भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 359

| ३५० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ | | :--- | :--- |

नैकभावा यथा वेश्या वृथा पश्यति कामुकम्।<br>तथाहं मण्डपे गत्वा कुर्वे वारस्त्रिया कृतम्॥ ६७बिना किसी प्रयोजनके व्यर्थ ही देखती रहती है, उसी प्रकार स्वयंवर-मण्डपमें जाकर मुझे भी उसीके सदृश व्यवहार करना पड़ेगा॥ ६६-६७॥
वृद्धैरैतैः कृतं धर्मं न करिष्यामि साम्प्रतम्।<br>पत्नीव्रतं तथा कामं करिष्येऽहं धृतव्रता॥ ६८इस समय मैं अपने कुलके वृद्धजनोंद्वारा स्थापित किये गये इस स्वयंवरनियमका पालन नहीं करूँगी। मैं अपने संकल्पपर अटल रहती हुई पत्नीव्रत-धर्मका पूर्णरूपसे आचरण करूँगी॥ ६८॥
सामान्या प्रथमं गत्वा कृत्वा संकल्पितं बहु।<br>वृणोति चैकं तद्वद्वै वृणोमि कथमद्य वै॥ ६९सामान्य कन्या स्वयंवर-मण्डपमें पहुँचकर पहले अनेक संकल्प-विकल्प करनेके पश्चात् अन्ततः किसी एकका वरण कर लेती है; उसके समान मैं भी पतिका वरण क्यों करूँ?॥ ६९॥
सुदर्शनो मया पूर्वं वृतः सर्वात्मना पितः।<br>तमृते नान्यथा कर्तुमिच्छामि नृपसत्तम॥ ७०हे पिताजी! मैंने पूरे मनसे सुदर्शनका पहले ही वरण कर लिया है। हे महाराज! उस सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी अन्यको पतिके रूपमें स्वीकार नहीं कर सकती॥ ७०॥
विवाहविधिना देहि कन्यादानं शुभे दिने।<br>सुदर्शनाय नृपते यदीच्छसि शुभं मम॥ ७१हे राजन्! यदि आप मेरा हित चाहते हैं तो किसी शुभ दिनमें वैवाहिक विधि-विधानसे कन्यादान करके मुझे सुदर्शनको सौंप दीजिये॥ ७१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे स्वपितरं प्रति शशिकालावाक्यं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥


अथैकविंशोऽध्यायः

राजा सुबाहुका राजाओंसे अपनी कन्याकी इच्छा बताना, युधाजित्का क्रोधित होकर सुबाहुको फटकारना तथा अपने दौहित्रसे शशिकालाका विवाह करनेको कहना, माताद्वारा शशिकालाको पुनः समझाना, किंतु शशिकालाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
सुबाहुरपि तच्छ्रुत्वा युक्तमुक्तं तया तदा।<br>चिन्ताविष्टो बभूवाशु किं कर्तव्यमितः परम्॥ १[हे राजन्!] महाराज सुबाहु पुत्रीके द्वारा कही गयी युक्तिसंगत बातें सुनकर इस चिन्तामें पड़ गये कि अब आगे क्या किया जाय?
सङ्गताः पृथिवीपालाः ससैन्याः सपरिग्रहाः।<br>उपविष्टाश्च मञ्चेषु योद्धुकामा महाबलाः॥ २अपने-अपने सैनिकों तथा सेवकोंके साथ यहाँ आये हुए और युद्धकी इच्छावाले अनेक महाबली नरेश मंचोंपर बैठे हुए हैं॥ १-२॥
यदि ब्रवीमि तान्सर्वान्सुता नायाति साम्प्रतम्।<br>तथापि कोपसंयुक्ता हन्युर्मां दुष्टबुद्धयः॥ ३इस समय यदि मैं उन सभीसे यह कहूँ कि कन्या नहीं आ रही है, तो दुष्ट बुद्धिवाले वे राजा क्रोधित होकर मुझे मार ही डालेंगे॥ ३॥