भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| अ० ४ ] | प्रथम स्कन्ध | ८३ | | :--- | :--- |

| सूर्यो भ्रमति चाकाशे वायुर्वाति शुभाशुभः।<br>अग्निस्तपति पर्जन्यो वर्षतीश त्वदाज्ञया॥ ४१ | हे ईश! आपकी आज्ञासे ही सूर्य आकाशमें [नियमित रूपसे] भ्रमण करता है, शुभ तथा अशुभ हवा चलती है, अग्नि ताप धारण करती है और मेघ वृष्टि करता है॥ ४१॥ | | त्वं तु ध्यायसि कं देवं संशयोऽयं महान्मम।<br>त्वत्तः परं न पश्यामि देवं वै भुवनत्रये॥ ४२ | आप किस देवताका ध्यान कर रहे हैं? यह मेरी महती शंका है। मैं तो तीनों लोकोंमें आपसे बढ़कर अन्य किसी देवताको नहीं जानता हूँ॥ ४२॥ | | कृपां कृत्वा वदस्वाद्य भक्तोऽस्मि तव सुव्रत।<br>महतां नैव गोप्यं हि प्रायः किञ्चिदिति स्मृतिः॥ ४३ | हे सुव्रत! मैं आपका भक्त हूँ, अतः कृपा करके [अपनी तपस्याका रहस्य] बताइये; क्योंकि यह सर्वविदित है कि महान् लोग अपने भक्तोंसे कुछ भी गोपनीय नहीं रखते हैं॥ ४३॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरिराह प्रजापतिम्।<br>शृणुष्वैकमना ब्रह्मंस्त्वां ब्रवीमि मनोगतम्॥ ४४ | ब्रह्माजीका वचन सुनकर भगवान् विष्णु उनसे बोले—हे ब्रह्मन्! आपको अपने मनकी बात बताता हूँ, आप उसे एकाग्रचित्त होकर सुनें॥ ४४॥ | | यद्यपि त्वां शिवं मां च स्थितिसृष्ट्यन्तकारणम्।<br>ते जानन्ति जनाः सर्वे सदेवासुरमानुषाः॥ ४५<br><br>स्रष्टा त्वं पालकश्चाहं हरः संहारकारकः।<br>कृताः शक्त्येति संतर्कः क्रियते वेदपारगैः॥ ४६ | यद्यपि सभी देव, दानव और मानव यही जानते हैं कि आप जगत्‌की रचना, मैं जगत्‌के पालन और शिवजी जगत्‌के संहारके परम कारण हैं तथापि वेद-तत्त्वज्ञ विद्वान् यह तर्कना करते हैं कि किसी शक्तिके द्वारा ही आप सृष्टिके कर्ता हैं, मैं भर्ता हूँ और शंकरजी हर्ता हैं॥ ४५-४६॥ | | जगत्संजनने शक्तिस्त्वयि तिष्ठति राजसी।<br>सात्त्विकी मयि रुद्रे च तामसी परिकीर्तिता॥ ४७ | जगत्‌की रचनाके लिये आपमें राजसी शक्ति विद्यमान है, मुझमें सात्त्विकी शक्ति स्थित है तथा शिवजीमें तामसी शक्ति बतायी गयी है॥ ४७॥ | | तया विरहितस्त्वं न तत्कर्मकरणे प्रभुः।<br>नाहं पालयितुं शक्तः संहर्तुं नापि शङ्करः॥ ४८ | उस शक्तिके न रहनेपर आप न तो सृष्टि-रचना कर सकते हैं, न मैं पालन-कार्य करनेमें समर्थ हो सकता हूँ और न तो शंकर संहार कर सकते हैं॥ ४८॥ | | तदधीना वयं सर्वे वर्तामः सततं विभो।<br>प्रत्यक्षे च परोक्षे च दृष्टान्तं शृणु सुव्रत॥ ४९ | हे विभो! हम सभी निरन्तर उसी शक्तिके अधीन रहते हैं। हे सुव्रत! अब प्रत्यक्ष तथा परोक्षसे सम्बन्धित दृष्टान्त भी आप सुनिये॥ ४९॥ | | शेषे स्वपिमि पर्यङ्के परतन्त्रो न संशयः।<br>तदधीनः सदोत्तिष्ठे काले कालवशं गतः॥ ५० | इसमें कोई संशय नहीं कि मैं परतन्त्र होकर शेष-शय्यापर शयन करता हूँ और उसी शक्तिके अधीन होकर समयपर कालका वशवर्ती होकर मैं शयनसे उठता हूँ॥ ५०॥ | | तपश्चरामि सततं तदधीनोऽस्म्यहं सदा।<br>कदाचित्सह लक्ष्म्या च विहरामि यथासुखम्॥ ५१<br><br>कदाचिद्दानवैः सार्धं संग्रामं प्रकरोम्यहम्।<br>दारुणं देहदमनं सर्वलोकभयङ्करम्॥ ५२ | उसी शक्तिका अवलम्बन प्राप्तकर मैं सदा तपश्चरण करता रहता हूँ। मैं कभी लक्ष्मीके साथ सुखपूर्वक विहार करता हूँ और कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण, शरीरको चूर्ण कर देनेवाला तथा लोगोंको भयभीत कर देनेवाला युद्ध भी करता हूँ॥ ५१-५२॥ |