भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आतुरे मृत्युकालेऽपि भूमिशय्यागतो नरः।<br>करोति मनसा चिन्तां दुःखितः पुत्रवर्जितः॥ १८<br>धनं मे विपुलं गेहे पात्राणि विविधानि च।<br>मन्दिरं सुन्दरं चैतत्कोऽस्य स्वामी भविष्यति॥ १९रोगावस्था में तथा मरणकालमें भूमि-शय्यापर पड़ा हुआ सन्तानहीन प्राणी दुःखित होकर अपने मनमें विचार करता है कि मेरे घरमें पर्याप्त धन है, अनेक प्रकारके पात्र हैं तथा मेरा यह भवन भी अत्यन्त सुन्दर है; किंतु अब इन सबका स्वामी कौन होगा ? ॥ १८-१९ ॥
मृत्युकाले मनस्तस्य दुःखेन भ्रमते यतः।<br>अतोऽस्य दुर्गतिर्नूनं भ्रान्तचित्तस्य सर्वथा॥ २०चूँकि मृत्युकालमें उस प्राणीका मन अति दुःखी होकर भ्रमित होता रहता है, इसलिये उस भ्रान्त मनवाले प्राणीकी दुर्गति अवश्य ही होती है॥ २०॥
एवं बहुविधां चिन्तां कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>निःश्वस्य बहुधा चोष्णं विमनाः सम्बभूव ह॥ २१इस प्रकार अनेकानेक चिन्तन करके और बार-बार लम्बी तथा गर्म साँसें लेकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीका मन अत्यन्त खिन्न हो गया॥ २१॥
विचार्य मनसात्यर्थं कृत्वा मनसि निश्चयम्।<br>जगाम च तपस्तप्तुं मेरुपर्वतसन्निधौ॥ २२इसके बाद मनमें बहुत सोच-विचार करके अन्ततः दृढ़ निश्चय करके वे तपश्चर्याके लिये मेरुपर्वतपर चले गये॥ २२॥
मनसा चिन्तयामास कं देवं समुपास्महे।<br>वरप्रदाननिपुणं वाञ्छितार्थप्रदं तथा॥ २३<br>विष्णुं रुद्रं सुरेन्द्रं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>गणेशं कार्तिकेयं च पावकं वरुणं तथा॥ २४उन्होंने मनमें विचार किया कि मैं विष्णु, रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, कार्तिकेय, अग्नि एवं वरुण—इन देवताओंमें किस देवताकी आराधना करूँ, जो वरप्रदान करनेमें उदार तथा अभीष्ट फलोंको देनेवाला हो॥ २३-२४॥
एवं चिन्तयतस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः।<br>यदृच्छया समायातो वीणापाणिः समाहितः॥ २५इस प्रकार व्यासजी विचार कर ही रहे थे कि उसी समय संयोगवश मुनिश्रेष्ठ नारदजी हाथोंमें वीणा धारण किये हुए वहाँ आ गये॥ २५॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीतो व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>कृत्वार्घ्यमासनं दत्त्वा पप्रच्छ कुशलं मुनिम्॥ २६उन्हें देखकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अर्घ्य तथा आसन प्रदान करके उन मुनिसे कुशल-क्षेम पूछा॥ २६॥
श्रुत्वाथ कुशलप्रश्नं पप्रच्छ मुनिसत्तमः।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं द्वैपायन वदस्व मे॥ २७कुशल-प्रश्न सुन लेनेके पश्चात् मुनिवर नारदजीने पूछा—हे द्वैपायन! आप किस कारणसे चिन्ताग्रस्त हैं? मुझे बतायें॥ २७॥
व्यास उवाच<br>अपुत्रस्य गतिर्नास्ति न सुखं मानसे यतः।<br>तदर्थं दुःखितश्चाहं चिन्तयामि पुनः पुनः॥ २८व्यासजी बोले—सन्तानहीन व्यक्तिकी सद्गति नहीं होती और कभी भी उसके मनमें सुखानुभूति नहीं होती है। इसी बातको लेकर मैं अत्यन्त दुःखित हूँ और बार-बार यही सोचता रहता हूँ॥ २८॥
तपसा तोषयाम्यद्य कं देवं वाञ्छितार्थदम्।<br>इति चिन्तातुरोऽस्म्यद्य त्वामहं शरणं गतः॥ २९मैं अभिलषित फल देनेवाले किस देवताको अपनी तपःसाधनासे प्रसन्न करूँ, इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं [अब इसके समाधानहेतु] आपकी शरणमें हूँ॥ २९॥