देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| तदा कालेन कियता देवाः सर्वे सवासवाः।<br>ब्रह्मेशसहिताः सर्वे यज्ञं कर्तुं समुद्यताः॥ ९<br><br>गताः सर्वेऽथ वैकुण्ठं द्रष्टुं देवं जनार्दनम्।<br>देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं मखानाधिपं प्रभुम्॥ १० | कुछ समय बीतनेके बाद ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्रसहित सभी देवता यज्ञ करनेको उद्यत हुए। वे सब देवकार्यकी सिद्धिहेतु यज्ञोंके अधिपति जनार्दन भगवान् विष्णुके दर्शनार्थ वैकुण्ठलोक गये॥ ९-१०॥ |
| अदृष्ट्वा तं तदा तत्र ज्ञानदृष्ट्या विलोक्य ते।<br>यत्रास्ते भगवान् विष्णुर्जग्मुस्तत्र तदा सुराः॥ ११ | उस समय उन्हें वहाँ न देखकर वे देवतागण ज्ञान-दृष्टिसे देख करके वहाँ पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णु विराजमान थे॥ ११॥ |
| ददृशुस्ते तदेशानं योगनिद्रावशं गतम्।<br>विचेतनं विभुं विष्णुं तत्रासांचक्रिरे सुराः॥ १२ | वहाँ उन्होंने सर्वव्यापी भगवान् विष्णुको योग-निद्राके वशीभूत होकर अचेत पड़ा हुआ देखा। तब वे देवगण वहीं रुक गये॥ १२॥ |
| स्थितेषु सर्वदेवेषु निद्रासुप्ते जगत्पतौ।<br>चिन्तामापुः सुराः सर्वे ब्रह्मरुद्रपुरोगमाः॥ १३ | सभी देवताओंके वहाँ रुक जानेके बाद जगत्पति विष्णुको निद्रामग्न देखकर ब्रह्मा-रुद्र आदि प्रमुख देवता अत्यन्त चिन्तित हुए॥ १३॥ |
| तानुवाच ततः शक्रः किं कर्तव्यं सुरोत्तमाः।<br>निद्राभङ्गः कथं कार्यश्चिन्तयन्तु सुरोत्तमाः॥ १४ | तदनन्तर इन्द्रने देवताओंसे कहा—हे श्रेष्ठ देवगण! अब क्या किया जाय? हे श्रेष्ठ देवताओ! अब आप सभी यह विचार करें कि इनकी निद्रा किस प्रकार भंग की जाय?॥ १४॥ |
| तमुवाच तदा शम्भुर्निद्राभङ्गेऽस्ति दूषणम्।<br>कार्यं चैव प्रकर्तव्यं यज्ञस्य सुरसत्तमाः॥ १५ | तब शिवजीने इन्द्रसे कहा कि इनकी निद्राका भंग करनेसे महान् दोष लगेगा, किंतु हे श्रेष्ठ देवगण! यज्ञकार्य भी अवश्यकरणीय है॥ १५॥ |
| उत्पादिता तदा वम्री ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>तया भक्षयितुं तत्र धनुषोऽग्रं धरास्थितम्॥ १६ | इसके बाद परमेष्ठी ब्रह्माजीने पृथ्वीपर स्थित धनुषके अग्रभागको खा जानेके लिये दीमकका सृजन किया॥ १६॥ |
| भक्षितेऽग्रे तदा निम्नं गमिष्यति शरासनम्।<br>तदा निद्राविमुक्तोऽसौ देवदेवो भविष्यति॥ १७<br><br>देवकार्यं तदा सर्वं भविष्यति न संशयः।<br>स वम्रीं संदिदेशाथ देवदेवः सनातनः॥ १८ | [उन्होंने यह सोचा कि] दीमकके द्वारा धनुषका अग्रभाग खा लिये जानेपर धनुष नीचा हो जायगा। तब वे देवाधिदेव विष्णु निद्रामुक्त हो जायेंगे। ऐसा होनेपर निस्संदेह देवताओंका सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जायगा। अतः सनातन ब्रह्माजीने दीमकको इस कार्यके लिये आदेश दिया॥ १७-१८॥ |
| तमुवाच तदा वम्री देवदेवस्य मापतेः।<br>निद्राभङ्गः कथं कार्यो देवस्य जगतां गुरोः॥ १९<br><br>निद्राभङ्गः कथाच्छेदो दम्पत्योः प्रीतिभेदनम्।<br>शिशुमातृविभेदश्च ब्रह्महत्यासमं स्मृतम्॥ २० | तब दीमकने ब्रह्माजीसे कहा कि देवाधिदेव जगद्गुरु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका निद्रा-भंग मैं कैसे करूँ? क्योंकि नींदमें बाधा डालना, कथामें विघ्न पैदा करना, पति-पत्नीके बीच भेद उत्पन्न करना एवं माँ-पुत्रके बीच वैरभाव पैदा करनेके लिये षड्यन्त्र |