भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 94
अ० ५ ]प्रथम स्कन्ध८५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेन चाप्यहमुक्तोऽस्मि तथैव मुनिपुङ्गव।<br>तस्मात्त्वमपि कल्याण पुरुषार्थाप्तिहेतवे॥ ६३<br><br>असंशयं हृदम्भोजे भज देवीपदाम्बुजम्।<br>सर्वं दास्यति सा देवी यद्यदिष्टं भवेत्तव॥ ६४ब्रह्माजीने वे सब बातें मुझसे कही थीं। अतः आप भी कल्याणकारी पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे सर्वथा संशयरहित होकर अपने हृदयकमलमें देवी भगवतीके चरणारविन्दका ध्यान कीजिये। वे देवी आपके समस्त अभिलषित फलोंको अवश्य प्रदान करेंगी॥ ६२-६४॥
सूत उवाच<br>नारदेनैवमुक्तस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>देवीपादाब्जनिष्ठातस्तपसे प्रययौ गिरौ॥ ६५सूतजी बोले—नारदजीके ऐसा कहनेपर सत्यवतीपुत्र व्यासजी देवीके चरणारविन्दमें अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए तपश्चर्याहेतु पर्वतपर चले गये॥ ६५॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे देवीसर्वोत्तमतेकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥


अथ पञ्चमोऽध्यायः

भगवती लक्ष्मीके शापसे विष्णुका मस्तक कट जाना, वेदोंद्वारा स्तुति करनेपर देवीका प्रसन्न होना, भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी कथा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>सूतास्माकं मनः कामं मग्नं संशयसागरे।<br>यथोक्तं महदाश्चर्यं जगद्विस्मयकारकम्॥ १<br><br>यन्मूर्धा माधवस्यापि गतो देहात्पुनः परम्।<br>हयग्रीवस्ततो जातः सर्वकर्ता जनार्दनः॥ २ऋषिगण बोले—हे सूतजी! हमारा चित्त सन्देहरूपी सागरमें पूर्णतः डूबता जा रहा है; क्योंकि आपने महान् आश्चर्यजनक तथा संसारको विस्मित कर देनेवाली यह बात कह दी कि विष्णुके शरीरसे उनका सिर अलग हो गया था और वे सर्वपालक जनार्दन पुनः हयग्रीव हो गये थे॥ १-२॥
वेदोऽपि स्तौति यं देवं देवाः सर्वे यदाश्रयाः।<br>आदिदेवो जगन्नाथः सर्वकारणकारणः॥ ३<br><br>तस्यापि वदनं छिन्नं दैवयोगात्कथं तदा।<br>तत्सर्वं कथयाशु त्वं विस्तरेण महामते॥ ४वेद भी जिन भगवान् विष्णुका स्तवन करते हैं, समस्त देवता जिनका आश्रय ग्रहण करते हैं, जो आदिदेव हैं, जगत्के स्वामी हैं और सभी कारणोंके भी कारण हैं; दैवयोगसे उनका भी मस्तक कैसे कट गया? हे महामते! वह सब आप हमसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये॥ ३-४॥
सूत उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सावधानाः समन्ततः।<br>चरितं देवदेवस्य विष्णोः परमतेजसः॥ ५सूतजी बोले—हे मुनियो! आप सभी लोग एकाग्रचित्त होकर परम तेजस्वी देवाधिदेव भगवान् विष्णुका चरित्र सुनिये॥ ५॥
कदाचिद्दारुणं युद्धं कृत्वा देवः सनातनः।<br>दशवर्षसहस्राणि परिश्रान्तो जनार्दनः॥ ६किसी समय वे सनातन देव विष्णु दस हजार वर्षोंतक भीषण युद्ध करके अत्यन्त थक गये थे॥ ६॥
समे देशे शुभे स्थाने कृत्वा पद्मासनं विभुः।<br>अवलम्ब्य धनुः सज्यं कण्ठदेशे धरास्थितम्॥ ७<br><br>दत्त्वा भारं धनुष्कोट्यां निद्रामप रमापतिः।<br>श्रान्तत्वादैवयोगाच्च जातस्तत्रातिनिद्रितः॥ ८तदनन्तर एक समतल तथा शुभ स्थानपर पद्मासन लगाकर पृथ्वीपर स्थित प्रत्यंचा चढ़े हुए धनुषपर कण्ठप्रदेश (गर्दन) टिकाये हुए उस धनुषकी नोंकपर भार देकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु सो गये और थकावटके कारण दैवयोगसे उन्हें गहरी नींद आ गयी॥ ७-८॥