भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 889 में से

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अ० २१] तृतीय स्कन्ध ३५१

न मे सैन्यबलं तादृङ्न दुर्गबलमद्भुतम्।<br>येनाहं नृपतीन्सर्वान् प्रत्यादेष्टुमिहोत्सहे॥ ४मेरे पास न तो वैसा सैन्यबल है और न तो सुरक्षार्थ अद्भुत किला ही है, जिससे मैं इस समय उन सभीको पराजित कर सकूँ॥ ४॥
सुदर्शनस्तथैकाकी ह्यसहायोऽधनः शिशुः।<br>किं कर्तव्यं निमग्नोऽहं सर्वथा दुःखसागरे॥ ५यह बालक सुदर्शन भी निस्सहाय, निर्धन तथा अकेला है। मैं तो हर तरहसे दुःखसागरमें डूब चुका हूँ। अब मुझे इस समय क्या करना चाहिये?॥ ५॥
इति चिन्तापरो राजा जगाम नृपसन्निधौ।<br>प्रणम्य तानुवाचाथ प्रश्रयावनतो नृपः॥ ६इस प्रकार चिन्ताकुल राजा सुबाहु राजाओंके पास गये और उन सबको प्रणाम करके अत्यन्त विनीतभावसे उन्होंने कहा—हे महाराजाओ! अब मैं क्या करूँ? मेरे तथा अपनी माताके द्वारा बहुत प्रेरित किये जानेपर भी मेरी पुत्री मण्डपमें नहीं आ रही है॥ ६-७॥
किं कर्तव्यं नृपाः कामं नैति मे मण्डपे सुता।<br>बहुशः प्रेर्यमाणापि सा मात्रापि मयापि च॥ ७
मूर्ध्ना पतामि पादेषु राज्ञां दासोऽस्मि साम्प्रतम्।<br>पूजादिकं गृहीत्वाद्य व्रजन्तु सदनानि वः॥ ८मैं आपलोगोंका दास हूँ और सभी राजाओंके चरणोंपर अपना सिर रखकर निवेदन करता हूँ कि आपलोग पूजा-सत्कार ग्रहण करके इस समय अपने-अपने घर लौट जायें॥ ८॥
ददामि बहुरत्नानि वस्त्राणि च गजान् रथान्।<br>गृहीत्वाद्य कृपां कृत्वा व्रजन्तु भवनान्युत॥ ९मैं आपलोगोंको बहुत-से रत्न, वस्त्र, हाथी तथा रथ देता हूँ। इन्हें स्वीकारकर कृपा करके आपलोग अपने-अपने भवन चले जायें॥ ९॥
न वशे मे सुता बाला यदि म्रियेत खेदिता।<br>तदा मे स्यान्महद्दुःखं तेन चिन्तातुरोऽस्म्यहम्॥ १०मेरी पुत्री मेरे वशमें नहीं है। यदि वह बेचारी खिन्न होकर मर गयी तो मुझे महान् दुःख होगा। इसीसे मैं अत्यन्त चिन्तित हूँ॥ १०॥
भवन्तः करुणावन्तो महाभाग्या महौजसः।<br>किमेतया दुहित्रा मे मन्दया दुर्विनीतया॥ ११आपलोग बड़े दयालु, भाग्यवान् तथा महान् तेजस्वी हैं तो फिर मेरी इस मन्द बुद्धिवाली अविनीत कन्यासे आपलोगोंको क्या लाभ होगा?॥ ११॥
अनुग्राह्योऽस्मि वः कामं दासोऽहमिति सर्वथा।<br>सुता सुतेव मन्तव्या भवद्भिः सर्वथा मम॥ १२मैं आपलोगोंका हर तरहसे सेवक हूँ, अतएव आपलोग मुझपर कृपा करें। आप सभी लोग मेरी इस पुत्रीको अपनी ही पुत्री समझें॥ १२॥
व्यास उवाच<br>श्रुत्वा सुबाहुवचनं नोचुः केचन भूमिपाः।<br>युधाजित्क्रोधताम्राक्षस्तमुवाच रुषान्वितः॥ १३व्यासजी बोले—[हे राजन्!] सुबाहुका वचन सुनकर अन्य राजागण तो नहीं बोले, किंतु क्रोधसे आँखें लाल करके युधाजित्ने उनसे रोषपूर्वक कहा—
राजन् मूर्खोऽसि किं ब्रूषे कृत्वा कार्यं सुनिन्दितम्।<br>स्वयंवरः कथं मोहाद्रचितः संशये सति॥ १४हे राजन्! आप तो बड़े मूर्ख हैं। ऐसा निन्दनीय कृत्य करनेके बाद भी आप कैसे इस प्रकारकी बात बोल रहे हैं? यदि संशयकी स्थिति थी तो आपने अज्ञानतावश स्वयंवरका आयोजन ही क्यों किया?॥ १३-१४॥
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