवान् विष्णुका स्तवन करते हैं, समस्त देवता जिनका आश्रय ग्रहण करते हैं, जो आदिदेव हैं, जगत्के स्वामी हैं और सभी कारणोंके भी कारण हैं; दैवयोगसे उनका भी मस्तक कैसे कट गया? हे महामते! वह सब आप हमसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये॥ ३-४॥ |
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सावधानाः समन्ततः।<br>चरितं देवदेवस्य विष्णोः परमतेजसः॥ ५ | सूतजी बोले—हे मुनियो! आप सभी लोग एकाग्रचित्त होकर परम तेजस्वी देवाधिदेव भगवान् विष्णुका चरित्र सुनिये॥ ५॥ |
| कदाचिद्दारुणं युद्धं कृत्वा देवः सनातनः।<br>दशवर्षसहस्राणि परिश्रान्तो जनार्दनः॥ ६ | किसी समय वे सनातन देव विष्णु दस हजार वर्षोंतक भीषण युद्ध करके अत्यन्त थक गये थे॥ ६॥ |
| समे देशे शुभे स्थाने कृत्वा पद्मासनं विभुः।<br>अवलम्ब्य धनुः सज्यं कण्ठदेशे धरास्थितम्॥ ७<br><br>दत्त्वा भारं धनुष्कोट्यां निद्रामप रमापतिः।<br>श्रान्तत्वादैवयोगाच्च जातस्तत्रातिनिद्रितः॥ ८ | तदनन्तर एक समतल तथा शुभ स्थानपर पद्मासन लगाकर पृथ्वीपर स्थित प्रत्यंचा चढ़े हुए धनुषपर कण्ठप्रदेश (गर्दन) टिकाये हुए उस धनुषकी नोंकपर भार देकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु सो गये और थकावटके कारण दैवयोगसे उन्हें गहरी नींद आ गयी॥ ७-८॥ |
| ८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| तदा कालेन कियता देवाः सर्वे सवासवाः।<br>ब्रह्मेशसहिताः सर्वे यज्ञं कर्तुं समुद्यताः॥ ९<br><br>गताः सर्वेऽथ वैकुण्ठं द्रष्टुं देवं जनार्दनम्।<br>देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं मखानाधिपं प्रभुम्॥ १० | कुछ समय बीतनेके बाद ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्रसहित सभी देवता यज्ञ करनेको उद्यत हुए। वे सब देवकार्यकी सिद्धिहेतु यज्ञोंके अधिपति जनार्दन भगवान् विष्णुके दर्शनार्थ वैकुण्ठलोक गये॥ ९-१०॥ |
| अदृष्ट्वा तं तदा तत्र ज्ञानदृष्ट्या विलोक्य ते।<br>यत्रास्ते भगवान् विष्णुर्जग्मुस्तत्र तदा सुराः॥ ११ | उस समय उन्हें वहाँ न देखकर वे देवतागण ज्ञान-दृष्टिसे देख करके वहाँ पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णु विराजमान थे॥ ११॥ |
| ददृशुस्ते तदेशानं योगनिद्रावशं गतम्।<br>विचेतनं विभुं विष्णुं तत्रासांचक्रिरे सुराः॥ १२ | वहाँ उन्होंने सर्वव्यापी भगवान् विष्णुको योग-निद्राके वशीभूत होकर अचेत पड़ा हुआ देखा। तब वे देवगण वहीं रुक गये॥ १२॥ |
| स्थितेषु सर्वदेवेषु निद्रासुप्ते जगत्पतौ।<br>चिन्तामापुः सुराः सर्वे ब्रह्मरुद्रपुरोगमाः॥ १३ | सभी देवताओंके वहाँ रुक जानेके बाद जगत्पति विष्णुको निद्रामग्न देखकर ब्रह्मा-रुद्र आदि प्रमुख देवता अत्यन्त चिन्तित हुए॥ १३॥ |
| तानुवाच ततः शक्रः किं कर्तव्यं सुरोत्तमाः।<br>निद्राभङ्गः कथं कार्यश्चिन्तयन्तु सुरोत्तमाः॥ १४ | तदनन्तर इन्द्रने देवताओंसे कहा—हे श्रेष्ठ देवगण! अब क्या किया जाय? हे श्रेष्ठ देवताओ! अब आप सभी यह विचार करें कि इनकी निद्रा किस प्रकार भंग की जाय?॥ १४॥ |
| तमुवाच तदा शम्भुर्निद्राभङ्गेऽस्ति दूषणम्।<br>कार्यं चैव प्रकर्तव्यं यज्ञस्य सुरसत्तमाः॥ १५ | तब शिवजीने इन्द्रसे कहा कि इनकी निद्राका भंग करनेसे महान् दोष लगेगा, किंतु हे श्रेष्ठ देवगण! यज्ञकार्य भी अवश्यकरणीय है॥ १५॥ |
| उत्पादिता तदा वम्री ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>तया भक्षयितुं तत्र धनुषोऽग्रं धरास्थितम्॥ १६ | इसके बाद परमेष्ठी ब्रह्माजीने पृथ्वीपर स्थित धनुषके अग्रभागको खा जानेके लिये दीमकका सृजन किया॥ १६॥ |
| भक्षितेऽग्रे तदा निम्नं गमिष्यति शरासनम्।<br>तदा निद्राविमुक्तोऽसौ देवदेवो भविष्यति॥ १७<br><br>देवकार्यं तदा सर्वं भविष्यति न संशयः।<br>स वम्रीं संदिदेशाथ देवदेवः सनातनः॥ १८ | [उन्होंने यह सोचा कि] दीमकके द्वारा धनुषका अग्रभाग खा लिये जानेपर धनुष नीचा हो जायगा। तब वे देवाधिदेव विष्णु निद्रामुक्त हो जायेंगे। ऐसा होनेपर निस्संदेह देवताओंका सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जायगा। अतः सनातन ब्रह्माजीने दीमकको इस कार्यके लिये आदेश दिया॥ १७-१८॥ |
| तमुवाच तदा वम्री देवदेवस्य मापतेः।<br>निद्राभङ्गः कथं कार्यो देवस्य जगतां गुरोः॥ १९<br><br>निद्राभङ्गः कथाच्छेदो दम्पत्योः प्रीतिभेदनम्।<br>शिशुमातृविभेदश्च ब्रह्महत्यासमं स्मृतम्॥ २० | तब दीमकने ब्रह्माजीसे कहा कि देवाधिदेव जगद्गुरु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका निद्रा-भंग मैं कैसे करूँ? क्योंकि नींदमें बाधा डालना, कथामें विघ्न पैदा करना, पति-पत्नीके बीच भेद उत्पन्न करना एवं माँ-पुत्रके बीच वैरभाव पैदा करनेके लिये षड्यन्त्र |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ८७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्कथं देवदेवस्य करोमि सुखनाशनम्।<br>किं फलं भक्षणाद्देव येन पापं करोम्यहम्॥ २१<br><br>सर्वः स्वार्थवशो लोकः कुरुते पातकं किल।<br>तस्मादहं करिष्यामि स्वार्थमेव प्रभक्षणम्॥ २२ | करना ब्रह्महत्याके समान कहा गया है। अतः मैं देवाधिदेव भगवान् विष्णुका सुख क्यों नष्ट करूँ? हे देव! उस धनुषका अग्रभाग खानेसे मेरा क्या लाभ है, जिसके लिये मैं ऐसा पाप करूँ? ॥ १९-२१॥<br><br>स्वार्थके वशीभूत होकर ही समस्त लोक पापकार्यमें प्रवृत्त होता है। इसलिये मैं भी इसमें कोई स्वार्थसिद्धि होनेपर ही इसका भक्षण करूँगा॥ २२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>तव भागं करिष्यामो मखमध्ये यथा शृणु।<br>तेन त्वं कुरु कार्यं नो विष्णुं बोधय माचिरम्॥ २३ | ब्रह्माजी बोले— सुनो, हमलोग यज्ञमें तुम्हारे भागकी व्यवस्था कर देंगे। इसलिये तुम अविलम्ब भगवान् विष्णुको जगाकर हमलोगोंका कार्य सम्पन्न कर दो॥ २३॥ |
| होमकर्मणि पार्श्वे च हविर्दानात्पतिष्यति।<br>तत्ते भागं विजानीहि कुरु कार्यं त्वरान्विता॥ २४ | होमकर्ममें आहुति प्रदान करते समय जो हव्य आस-पास गिरेगा, उसीको अपना भाग समझना; और अब तुम शीघ्रतापूर्वक हमारा कार्य करो॥ २४॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्ता ब्रह्मणा वम्री धनुषोऽग्रं त्वरान्विता।<br>चखाद संस्थितं भूमौ विमुक्ता ज्या तदाभवत्॥ २५ | सूतजी बोले— हे ऋषियो! ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेके अनन्तर दीमकने धरातलपर स्थित धनुषाग्रको शीघ्र ही खा लिया, जिससे धनुषकी डोरी मुक्त हो गयी॥ २५॥ |
| प्रत्यञ्चायां विमुक्तायां मुक्ता कोटिस्तथोत्तरा।<br>शब्दः समभवद् घोरस्तेन त्रस्ताः सुरास्तदा॥ २६<br><br>ब्रह्माण्डं क्षुभितं सर्वं वसुधा कम्पिता तदा।<br>समुद्राश्च समुद्विग्नास्त्रेसुश्च जलजन्तवः॥ २७<br><br>ववुर्वातास्तथा चोग्राः पर्वताश्च चकम्पिरे।<br>उल्कापाता महोत्पाता बभूवुर्दुःखशंसिनः॥ २८<br><br>दिशो घोरतराश्चासन्सूर्योऽप्यस्तंगतोऽभवत्।<br>चिन्तामापुः सुराः सर्वे किं भविष्यति दुर्दिने॥ २९ | प्रत्यंचाके खुल जानेपर धनुषका वह ऊपरी कोना मुक्त हो गया। इस प्रकार एक भीषण ध्वनि पैदा हुई जिससे वहाँ सभी देवगण भयभीत हो गये, ब्रह्माण्ड क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वीमें कम्पन होने लगा, सभी समुद्र उद्विग्न हो गये, जलचर जन्तु व्याकुल हो उठे। प्रचण्ड हवाएँ प्रवाहित होने लगीं, पर्वत प्रकम्पित हो उठे, किसी दारुण आपदाके सूचक उल्कापात आदि महान् उपद्रव होने लगे, सूर्य तिरोहित हो गये तथा सभी दिशाएँ अत्यन्त भयावह हो गयीं। यह सब देखकर देवतालोग चिन्तित होकर सोचने लगे कि इस दुर्दिनमें अब क्या होगा? ॥ २६—२९॥ |
| एवं चिन्तयतां तेषां मूर्धा विष्णोः सकुण्डलः।<br>गतः समुकुटः क्वापि देवदेवस्य तापसाः॥ ३० | हे तपस्वियो! वे देवतागण ऐसा सोच ही रहे थे कि किरीट-कुण्डलसहित देवाधिदेव भगवान् विष्णुका सिर [कटकर] कहीं चला गया॥ ३०॥ |
| अन्धकारे तदा घोरे शान्ते ब्रह्महरौ तदा।<br>शिरोहीनं शरीरं तु ददृशाते विलक्षणम्॥ ३१ | कुछ समय पश्चात् उस घोर अन्धकारके शान्त हो जानेपर ब्रह्मा और शंकरने भगवान् विष्णुका मस्तकविहीन विलक्षण शरीर देखा॥ ३१॥ |
| ८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वा कबन्धं विष्णोस्ते विस्मिताः सुरसत्तमाः।<br>चिन्तासागरमग्नाश्च रुरुदुः शोककर्शिताः॥ ३२ | भगवान् विष्णुका सिरविहीन धड़ देखकर वे श्रेष्ठ देवता अत्यन्त विस्मित हुए और चिन्तासागरमें निमग्न होकर शोकाकुल हो [इस प्रकार] विलाप करने लगे—॥ ३२॥ |
| हा नाथ किं प्रभो जातमत्यद्भुतममानुषम्।<br>वैशसं सर्वदेवानां देवदेव सनातन॥ ३३ | हे नाथ! हे प्रभो! यह कैसी विचित्र अलौकिक घटना हो गयी? हे देवाधिदेव! हे सनातन! हम सभी देवताओंके लिये तो यह बात विनाशकारी है॥ ३३॥ |
| मायेयं कस्य देवस्य यया तेऽद्य शिरो हृतम्।<br>अच्छेद्यस्त्वमभेद्योऽसि अप्रदाह्योऽसि सर्वदा॥ ३४ | यह किस देवताकी माया है, जिसके द्वारा आपके सिरका हरण कर लिया गया। आप तो सर्वदा अच्छेद्य, अभेद्य और अदाह्य हैं॥ ३४॥ |
| एवं गते त्वयि विभो मरिष्यन्ति च देवताः।<br>कीदृशस्त्वयि नः स्नेहः स्वार्थेनैव रुदामहे॥ ३५ | हे विभो! इस प्रकार आपके चले जानेपर हम देवता तो मृत्युको प्राप्त हो जायेंगे। हमलोगोंके प्रति आपका कैसा स्नेह था। हमलोग स्वार्थके कारण ही रुदन कर रहे हैं॥ ३५॥ |
| नायं विघ्नः कृतो दैत्यैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः।<br>देवैरेव कृतः कस्य दूषणं च रमापते॥ ३६ | संकटकी यह स्थिति न तो दैत्योंने, न यक्षोंने और न राक्षसोंने ही पैदा की है, अपितु हम देवताओंने ही यह विघ्न उत्पन्न किया है; तथापि हे रमापते! इसमें किसका दोष समझा जाय?॥ ३६॥ |
| पराधीनाः सुराः सर्वे किं कुर्मः क्व व्रजाम च।<br>शरणं नैव देवेश सुराणां मूढचेतसाम्॥ ३७ | हम सभी देवता पराश्रित हैं। हम इस समय क्या करें और कहाँ जायें? हे देवेश! हम मूढ़ बुद्धिवाले देवताओंके लिये अब कहीं भी कोई शरण नहीं है॥ ३७॥ |
| न चैषा सात्त्विकी माया राजसी न च तामसी।<br>यया छिन्नं शिरस्तेऽद्य मायेशस्य जगद्गुरोः॥ ३८ | यह कोई सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी माया भी नहीं है, जिसके द्वारा आप मायापति जगद्गुरुका सिर काटा गया है॥ ३८॥ |
| क्रन्दमानांस्तदा दृष्ट्वा देवाञ्छिवपुरोगमान्।<br>बृहस्पतिस्तदोवाच शमयन्वेदवित्तमः॥ ३९<br><br>रुदितेन महाभागाः क्रन्दितेन तथापि किम्।<br>उपायश्चात्र कर्तव्यः सर्वथा बुद्धिगोचरः॥ ४०<br><br>दैवं पुरुषकारश्च देवेश सदृशावुभौ।<br>उपायश्च विधातव्यो दैवात्फलति सर्वथा॥ ४१ | तब शिवसहित समस्त देवताओंको करुण क्रन्दन करते हुए देखकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ देवगुरु बृहस्पतिने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—हे महाभागो! अब इस प्रकार क्रन्दनसे क्या लाभ है? इस समय तो विवेकका आश्रय लेकर कोई उपाय करना चाहिये। हे देवेन्द्र! भाग्य एवं पुरुषार्थ—दोनों ही समान श्रेणीके हैं फिर भी उपाय करना ही चाहिये और वह दैवयोगसे ही सफल होता है॥ ३९—४१॥ |
| इन्द्र उवाच<br>दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>विष्णोरपि शिरश्छिन्नं सुराणां चैव पश्यताम्॥ ४२ | **इन्द्र बोले—**अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है, मैं तो दैवको श्रेष्ठतर मानता हूँ; क्योंकि हम देवताओंके देखते-देखते विष्णुका सिर कट गया॥ ४२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कालेनापादितं च यत्।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि दैवं कोऽतिक्रमेत्पुनः॥ ४३ | **ब्रह्माजी बोले—**कालद्वारा जो भी शुभाशुभ कर्मोंका फल निर्धारित है, उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है; भाग्यका अतिक्रमण कौन कर सकता है?॥ ४३॥ |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ८९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देहवान्सुखदुःखानां भोक्ता नैवात्र संशयः।<br>यथा कालवशात्कृत्तं शिरो मे शम्भुना पुरा॥ ४४<br>तथैव लिङ्गपातश्च महादेवस्य शापतः।<br>तथैवाद्य हरेर्मूर्धा पतितो लवणाम्भसि॥ ४५ | प्रत्येक प्राणी काल-क्रमके अनुसार सुख-दुःख भोगता ही है; इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिस प्रकार पूर्वकालमें कालकी प्रेरणासे शंकरजीने मेरा मस्तक काट दिया था, उसी प्रकार शापके कारण शिवजीका लिंग कटकर गिर गया था और उसी प्रकार आज विष्णुका सिर [कटकर] लवणसागरमें जा गिरा है॥ ४४-४५॥ |
| सहस्रभगसंप्राप्तिर्दुःखं चैव शचीपतेः।<br>स्वर्गाद् भ्रंशस्तथा वासः कमले मानसे सरे॥ ४६ | [दैवयोगसे ही] इन्द्रको भी सहस्र भगोंकी प्राप्ति हुई। उन्हें दुःख भोगना पड़ा। वे स्वर्गसे च्युत हो गये और मानसरोवरके कमलमें रहने लगे॥ ४६॥ |
| एते दुःखस्य भोक्तारः केन दुःखं न भुज्यते।<br>संसारेऽस्मिन्महाभागास्तस्माच्छोकं त्यजन्तु वै॥ ४७<br>चिन्तयन्तु महामायां विद्यादेवीं सनातनीम्।<br>सा विधास्यति नः कार्यं निर्गुणा प्रकृतिः परा॥ ४८<br>ब्रह्मविद्यां जगद्धात्रीं सर्वेषां जननीं तथा।<br>यया सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४९ | इस संसारमें जब इन महाभाग देवताओंको भी दुःखका भोग करनेके लिये विवश होना पड़ा तो फिर दुःख भोगनेसे भला कौन वंचित रह सकता है? अतएव आपलोग शोकका परित्याग कर दें और उन महामाया, विद्यारूपा, सनातनी, ब्रह्मविद्या तथा जगत्को धारण करनेवाली देवीका ध्यान कीजिये, जिनके द्वारा यह चराचर सम्पूर्ण त्रिलोक व्याप्त है। वे निर्गुणा परा प्रकृति हमलोगोंका समस्त कार्य सिद्ध कर देंगी॥ ४७-४९॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा वै सुरान्वेधा निगमानादिदेश ह।<br>देहयुक्तानस्थितानग्रे सुरकार्यार्थसिद्धये॥ ५० | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! देवताओंसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजीने कार्यकी सिद्धिकी कामनासे अपने सम्मुख सशरीर विद्यमान वेदोंको आदेश दिया॥ ५०॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>स्तुवन्तु परमां देवीं ब्रह्मविद्यां सनातनीम्।<br>गूढाङ्गीं च महामायां सर्वकार्यार्थसाधनीम्॥ ५१ | **ब्रह्माजी बोले—**आपलोग समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाली, पराम्बा, ब्रह्मविद्या, सनातनी तथा निगूढ़ अंगोंवाली महामायाका स्तवन कीजिये॥ ५१॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य वेदाः सर्वाङ्गसुन्दराः।<br>तुष्टुवुर्ज्ञानगम्यां तां महामायां जगत्स्थिताम्॥ ५२ | उनका यह वचन सुनकर समस्त सुन्दर अंगोंवाले वेद जगत्की आधारस्वरूपा तथा ज्ञानगम्या उन महामायाकी स्तुति करने लगे॥ ५२॥ |
| वेदा ऊचुः<br>नमो देवि महामाये विश्वोत्पत्तिकरे शिवे।<br>निर्गुणे सर्वभूतेशि मातः शङ्करकामदे॥ ५३ | **वेदोंने कहा—**हे देवि! हे महामाये! हे विश्वोत्पत्तिकारिणि! हे शिवे! हे निर्गुणे! हे सर्वभूतेश! हे शिवकामार्थ-प्रदायिनि माता! आपको नमस्कार है॥ ५३॥ |
| त्वं भूमिः सर्वभूतानां प्राणाः प्राणवतां तथा।<br>धीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्तिः श्रद्धा मेधा धृतिः स्मृतिः॥ ५४ | आप सभी प्राणियोंको आश्रय देनेके लिये पृथ्वीस्वरूपा हैं तथा प्राणधारियोंमें<br>बुद्धि, श्री, कान्ति, क्षमा, शान्ति,<br>एवं स्मृति सब कुछ आप ही हैं। |
| ९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| त्वमुद्गीथेऽर्धमात्रासि गायत्री व्याहृतिस्तथा।<br>जया च विजया धात्री लज्जा कीर्तिः स्पृहा दया॥ ५५ | ॐकारमें अर्धमात्राके रूपमें आप ही विराजमान हैं। आप गायत्री, भूः, भुवः, स्वः आदि व्याहृति, जया, विजया, धात्री, लज्जा, कीर्ति, स्पृहा एवं दया सभी कुछ हैं॥ ५५॥ |
| त्वां संस्तुमोऽम्ब भुवनत्रयसंविधान-<br>दक्षां दयारसयुतां जननीं जनानाम्।<br>विद्यां शिवां सकललोकहितां वरेण्यां<br>वाग्बीजवासनिपुणां भवनाशकर्त्रीम्॥ ५६ | हे अम्ब! आप तीनों लोकोंके रचना-तन्त्रमें दक्ष, करुणरससे युक्त, सभी प्राणियोंकी माँ, विद्या, कल्याणी, सभी प्राणियोंकी हितसाधिका, सर्वश्रेष्ठ, वाग्बीजमन्त्रमें वास करनेमें निपुण तथा संसारका क्लेश दूर करनेवाली हैं; आपकी हम स्तुति करते हैं॥ ५६॥ |
| ब्रह्मा हरः शौरिसहस्रनेत्र-<br>वाग्वह्निसूर्या भुवनाधिनाथाः।<br>ते त्वत्कृताः सन्ति ततो न मुख्या<br>माता यतस्त्वं स्थिरजङ्गमानाम्॥ ५७ | ब्रह्मा, शंकर, विष्णु, इन्द्र, सरस्वती, अग्नि, सूर्य तथा सभी भुवनोंके स्वामी आपके द्वारा ही निर्मित किये गये हैं। अतः उनकी अपनी कोई विशेषता नहीं है; आप ही सभी चराचर जगत्की माता हैं॥ ५७॥ |
| सकलभुवनमेतत्कर्तुकामा यदा त्वं<br>सृजसि जननि देवान्विष्णुरुद्राजमुख्यान्।<br>स्थितिलयजननं तैः कारयस्येकरूपा<br>न खलु तव कथंचिद्देवि संसारलेशः॥ ५८ | हे जननि! जब आप जगत्की रचनाकी कामना करती हैं, तब आप सर्वप्रथम ब्रह्मा, विष्णु, महेश—इन प्रमुख देवोंका सृजन करती हैं। उन्हींके माध्यमसे एकमात्र आप ही जगत्का सृजन, पालन एवं संहारकार्य पूर्ण कराती हैं। हे देवि! आपमें संसारका लेशमात्र भी नहीं रहता॥ ५८॥ |
| न ते रूपं वेत्तुं सकलभुवने कोऽपि निपुणो<br>न नाम्नां संख्यां ते कथितुमिह योग्योऽस्ति पुरुषः।<br>यदल्पं कीलालं कलयितुमशक्तः स तु नरः<br>कथं पारावाराकलनचतुरः स्यादृतमतिः॥ ५९ | हे देवि! सम्पूर्ण संसारमें ऐसा कोई भी निपुण प्राणी नहीं है, जो आपके रूपको जान सके और न तो ऐसा कोई योग्य मनुष्य है, जो आपके नामोंकी संख्याकी गणना करनेमें समर्थ हो। जो थोड़ेसे जलका सन्तरण करनेमें असमर्थ हो, वह बुद्धिसम्पन्न मनुष्य भला महासागरको पार करनेमें कुशल कैसे होगा?॥ ५९॥ |
| न देवानां मध्ये भगवति तवानन्तविभवं<br>विजानात्येकोऽपि त्वमिह भुवनैकासि जननी।<br>कथं मिथ्या विश्वं सकलमपि चैका रचयसि<br>प्रमाणं त्वेतस्मिन्निगमवचनं देवि विहितम्॥ ६० | हे भगवति! आपके अन्तहीन वैभवको जान सकनेमें देवताओंमें कोई भी समर्थ नहीं है। एकमात्र आप समस्त विश्वकी माता हैं। आप अकेले ही इस सम्पूर्ण मिथ्या जगत्की रचना कैसे करती हैं? हे देवि! एकमात्र वेदवाक्य ही आपके इस सृष्टि-कार्यकी प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं॥ ६०॥ |
| निरीहैवासि त्वं निखिलजगतां कारणमहो<br>चरित्रं ते चित्रं भगवति मनो नो व्यथयति।<br>कथंकारं वाच्यः सकलनिगमागोचरगुण-<br>प्रभावः स्वं यस्मात्स्वयमपि न जानासि परमम्॥ ६१ | हे भगवति! समग्र जगत्की परम कारणस्वरूपा होती हुई भी आप इच्छारहित हैं। अहो! आपका अद्भुत चरित्र हमारे मनको विस्मित कर देता है। समस्त वेदोंसे भी अज्ञेय आपके गुणों एवं प्रभावोंका वर्णन हमलोग भला किस प्रकार कर सकते हैं; क्योंकि स्वयं आप भी अपने परमतत्त्वको नहीं जानतीं॥ ६१॥ |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ९१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न किं जानासि त्वं जननि मधुजिन्मौलिपतनं<br>शिवे किं वा ज्ञात्वा विविदिषसि शक्तिं मधुजितः।<br>हरेः किं वा मातर्दुरितततिरेषा बलवती<br>भवत्याः पादाब्जे भजननिपुणे क्वास्ति दुरितम्॥ ६२ | हे जननि! क्या आप भगवान् विष्णुके शिरोच्छेदनकी घटना नहीं जानती हैं? हे शिवे! अथवा क्या यह जानकर भी आप मधुजित् विष्णुकी शक्तिकी परीक्षा करना चाहती हैं? हे माता! अथवा क्या यह विष्णुके महान् पापसमूहका फल है? किंतु आपके चरणकमलोंका भजन करनेमें निपुण प्राणीसे तो पाप हो ही नहीं सकता॥ ६२॥ |
| उपेक्षा किं चेयं तव सुरसमूहेऽतिविषमा<br>हरेर्मूर्ध्नो नाशो मतमिह महाश्चर्यजनकम्।<br>महद्दुःखं मातस्त्वमसि जननच्छेदकुशला<br>न जानीमो मौलेर्विघटनविलम्बः कथमभूत्॥ ६३ | हे माता! आप इस देवसमूहकी भारी उपेक्षा क्यों कर रही हैं? भगवान् विष्णुके मस्तक कटनेकी घटना हमारे लिये अत्यन्त आश्चर्यजनक तथा महान् कष्टदायक बात है। हे माता! आप जननरूपी दुःखका नाश करनेमें कुशल हैं, अब हम यह नहीं जान पा रहे हैं कि विष्णुके सिर-संयोजनमें विलम्ब क्यों हो रहा है?॥ ६३॥ |
| ज्ञात्वा दोषं सकलसुरतापादितं देवि चित्ते<br>किं वा विष्णावमरजनितं दुष्कृतं पातितं ते।<br>विष्णोर्वा किं समरजनितः कोऽपि गर्वोऽतिवेगा-<br>च्छेत्तुं मातस्तव विलसितं नैव विद्मोऽत्र भावम्॥ ६४ | हे देवि! सभी देवताओंके देवताभिमानरूपी दोषको अपने मनमें समझकर आपने ही ऐसा किया है, अथवा देवजन्य दुष्कृतको विष्णुमें स्थापित किया है, अथवा विष्णुको संग्राम-विजय करनेका अहंकार हो गया था, जिसे अतिशीघ्र दूर करनेके लिये आपने यह लीला रची है। हे माता! हम आपके मनोभावोंको समझनेमें पूर्णतया असमर्थ हैं॥ ६४॥ |
| किं वा दैत्यैः समरविजितैस्तीर्थदेशे सुरम्ये<br>घोरं तप्त्वा भगवति वरं लब्धवद्भिर्भवत्याः।<br>अन्तर्धानं गमितमधुना विष्णुशीर्षं भवानि<br>द्रष्टुं किं वा विगतशिरसं वासुदेवं विनोदः॥ ६५ | हे भगवति! अथवा युद्धमें पराभूत किये गये दैत्योंने किसी मनोहर तीर्थमें घोर तपस्या करके आपसे वरदान प्राप्त कर लिया है, जो विष्णुके सिर कटनेका कारण बना। हे भवानि! अथवा विष्णुको सिरविहीनरूपमें देखनेके लिये आप इस समय कोई विनोद कर रही हैं॥ ६५॥ |
| सिन्धोः पुत्र्यां रोषिता किं त्वमाद्ये<br> कस्मादेनां प्रेक्षसे नाथहीनाम्।<br>क्षन्तव्यस्ते स्वांशजातापराधो<br> व्युत्थाप्यैनं मोदितां मां कुरुष्व॥ ६६ | हे आद्ये! आप सिंधुसुता लक्ष्मीपर किसी कारणसे आक्रोशित तो नहीं हैं। आप उन्हें स्वामीविहीन किसलिये देखना चाह रही हैं? आप अपने ही अंशसे प्रादुर्भूत लक्ष्मीका अपराध क्षमा करें और भगवान् विष्णुको जीवनदान देकर रमाको प्रसन्न कर दें॥ ६६॥ |
| एते सुरास्त्वां सततं नमन्ति<br> कार्येषु मुख्याः प्रथितप्रभावाः।<br>शोकार्णवात्तारय देवि देवा-<br> नुत्थाप्य देवं सकलाधिनाथम्॥ ६७ | जगत्के समस्त कार्योंको सम्पादित करनेमें प्रमुख भूमिकावाले अतिशय प्रभावशाली ये देवता आपको निरन्तर नमस्कार करते हैं। हे देवि! सर्वलोकाधिपति विष्णुको जीवित करके आप देवताओंको शोकसागरसे पार कीजिये॥ ६७॥ |
| ९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| मूर्धा गतः क्वाम्ब हरेर्न विद्मो<br>नान्योऽस्त्युपायः खलु जीवनेऽद्य।<br>यथा सुधा जीवनकर्मदक्षा<br>तथा जगज्जीवितदासि देवि ॥ ६८ | हे अम्ब! भगवान् विष्णुका सिर छिन्न होकर कहाँ चला गया—यह हम नहीं जानते हैं और इस समय इन्हें जीवित करनेके लिये अन्य कोई युक्ति भी नहीं सूझ रही है। हे देवि! मृत प्राणीको जीवित करनेमें जिस प्रकार अमृत समर्थ है, उसी प्रकार समग्र संसारकी आप जीवनदात्री हैं॥ ६८॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी गुणातीता महेश्वरी।<br>प्रसन्ना परमा माया वेदैः साङ्गैश्च सामगैः ॥ ६९ | सूतजी बोले—हे मुनियो! इस प्रकार सामगान-निपुण सांगवेदोंद्वारा स्तुति किये जानेसे गुणातीता, महेश्वरी, परात्परा महामाया भगवती प्रसन्न हो गयीं॥ ६९॥ | | तानुवाच तदा वाणी चाकाशस्थाशरीरिणी।<br>देवान्प्रति सुखैः शब्दैर्जनानन्दकरी शुभा ॥ ७० | उसी समय देवताओंको सुख प्रदान करनेवाले शब्दोंसे युक्त और भक्तजनोंको आनन्दित करनेवाली आकाशस्थित अशरीरिणी शुभ वाणीने उनसे कहा॥ ७०॥ | | मा कुरुध्वं सुराश्चिन्तां स्वस्थास्तिष्ठन्तु चामराः।<br>स्तुताहं निगमैः कामं सन्तुष्टास्मि न संशयः ॥ ७१ | हे देवताओ! आप लोग किसी प्रकारकी चिन्ता न करें और स्वस्थचित्त रहें। हे अमरगण! इन वेदोंके भावपूर्ण स्तवनसे मैं परम प्रसन्न हो गयी हूँ, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है॥ ७१॥ | | यः पुमान्मानुषे लोके स्तौत्येतां मामकीं स्तुतिम्।<br>पठिष्यति सदा भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ७२ | मनुष्यलोकमें जो प्राणी इस स्तुतिसे मेरी आराधना करेगा अथवा भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी॥ ७२॥ | | शृणोति वा स्तोत्रमिदं मदीयं<br>भक्त्या त्रिकालं सततं नरो यः।<br>विमुक्तदुःखः स भवेत्सुखी च<br>वेदोक्तमेतन्ननु वेदतुल्यम् ॥ ७३ | जो मनुष्य त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) मेरी स्तुतिको नित्य भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह सभी दुःखोंसे विमुक्त होकर परम सुखी हो जायगा। वेदोंद्वारा उच्चारित किये जानेके कारण यह स्तुति वेदोंके समान ही है॥ ७३॥ | | शृण्वन्तु कारणं चाद्य यद्गतं वदनं हरेः।<br>अकारणं कथं कार्यं संसारेऽत्र भविष्यति ॥ ७४ | हे देवो! अब आप विष्णुके शिरोच्छेदका कारण सुनिये; क्योंकि इस लोकमें बिना कारण कोई कार्य कैसे हो सकता है?॥ ७४॥ | | उदधेस्तनयां विष्णुः संस्थितामन्तिके प्रियाम्।<br>जहास वदनं वीक्ष्य तस्यास्तत्र मनोरमम् ॥ ७५ | एक बार अपने समीप बैठी हुई अपनी प्रियतमा सागरपुत्री लक्ष्मीका चित्ताकर्षक मुख देखकर भगवान् विष्णु हँस पड़े॥ ७५॥ | | तया ज्ञातं हरिनूनं कथं मां हसति प्रभुः।<br>विरूपं हरिणा दृष्टं मुखं मे केन हेतुना ॥ ७६<br><br>विनापि कारणेनाद्य कथं हास्यस्य सम्भवः।<br>सपत्नीव कृता तेन मन्येऽन्या वरवर्णिनी ॥ ७७ | उन्होंने सोचा कि भगवान् विष्णु मुझे देखकर क्यों हँस पड़े? मेरे मुखमें विष्णुजीद्वारा दोष देखे जानेका आखिर क्या कारण हो सकता है? और फिर बिना किसी कारणके उनका हँसना सम्भव नहीं हो सकता। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने किसी अन्य सुन्दर स्त्रीको मेरी सौत बना लिया है॥ ७६-७७॥ |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ९३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः कोपयुता जाता महालक्ष्मी तमोगुणा।<br>तामसी तु तदा शक्तिस्तस्या देहे समाविशत्॥ ७८ | इसी विचार-मन्थनके परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी कोपाविष्ट हो गयीं और तब उनके शरीरमें तमोगुणसम्पन्न तामसी शक्ति व्याप्त हो गयी॥ ७८॥ |
| केनचित्कालयोगेन देवकार्यार्थसिद्धये।<br>प्रविष्टा तामसी शक्तिस्तस्या देहेऽतिदारुणा॥ ७९ | तदनन्तर किसी दैवयोगके प्रभावसे देवताओंके कार्य-साधनके उद्देश्यसे ही उनके शरीरमें अत्यन्त उग्र तामसी शक्ति प्रविष्ट हुई॥ ७९॥ |
| तामस्याविष्टदेहा सा चुकोपातिशयं तदा।<br>शनकैः समुवाचेदमिदं पततु ते शिरः॥ ८० | तब लक्ष्मीजीके शरीरमें तामसी शक्तिका समावेश हो जानेके कारण वे अत्यन्त क्रोधित हो उठीं और उन्होंने मन्द स्वरमें यह कहा—'तुम्हारा यह सिर कटकर गिर जाय'॥ ८०॥ |
| स्त्रीस्वभावाच्च भावित्वात्कालयोगाद्विनिर्गतः।<br>अविचार्य तदा दत्तः शापः स्वसुखनाशनः॥ ८१<br><br>सपत्नीसम्भवं दुःखं वैधव्यादधिकं त्विति।<br>विचिन्त्य मनसेत्युक्तं तामसीशक्तियोगतः॥ ८२ | स्त्रीस्वभावके कारण, भावीवश तथा संयोगसे बिना सोचे-समझे ही लक्ष्मीजीने अपने ही सुखको विनष्ट करनेवाला शाप दे दिया। सौतके व्यवहारादिसे उत्पन्न होनेवाला दुःख वैधव्यसे भी बढ़कर होता है। मनमें ऐसा सोचकर तथा शरीरपर तामसी शक्तिका प्रभाव रहनेके कारण उन्होंने ऐसा कह दिया था॥ ८१-८२॥ |
| अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता।<br>अशौचं निर्दयत्वं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥ ८३ | मिथ्याचरण, साहस, माया, मूर्खता, अतिलोभ, अपवित्रता तथा दयाहीनता—ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं॥ ८३॥ |
| सशीर्षं वासुदेवं तं करोम्यद्य यथा पुरा।<br>शिरोऽस्य शापयोगेन निमग्नं लवणाम्बुधौ॥ ८४ | अब मैं उन वासुदेवको पूर्वकी भाँति सिरयुक्त कर देती हूँ। इनका सिर पूर्वशापके कारण लवणसागरमें डूब गया है॥ ८४॥ |
| अन्यच्च कारणं किञ्चिद्वर्त्तते सुरसत्तमाः।<br>भवतां च महत्कार्यं भविष्यति न संशयः॥ ८५ | हे श्रेष्ठ देवताओ! इस घटनाके होनेमें एक अन्य भी कारण है। आपलोगोंका महान् कार्य अवश्य सिद्ध होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ ८५॥ |
| पुरा दैत्यो महाबाहुर्हयग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>तपश्चक्रे सरस्वत्यास्तीरे परमदारुणम्॥ ८६ | प्राचीन कालमें महाबाहु एवं अति प्रसिद्ध हयग्रीव नामवाला एक दानव था, जो सरस्वतीनदीके तटपर बहुत कठोर तपस्या करने लगा॥ ८६॥ |
| जपनेकाक्षरं मन्त्रं मायाबीजात्मकं मम।<br>निराहारो जितात्मा च सर्वभोगविवर्जितः॥ ८७ | वह दैत्य आहारका त्यागकर समस्त इन्द्रियोंको वशमें करके तथा सभी प्रकारके भोगैश्वर्यसे दूर रहते हुए मेरे मायाबीजात्मक एकाक्षर मन्त्र (ह्रीं)-का जप करता रहा॥ ८७॥ |
| ध्यायन्मां तामसीं शक्तिं सर्वभूषणभूषिताम्।<br>एवं वर्षसहस्रं च तपश्चक्रेऽतिदारुणम्॥ ८८ | इस प्रकार समस्त आभूषणोंसे विभूषित मेरी तामसी शक्तिका सतत ध्यान करता हुआ वह एक हजार वर्षोंतक कठोर तप करता रहा॥ ८८॥ |
| ९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| तदाहं तामसं रूपं कृत्वा तत्र समागता।<br>दर्शने पुरतस्तस्य ध्यातं तत्तेन यादृशम्॥ ८९ | उस समय उस दैत्यने जिस रूपमें मेरा ध्यान किया था, उसी तामसरूपमें उसे दर्शन देनेहेतु उसके समक्ष मैं प्रकट हुई॥ ८९॥ |
| सिंहोपरि स्थिता तत्र तमवोचं दयान्विता।<br>वरं ब्रूहि महाभाग ददामि तव सुव्रत॥ ९० | उस समय सिंहपर आरूढ़ हुई मैंने दयापूर्वक उससे कहा—हे महाभाग! तुम वरदान माँगो; हे सुव्रत! मैं तुम्हें यथेच्छ वरदान दूँगी॥ ९०॥ |
| इति श्रुत्वा वचो देव्या दानवः प्रेमपूरितः।<br>प्रदक्षिणां प्रणामं च चकार त्वरितस्तदा॥ ९१<br><br>दृष्ट्वा रूपं मदीयं स प्रेमोत्फुल्लविलोचनः।<br>हर्षाश्रूपूर्णनयनस्तुष्टाव स च मां तदा॥ ९२ | वह दानव देवीका यह वचन सुनकर प्रेमविह्वल हो उठा और उसने तत्काल प्रणाम और प्रदक्षिणा की। मेरा रूप देखते ही प्रेमभावनाके कारण प्रफुल्लित नेत्रोंवाला तथा हर्षातिरेकके कारण अश्रुपूरित नयनोंवाला वह दानव मेरी स्तुति करने लगा॥ ९१-९२॥ |
| हयग्रीव उवाच<br>नमो देव्यै महामाये सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि।<br>भक्तानुग्रहचतुरे कामदे मोक्षदे शिवे॥ ९३ | **हयग्रीव बोला—**हे महामाये! हे जगत्का सृजन-पालन-संहार करनेवाली! हे भक्तोंपर कृपा करनेमें निपुण! हे सकल कामनाप्रदायिनि! हे मोक्षदायिनि! हे शिवे! आप देवीको नमस्कार है॥ ९३॥ |
| धराम्बुतेजःपवनखपञ्चानां च कारणम्।<br>त्वं गन्धरसरूपाणां कारणं स्पर्शशब्दयोः॥ ९४ | पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश—इन पाँच महाभूतोंका कारण आप ही हैं तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—इन तत्त्वोंका कारण भी आप ही हैं॥ ९४॥ |
| घ्राणं च रसना चक्षुस्त्वक्श्रोत्रमिन्द्रियाणि च।<br>कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि त्वत्तः सर्वं महेश्वरि॥ ९५ | हे महेश्वरि! नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान—ये ज्ञानेन्द्रियाँ तथा हाथ, पैर, वाक्, लिंग, गुदा—ये कर्मेन्द्रियाँ आपसे ही उत्पन्न हैं॥ ९५॥ |
| देव्युवाच<br>किं तेऽभीष्टं वरं ब्रूहि वाञ्छितं यद्ददामि तत्।<br>परितुष्टास्मि भक्त्या ते तपसा चाद्भुतेन च॥ ९६ | **देवी बोलीं—**तुम्हारा क्या अभीष्ट है? जो कुछ भी तुम्हारा अभिलषित वर हो, माँग लो। मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी; क्योंकि मैं तुम्हारी अनन्य भक्ति तथा अद्भुत तपस्यासे अतिशय प्रसन्न हूँ॥ ९६॥ |
| हयग्रीव उवाच<br>यथा मे मरणं मातर्न भवेत्तत्तथा कुरु।<br>भवेयममरो योगी तथाजेयः सुरासुरैः॥ ९७ | **हयग्रीव बोला—**हे माता! आप मुझे वैसा वरदान दें, जिससे मेरी मृत्यु कभी न हो और देव-दानवोंद्वारा अपराजेय रहता हुआ मैं सदाके लिये अमर योगी हो जाऊँ॥ ९७॥ |
| देव्युवाच<br>जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>मर्यादा चेदृशी लोके भवेच्च कथमन्यथा॥ ९८ | **देवी बोलीं—**जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है और मरनेवालेका जन्म भी निश्चित है। लोकमें स्थापित इस प्रकारकी मर्यादाका उल्लंघन कैसे सम्भव है?॥ ९८॥ |
| एवं त्वं निश्चयं कृत्वा मरणे राक्षसोत्तम।<br>वरं वरय चेष्टं ते विचार्य मनसा किल॥ ९९ | अतएव हे दानवश्रेष्ठ! मृत्युको अवश्यम्भावी जानकर अपने मनमें सम्यक् विचार करके तुम अन्य यथेच्छ वर माँग लो॥ ९९॥ |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ९५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हयग्रीव उवाच<br>हयग्रीवाच्च मे मृत्युर्नान्यस्माज्जगदम्बिके।<br>इति मे वाञ्छितं कामं पूरयस्व मनोगतम्॥ १०० | हयग्रीव बोला—हे जगदम्बे! मेरी मृत्यु हयग्रीवसे ही हो, किसी अन्यसे नहीं। मेरी इसी मनोवांछित कामनाको आप पूर्ण करें॥ १००॥ |
| देव्युवाच<br>गृहं गच्छ महाभाग कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>हयग्रीवादृते मृत्युर्न ते नूनं भविष्यति॥ १०१ | देवी बोलीं—हे महाभाग! अपने घर जाकर अब तुम सुखपूर्वक राज्य करो। हयग्रीवके अतिरिक्त अन्य किसीसे भी तुम्हारी कदापि मृत्यु नहीं होगी॥ १०१॥ |
| इति दत्त्वा वरं तस्मा अन्तर्धानं गता तथा।<br>मुदं परमिकां प्राप्य सोऽपि स्वभवनं गतः॥ १०२ | उस दैत्यको यह वरदान देकर मैं अन्तर्धान हो गयी और वह भी परम प्रसन्न होकर अपने घर लौट गया॥ १०२॥ |
| स पीडयति दुष्टात्मा मुनीन् वेदांश्च सर्वशः।<br>न कोऽपि विद्यते तस्य हन्ताद्य भुवनत्रये॥ १०३ | वह दुष्टात्मा इस समय मुनिजनों तथा वेदोंको हर प्रकारसे पीड़ित कर रहा है और तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा नहीं है, जो उसका संहार कर सके॥ १०३॥ |
| तस्माच्छीर्षं हयस्यास्य समुद्धृत्य मनोहरम्।<br>देहेऽत्र विशिरोविष्णोस्त्वष्टा संयोजयिष्यति॥ १०४ | अतः त्वष्टा इस अश्वका मनोहर सिर अलग करके उसे इन सिरविहीन विष्णुके धड़पर संयोजित कर देंगे॥ १०४॥ |
| हयग्रीवोऽथ भगवान्हनिष्यति तमासुरम्।<br>पापिष्ठं दानवं क्रूरं देवानां हितकाम्यया॥ १०५ | तत्पश्चात् देवताओंके कल्याणार्थ भगवान् हयग्रीव उस पापात्मा, अत्यन्त क्रूर तथा दानवी स्वभाववाले महा असुर हयग्रीवका संहार करेंगे॥ १०५॥ |
| सूत उवाच<br>एवं सुरांस्तदाभाष्य शर्वाणी विरराम ह।<br>देवास्तदातिसन्तुष्टास्तमूचुर्देवशिल्पिनम् ॥ १०६ | सूतजी बोले—देवताओंसे इस प्रकार कहकर भगवती शान्त हो गयीं और इसके बाद देवगण परम सन्तुष्ट होकर देवशिल्पी विश्वकर्मासे बोले॥ १०६॥ |
| देवा ऊचुः<br>कुरु कार्यं सुराणां वै विष्णोः शीर्षाभियोजनम्।<br>दानवप्रवरं दैत्यं हयग्रीवो हनिष्यति॥ १०७ | देवताओंने कहा—आप विष्णुके धड़पर घोड़ेका सिर जोड़कर देवताओंका कार्य कीजिये। वे भगवान् हयग्रीव ही दानवश्रेष्ठ दैत्यका वध करेंगे॥ १०७॥ |
| सूत उवाच<br>इति श्रुत्वा वचस्तेषां त्वष्टा चातित्वरान्वितः।<br>वाजिशीर्षं चकत्ताशु खड्गेन सुरसन्निधौ॥ १०८<br>विष्णोः शरीरे तेनाशु योजितं वाजिमस्तकम्।<br>हयग्रीवो हरिर्जातो महामायाप्रसादतः॥ १०९ | सूतजी बोले—देवताओंका यह वचन सुनकर विश्वकर्माने अतिशीघ्रतापूर्वक अपने खड्गसे देवताओंके सामने ही घोड़ेका सिर काटा। तत्पश्चात् उन्होंने घोड़ेका वह सिर अविलम्ब विष्णुभगवान्के शरीरमें संयोजित कर दिया और इस प्रकार महामाया भगवतीकी कृपासे वे भगवान् विष्णु हयग्रीव हो गये॥ १०८-१०९॥ |
| कियता तेन कालेन दानवो मददर्पितः।<br>निहतस्तरसा संख्ये देवानां रिपुरोजसा॥ ११० | कुछ समय बाद उन भगवान् हयग्रीवने अहंकारके मदमें चूर उस देवशत्रु दानवका युद्धभूमिमें अपने तेजसे वध कर दिया॥ ११०॥ |
| य इदं शुभमाख्यानं शृण्वन्ति भुवि मानवाः।<br>सर्वदुःखविनिर्मुक्तास्ते भवन्ति न संशयः॥ १११ | इस संसारमें जो प्राणी इस पवित्र कथाका श्रवण करते हैं, वे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है॥ १११॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे हयग्रीवावतारकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
| ९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| महामायाचरित्रञ्च पवित्रं पापनाशनम्।<br><br>पठतां शृण्वतां चैव सर्वसम्पत्तिकारकम्॥ ११२ | महामाया भगवतीका चरित्र अति पावन है तथा पापोंका नाश कर देता है। इस चरित्रका पाठ तथा श्रवण करनेवाले प्राणियोंको सभी प्रकारकी सम्पदाएँ अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं॥ ११२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे हयग्रीवावतारकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
शेषशायी भगवान् विष्णुके कर्णमलसे मधु-कैटभकी उत्पत्ति तथा उन दोनोंका ब्रह्माजीसे युद्धके लिये तत्पर होना
| ऋषय ऊचुः<br>सौम्य यच्च त्वया प्रोक्तं शौरेर्युद्धं महार्णवे।<br>मधुकैटभयोः सार्धं पञ्चवर्षसहस्रकम्॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सौम्य! आपने मधु और कैटभके साथ भगवान् विष्णुद्वारा महासिन्धुमें पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध किये जानेकी पहले चर्चा की थी॥ १॥ |
| कस्मात्तौ दानवौ जातौ तस्मिन्नेकार्णवे जले।<br>महावीर्यौ दुराधर्षौ देवैरपि सुदुर्जयौ॥ २ | महावीर्यसम्पन्न, किसीसे भी पराभूत न होनेवाले तथा देवताओंसे भी अपराजेय वे दोनों दानव उस एकार्णवके जलमें किससे प्रादुर्भूत हुए?॥ २॥ |
| कथं तावसुरौ जातौ कथं च हरिणा हतौ।<br>तदाचक्ष्व महाप्राज्ञ चरितं परमाद्भुतम्॥ ३ | वे असुर क्यों उत्पन्न हुए तथा भगवान्के द्वारा उनका वध क्यों किया गया? हे महामते! आप यह परम अद्भुत आख्यान हमको सुनाइये॥ ३॥ |
| श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वं वक्ता च बहुश्रुतः।<br>दैवाच्चात्रैव संजातः संयोगश्च तथावयोः॥ ४ | हमलोग यह कथा सुननेको इच्छुक हैं और आप अति प्रसिद्ध वक्ता हैं। हमारा और आपका यह सम्पर्क दैवयोगसे ही हुआ है॥ ४॥ |
| मूर्खेण सह संयोगो विषादपि सुदुर्ज्जरः।<br>विज्ञेन सह संयोगः सुधारससमः स्मृतः॥ ५ | मूर्खके साथ स्थापित किया गया सम्पर्क विषसे भी अधिक अनिष्टकर होता है और इसके विपरीत विद्वानोंका सम्पर्क पीयूषरसके तुल्य माना गया है॥ ५॥ |
| जीवन्ति पशवः सर्वे खादन्ति मेहयन्ति च।<br>जानन्ति विषयाकारं व्यवायसुखमद्भुतम्॥ ६<br><br>न तेषां सदसज्ज्ञानं विवेको न च मोक्षदः।<br>पशुभिस्ते समा ज्ञेया येषां न श्रवणादरः॥ ७ | पशु भी जीवनयापन करते हैं, वे भी आहार ग्रहण करते हैं, मल-मूत्रादिका विसर्जन करते हैं और विषयासक्त होकर इन्द्रियजन्य सुखकी अनुभूति करते हैं; किंतु उनमें अच्छे-बुरेका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता तथा वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले विवेकसे भी रहित होते हैं। अतएव उत्तम बातोंको सुननेमें जो लोग श्रद्धा-भाव नहीं रखते, उन्हें पशु-तुल्य ही समझना चाहिये॥ ६-७॥ |