देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ३ ] प्रथम स्कन्ध ७७
| श्लोक | अर्थ |
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| अल्पायुषोऽल्पबुद्धींश्च विप्रान् ज्ञात्वा कलावथ।<br>पुराणसंहितां पुण्यां कुरुतेऽसौ युगे युगे॥ २० | विशेषकर कलियुगमें ब्राह्मणोंको अल्पायु एवं अल्पबुद्धि जानकर वे युग-युगमें पवित्र पुराण-संहिताओंका निर्माण करते हैं॥ २०॥ |
| स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां न वेदश्रवणं मतम्।<br>तेषामेव हितार्थाय पुराणानि कृतानि च॥ २१ | स्त्रियों, शूद्रों तथा भ्रष्ट द्विजातियोंको वेद-श्रवणका अधिकार नहीं है, इसलिये उनके कल्याणके लिये व्यासजीने पुराणोंकी रचना की है॥ २१॥ |
| मन्वन्तरे सप्तमेऽत्र शुभे वैवस्वताभिधे।<br>अष्टाविंशतिमे प्राप्ते द्वापरे मुनिसत्तमाः॥ २२<br>व्यासः सत्यवतीसूनुर्गुरुर्मे धर्मवित्तमः।<br>एकोनत्रिंशत्संप्राप्ते द्रौणिर्व्यासो भविष्यति॥ २३<br>अतीतास्तु तथा व्यासाः सप्तविंशतिरेव च।<br>पुराणसंहितास्तैस्तु कथितास्तु युगे युगे॥ २४ | हे श्रेष्ठ मुनिगण! इस वैवस्वत नामक शुभ सातवें मन्वन्तरके अट्ठाइसवें द्वापरयुगमें परम धर्मनिष्ठ सत्यवतीपुत्र मेरे गुरु श्रीव्यासजी हुए और उनतीसवें द्वापरमें द्रौणि नामके व्यास होंगे। इनके पूर्व भी सत्ताईस व्यास हो चुके हैं, जिन्होंने प्रत्येक युगमें अनेक पुराण-संहिताएँ रची हैं॥ २२–२४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>ब्रूहि सूत महाभाग व्यासाः पूर्वयुगोद्भवाः।<br>वक्तारस्तु पुराणानां द्वापरे द्वापरे युगे॥ २५ | ऋषियोंने कहा— हे महाभाग सूतजी! अब आप पूर्वकालमें प्रत्येक द्वापरयुगमें अवतीर्ण हुए पुराणवक्ता व्यासोंकी कथा कहिये॥ २५॥ |
| सूत उवाच<br>द्वापरे प्रथमे व्यस्ताः स्वयं वेदाः स्वयम्भुवा।<br>प्रजापतिर्द्वितीये तु द्वापरे व्यासकार्यकृत्॥ २६<br>तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे तु बृहस्पतिः।<br>पञ्चमे सविता व्यासः षष्ठे मृत्युस्तथापरे॥ २७ | सूतजी बोले— सृष्टिके बाद सर्वप्रथम द्वापरयुगमें स्वयं ब्रह्माजीने ही 'व्यास' के रूपमें प्रकट होकर वेदोंका विभाजन किया। दूसरे द्वापरमें 'प्रजापति' व्यास बने, तीसरे द्वापरमें 'शुक्राचार्य', चौथे द्वापरमें 'बृहस्पति', पाँचवेंमें 'सूर्य' तथा छठेमें 'यमराज' ही साक्षात् व्यास बने थे॥ २६–२७॥ |
| मघवा सप्तमे प्राप्ते वसिष्ठस्त्वष्टमे स्मृतः।<br>सारस्वतस्तु नवमे त्रिधामा दशमे तथा॥ २८ | सातवें द्वापरमें 'इन्द्र', आठवेंमें 'वसिष्ठमुनि', नवेंमें 'सारस्वत' और दसवें द्वापरमें 'त्रिधामाजी' व्यास हुए॥ २८॥ |
| एकादशेऽथ त्रिवृषो भरद्वाजस्ततः परम्।<br>त्रयोदशे चान्तरिक्षो धर्मश्चापि चतुर्दशे॥ २९ | ग्यारहवेंमें 'त्रिवृष', बारहवेंमें 'भरद्वाजमुनि', तेरहवेंमें 'अन्तरिक्ष' और चौदहवें द्वापरमें 'धर्मराज' स्वयं व्यास बने॥ २९॥ |
| त्रय्यारुणिः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>मेधातिथिः सप्तदशे व्रती ह्यष्टादशे तथा॥ ३० | पन्द्रहवें द्वापरमें 'त्रय्यारुणि', सोलहवेंमें 'धनंजय', सत्रहवेंमें 'मेधातिथि' तथा अठारहवें द्वापरमें 'व्रतीमुनि' व्यास हुए॥ ३०॥ |
| अत्रिरेकोनविंशेऽथ गौतमस्तु ततः परम्।<br>उत्तमश्चैकविंशेऽथ हर्यात्मा परिकीर्तितः॥ ३१ | उन्नीसवेंमें 'अत्रि', बीसवेंमें 'गौतम' और इक्कीसवें द्वापरमें हर्यात्मा 'उत्तम' नामक व्यास कहे गये हैं॥ ३१॥ |
| वेनो वाजश्रवाश्चैव सोमोऽमुष्यायणस्तथा।<br>तृणबिन्दुस्तथा व्यासो भार्गवस्तु ततः परम्॥ ३२ | बाईसवेंमें 'वाजश्रवा वेन', तेईसवेंमें 'आमुष्यायण सोम', चौबीसवेंमें 'तृणविन्दु' तथा पचीसवें द्वापरमें 'भार्गव' व्यास हुए॥ ३२॥ |