भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 85
७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चतुर्दशसहस्रं च मत्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम्।<br>तथा ग्रहसहस्रं तु मार्कण्डेयं महाद्भुतम्॥ ३<br>चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च।<br>भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४उनमें आदिके मत्स्यपुराणमें चौदह हजार, अत्यन्त अद्भुत मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा भविष्यपुराणमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक-संख्या तत्त्वदर्शी मुनियोंने बतायी है॥ ३-४॥
अष्टादशसहस्रं वै पुण्यं भागवतं किल।<br>तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्रह्मसंज्ञकम्॥ ५<br>द्वादशैव सहस्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम्।<br>तथाष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च॥ ६पवित्र भागवतपुराणमें अठारह हजार और ब्रह्म-पुराणमें दस हजार श्लोक हैं। ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार एक सौ तथा ब्रह्मवैवर्तपुराणमें अठारह हजार श्लोक हैं॥ ५-६॥
अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च।<br>चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्राणि तु शौनक॥ ७<br>त्रयोविंशतिसाहस्रं वैष्णवं परमाद्भुतम्।<br>चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं परमाद्भुतम्॥ ८<br>षोडशैव सहस्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञितम्।<br>पञ्चविंशतिसाहस्रं नारदं परमं मतम्॥ ९हे शौनक! वामनपुराणमें दस हजार तथा वायुपुराणमें चौबीस हजार छः सौ श्लोक हैं। उस परम विचित्र विष्णुपुराणमें तेईस हजार, वाराहपुराणमें चौबीस हजार, अग्निपुराणमें सोलह हजार तथा नारद-पुराणमें पचीस हजार श्लोक कहे गये हैं॥ ७-९॥
पञ्चपञ्चाशतसाहस्रं पाद्माख्यं विपुलं मतम्।<br>एकादशसहस्राणि लैङ्गाख्यं चातिविस्तृतम्॥ १०<br>एकोनविंशत्साहस्रं गारुडं हरिभाषितम्।<br>सप्तदशसहस्रं च पुराणं कूर्मभाषितम्॥ ११विशाल पद्मपुराणमें पचपन हजार और लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। इसी प्रकार साक्षात् भगवान्‌के द्वारा कहे हुए गरुडपुराणमें उन्नीस हजार तथा कूर्मपुराणमें सत्रह हजार श्लोक हैं॥ १०-११॥
एकाशीतिसहस्राणि स्कान्दाख्यं परमाद्भुतम्।<br>पुराणाख्या च संख्या च विस्तरेण मयानघाः॥ १२परम विचित्र स्कन्दपुराणमें इक्यासी हजार श्लोक कहे गये हैं। हे पापरहित मुनियो! इस प्रकार मैंने पुराणों तथा उनके श्लोकोंकी संख्या विस्तारपूर्वक बता दी॥ १२॥
तथैवोपपुराणानि शृण्वन्तु ऋषिसत्तमाः।<br>सनत्कुमारं प्रथमं नारसिंहं ततः परम्॥ १३<br>नारदीयं शिवं चैव दौर्वाससमनुत्तमम्।<br>कापिलं मानवं चैव तथा चौशनसं स्मृतम्॥ १४<br>वारुणं कालिकाख्यं च साम्बं नन्दिकृतं शुभम्।<br>सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तरम्॥ १५<br>माहेश्वरं भागवतं वासिष्ठं च सविस्तरम्।<br>एतान्युपपुराणानि कथितानि महात्मभिः॥ १६हे मुनिवरो! अब उपपुराणोंकी भी संख्या सुनिये। उनमें सर्वप्रथम उपपुराण सनत्कुमार है, तत्पश्चात् नरसिंह, नारदीय, शिव, दुर्वासा, कपिल, मनु, उशना, वरुण, कालिका, साम्ब, नन्दी, सौर, पराशर, आदित्य, माहेश्वर, भागवत तथा अठारहवाँ वासिष्ठ—ये सब उपपुराण महात्माओं‌द्वारा बताये गये हैं॥ १३-१६॥
अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम्॥ १७सत्यवतीतनय वेदव्यासजीने अठारह पुराणोंकी रचना करनेके बाद उन्हीं विषयोंसे विस्तारपूर्वक उस अतुलनीय 'महाभारत' का प्रणयन किया॥ १७॥
मन्वन्तरेषु सर्वेषु द्वापरे द्वापरे युगे।<br>प्रादुःकरोति धर्मार्थी पुराणानि यथाविधि॥ १८<br>द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपेण सर्वदा।<br>वेदमेकं स बहुधा कुरुते हितकाम्यया॥ १९प्रत्येक द्वापरयुगमें भगवान् वेदव्यासजी ही धर्मरक्षार्थ पुराणोंकी यथाविधि रचना करते रहते हैं। जब-जब द्वापरयुग आता है, तब-तब साक्षात् भगवान् विष्णु ही व्यासजीके रूपमें अवतीर्ण होकर सर्वलोकहितार्थ वेदके अनेक भेदोपभेद करते हैं॥ १८-१९॥