देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ७९
| या निर्गुणा हरिहरादिभिरप्यलभ्या<br>विद्या सतां प्रियतमाथ समाधिगम्या।<br>सा तस्य चित्तकुहरे प्रकरोति भावं<br>यः संशृणोति सततं तु सतीपुराणम्॥ ४१ | जो प्राणी इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणको प्रतिदिन प्रेमसे सुनता है, उसके हृदयरूपी गुहामें विष्णु, शिव आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ, सर्वश्रेष्ठ विद्यारूपिणी, सज्जनोंकी एकमात्र प्रिया, गुणातीता एवं समाधिद्वारा जाननेयोग्य वे भगवती निवास करने लगती हैं ॥ ४१ ॥ | | सम्प्राप्य मानुषभवं सकलाङ्गयुक्तं<br>पोतं भवार्णवजलोत्तरणाय कामम्।<br>सम्प्राप्य वाचकमहो न शृणोति मूढः<br>स वञ्चितोऽत्र विधिना सुखदं पुराणम्॥ ४२ | अतः सर्वांगसुन्दर इस मानव-तनको पाकर संसार-सागरके अगाध सलिलसे पार होनेके लिये जलयानके समान परम सुखदायी श्रीमद्देवीभागवतपुराण एवं उसके वक्ताको प्राप्त करके भी जो मूर्ख इसका श्रवण नहीं करता, वह विधाताके द्वारा वंचित ही कहा जायगा ॥ ४२ ॥ | | यः प्राप्य कर्णयुगलं पटुमानुषत्वे<br>रागी शृणोति सततं च परापवादान्।<br>सर्वार्थदं रसनिधिं विमलं पुराणं<br>नष्टः कुतो न शृणुते भुवि मन्दबुद्धिः॥ ४३ | इस दुर्लभ मनुष्य देहमें दोनों कानोंको प्राप्त करके भी जो सांसारिक मनुष्य केवल दूसरोंके दुर्गुणोंको ही सुना करता है, वह अधम मन्दबुद्धि चारों उत्तम पदार्थोंको देनेवाले तथा सब रसोंसे परिपूर्ण इस निर्मल पुराणको भूतलपर क्यों नहीं सुनता ? ॥ ४३ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुराणवर्णन-पूर्वकतत्तद्युगीयव्यासवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
नारदजीद्वारा व्यासजीको देवीकी महिमा बताना
| ऋषय ऊचुः<br>सौम्य व्यासस्य भार्यायां कस्यां जातः सुतः शुकः।<br>कथं वा कीदृशो येन पठितेयं सुसंहिता॥ १ | ऋषिगण बोले—हे सौम्य ! महर्षि व्यासकी किस पत्नीसे शुकदेवजी उत्पन्न हुए ? उनका जन्म किस प्रकार हुआ और किस प्रकारसे उन्होंने इस संहिताका सम्यक् अध्ययन कर लिया ? ॥ १ ॥ | | अयोनिजस्त्वया प्रोक्तस्तथा चारणिजः शुकः।<br>सन्देहोऽस्ति महांस्तत्र कथयाद्य महामते॥ २ | आपके द्वारा ही वे अयोनिज कहे गये हैं तो फिर अरणीसे उनकी उत्पत्ति कैसे हुई ? हे महामते ! इसमें हमें महान् संशय हो रहा है, आप उसका समाधान करें ॥ २ ॥ | | गर्भयोगी श्रुतः पूर्वं शुको नाम महातपाः।<br>कथं च पठितं तेन पुराणं बहुविस्तरम्॥ ३ | हमलोगोंने पहले ही सुना है कि महातपस्वी शुकदेवजी गर्भयोगी थे। ऐसी स्थितिमें उन्होंने इतने विस्तृत पुराण (श्रीमद्देवीभागवत)-का अध्ययन कैसे कर लिया ? ॥ ३ ॥ | | सूत उवाच<br>पुरा सरस्वतीतीरे व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>आश्रमे कलविंकौ तु दृष्ट्वा विस्मयमागतः॥ ४ | सूतजी बोले—प्राचीन कालमें एक समय सत्यवतीके पुत्र व्यासजी सरस्वतीनदीके किनारे अपने आश्रममें गौरैया पक्षीका जोड़ा देखकर आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४ ॥ |