भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84
अ० ३ ]प्रथम स्कन्ध७५
संस्कृतहिन्दी
त्वं सूत भव दीर्घायुस्तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य पुराणं हि पुण्यं भागवतं शिवम्॥ ३७<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां वर्णनं विधिपूर्वकम्।<br>विद्यां प्राप्य तया मोक्षः कथितो मुनिना किल॥ ३८अतः हे सूतजी! आप चिरंजीवी हों तथा तीनों प्रकारके तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से मुक्त रहकर अब हमलोगोंको परम पवित्र तथा कल्याणकारी श्रीमद्देवी-भागवतपुराण सुनाइये; जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विधिवत् वर्णन किया गया है। महर्षि व्यासने भी बताया है कि इसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करके पुनः उससे मुक्ति मिलती है॥ ३७-३८॥
द्वैपायनेन मुनिना कथितं यच्च पावनम्।<br>न तृप्यामो वयं सूत कथां श्रुत्वा मनोरमाम्॥ ३९हे सूतजी! महर्षि वेदव्यासने जिस पवित्र पुराणको कहा है, उसके मनोहर कथा-चरित्रोंको सुननेसे हमारी कभी तृप्ति नहीं होती है॥ ३९॥
सकलगुणगणानामेकपात्रं पवित्र-<br>मखिलभुवनमातुर्नाट्यवद्यद्विचित्रम् ।<br>निखिलमलगणानां नाशकत्कामदं<br>प्रकटय भगवत्या नामयुक्तं पुराणम्॥ ४०सभी गुणोंका एकमात्र स्थान, परम पवित्र, समस्त संसारकी जननी भगवतीके लीलानाट्यके समान विचित्र, सभी पापसमूहोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले तथा भगवतीके नामसे समन्वित श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणको प्रकट कीजिये॥ ४०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

सूतजीद्वारा पुराणोंके नाम तथा उनकी श्लोकसंख्याका कथन, उपपुराणों तथा प्रत्येक द्वापरयुगके व्यासोंका नाम

संस्कृतहिन्दी
सूत उवाच<br>शृण्वन्तु सम्प्रवक्ष्यामि पुराणानि मुनीश्वराः।<br>यथाश्रुतानि तत्त्वेन व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ १सूतजी बोले—हे मुनीश्वरवृन्द! सत्यवती-सुत वेद-व्यासजीसे मैंने जिस प्रकार तत्त्वपूर्वक पुराणोंको सुना है, उसे मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये॥ १॥
मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।<br>अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्॥ २उनमें दो ‘म’ वाले (मत्स्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण), दो ‘भ’ वाले (भविष्यपुराण तथा भागवत), तीन ‘ब्र’ वाले (ब्रह्म, ब्रह्माण्ड और ब्रह्मवैवर्तपुराण), चार ‘व’ वाले (वामन, विष्णु, वायु और वाराहपुराण), ‘अ’ वाला (अग्निपुराण), ‘ना’ वाला (नारदपुराण), ‘प’ वाला (पद्मपुराण), ‘लिं’ वाला (लिंगपुराण), ‘ग’ वाला (गरुडपुराण), ‘कू’ वाला (कूर्मपुराण), ‘स्क’ वाला (स्कन्दपुराण)—ये पृथक्-पृथक् (अठारह) पुराण हैं॥ २॥