भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४

जातंमात्रं शिशुं नीडे मुक्तमण्डान्मनोहरम्।<br>ताम्रास्यं शुभसर्वाङ्गं पिच्छांकुरविवर्जितम्॥ ५<br>तौ तु भक्ष्यार्थमत्यन्तं रतौ श्रमपरायणौ।<br>शिशोश्चंचुपुटे भक्ष्यं क्षिपन्तौ च पुनः पुनः॥ ६<br>अङ्गेनाङ्गानि बालस्य घर्षयन्तौ मुदान्वितौ।<br>चुम्बन्तौ च मुखं प्रेम्णा कलविंकौ शिशोः शुभम्॥ ७अण्डेसे तत्काल पैदा हुए लाल मुखवाले, सुन्दर अंगोंवाले एवं पंखरहित शिशुको घोंसलेमें ही छोड़कर वे दोनों उड़ गये और अत्यन्त परिश्रमसे चारा लाकर उस शिशुके चोंचमें डालते हुए दोनों पक्षी अत्यन्त आह्लादयुक्त होकर उस शिशुके अंगोंको अपने अंगोंसे रगड़ते हुए प्रेमपूर्वक उसके सुन्दर मुखको चूम रहे थे॥५-७॥
वीक्ष्य प्रेमाद्भुतं तत्र बाले चटकयोस्तदा।<br>व्यासश्चिन्तातुरः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ ८<br>तिरश्चामपि यत्प्रेम पुत्रे समभिलक्ष्यते।<br>किं चित्रं यन्मनुष्याणां सेवाफलमभीप्सताम्॥ ९<br>किमेतौ चटकौ चास्य विवाहं सुखसाधनम्।<br>विरच्य सुखिनौ स्यातां दृष्ट्वा वध्वा मुखं शुभम्॥ १०<br>अथवा वार्धके प्राप्ते परिचर्यां करिष्यति।<br>पुत्रः परमधर्म्मिष्ठः पुण्यार्थं कलविंकयोः॥ ११<br>अर्जयित्वाथवा द्रव्यं पितरौ तर्पयिष्यति।<br>अथवा प्रेतकार्याणि करिष्यति यथाविधि॥ १२<br>अथवा किं गयाश्राद्धं गत्वा संवितरिष्यति।<br>नीलोत्सर्गं च विधिवत्प्रकरिष्यति बालकः॥ १३व्यासजी उस शिशुमें उन दोनों पक्षियोंका ऐसा अद्भुत प्रेम देखकर चिन्तामें पड़ गये और मन-ही-मन सोचने लगे। यदि अपने पुत्रके प्रति पक्षियोंमें ऐसा प्रेम दिखायी दे रहा है तो अपनी सेवाका फल चाहनेवाले मनुष्योंमें ऐसा प्रेम-व्यवहार होनेमें आश्चर्य ही क्या! क्या ये दोनों पक्षी इसका सुख-साधनस्वरूप विवाह करके स्वयं सुखी रहते हुए इसकी वधूका सुन्दर मुख देख पायेंगे? क्या इनकी वृद्धावस्थामें यह धर्मनिष्ठ पुत्र पुण्य-प्राप्तिके लिये इन दोनोंकी सेवा करेगा? धन आदि अर्जित करके क्या यह अपने माता-पिताको सन्तुष्ट रखेगा और इनकी मृत्युके उपरान्त क्या इनका विधि-पूर्वक प्रेतकर्म करेगा? अथवा क्या गयातीर्थ जाकर यह बालक उनके श्राद्ध आदि कर्म करके उनका उद्धार करेगा तथा उनके परलोकसाधनहेतु क्या यह विधिपूर्वक नीलोत्सर्ग (नील वृषभ छोड़नेका कर्म) करेगा?॥८-१३॥
संसारेऽत्र समाख्यातं सुखानामुत्तमं सुखम्।<br>पुत्रगात्रपरिष्वंगो लालनञ्च विशेषतः॥ १४पुत्रके शरीरका आलिंगन और विशेषरूपसे उसका लालन-पालन इस संसारमें सभी सुखोंमें उत्तम सुख कहा गया है॥ १४॥
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च।<br>पुत्रादन्यत्तरन्नास्ति परलोकस्य साधनम्॥ १५पुत्ररहित मनुष्यकी न तो सद्गति होती है और न तो उसे स्वर्गकी ही प्राप्ति होती है। अतः परलोकसाधनके लिये पुत्रसे बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है॥ १५॥
मन्वादिभिश्च मुनिभिर्धर्मशास्त्रेषु भाषितम्।<br>पुत्रवान्स्वर्गमाप्नोति नापुत्रस्तु कथञ्चन॥ १६मनु आदि ऋषियोंने भी धर्मशास्त्रोंमें कहा है कि पुत्रवान् मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है और पुत्रहीन व्यक्तिको स्वर्ग-प्राप्ति कभी भी नहीं होती है॥ १६॥
दृश्यतेऽत्र समक्षं तन्नानुमानेन साध्यते।<br>पुत्रवान्मुच्यते पापादाप्तवाक्यं च शाश्वतम्॥ १७इस बातमें अनुमानकी कोई आवश्यकता ही नहीं है अपितु यह प्रत्यक्षरूपमें भी देखा जाता है; साथ ही यह वेद, स्मृति आदिका भी सनातन वचन है कि पुत्रवान् मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १७॥