देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 358, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 358
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४९ | | :--- | :--- |
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
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| अथ काशीपतिः प्राह सुतां स्नातां स्वलंकृताम्।<br>मधूकमालासंयुक्तां क्षौमवासोविभूषिताम्॥ ५६<br>विवाहोपस्करैर्युक्तां दिव्यां सिन्धुसुतोपमाम्।<br>चिन्तापरां सुवसनां स्मितपूर्वमिदं वचः॥ ५७ | तत्पश्चात् स्नान करके भलीभाँति अलंकृत, मधूक पुष्पकी माला धारण किये, रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, विवाहके अवसरपर धारणीय सभी पदार्थोंसे युक्त, लक्ष्मीके सदृश दिव्य स्वरूपवाली, चिन्तामग्न तथा सुन्दर वस्त्रोंवाली शशिकलासे मुसकराकर महाराज सुबाहुने यह वचन कहा— ॥ ५६-५७॥ |
| उत्तिष्ठ पुत्रि सुनसे करे धृत्वा शुभां स्रजम्।<br>व्रज मण्डपमध्येऽद्य समाजं पश्य भूभुजाम्॥ ५८ | हे सुन्दर नासिकावाली पुत्रि ! उठो और हाथमें यह सुन्दर माला लेकर मण्डपमें चलो और वहाँपर विराजमान राजाओंके समुदायको देखो ॥ ५८ ॥ |
| गुणवान् रूपसम्पन्नः कुलीनश्च नृपोत्तमः।<br>तव चित्ते वसेद्यस्तु तं वृणुष्व सुमध्यमे॥ ५९ | हे सुमध्यमे ! उन राजाओंमें जो गुणसम्पन्न, रूपवान् और उत्तम कुलमें उत्पन्न श्रेष्ठ राजा तुम्हारे मनमें बस जाय, उसका वरण कर लो ॥ ५९ ॥ |
| देशदेशाधिपाः सर्वे मञ्चेषु रचितेषु च।<br>संविष्टाः पश्य तन्वङ्गि वरयस्व यथारुचि॥ ६० | देश-देशान्तरके सभी राजागण सम्यक् रूपसे सजाये गये मंचोंपर विराजमान हैं। हे तन्वंगि ! इन्हें देखो और अपनी इच्छाके अनुसार वरण कर लो ॥ ६०॥ |
| व्यास उवाच<br>तं तथा भाषमाणं वै पितरं मितभाषिणी।<br>उवाच वचनं बाला ललितं धर्मसंयुक्तम्॥ ६१ | **व्यासजी बोले—**तब ऐसा कहते हुए अपने पितासे मितभाषिणी उस कन्या शशिकलाने लालित्यपूर्ण एवं धर्मसंगत बात कही ॥ ६१॥ |
| शशिकलोवाच<br>नाहं दृष्टिपथे राज्ञां गमिष्यामि पितः किल।<br>कामुकानां नरेशानां गच्छन्त्यन्याश्च योषितः॥ ६२ | **शशिकला बोली—**हे पिताजी! मैं इन राजाओंके सम्मुख बिलकुल नहीं जाऊँगी। ऐसे कामासक्त राजाओंके सामने अन्य प्रकारकी स्त्रियाँ ही जाती हैं ॥ ६२ ॥ |
| धर्मशास्त्रे श्रुतं तात मयेदं वचनं किल।<br>एक एव वरो नार्या निरीक्ष्यः स्यान्न चापरः॥ ६३ | हे तात ! मैंने धर्मशास्त्रोंमें यह वचन सुना है कि नारीको एक ही वरपर दृष्टि डालनी चाहिये, किसी दूसरेपर नहीं ॥ ६३ ॥ |
| सतीत्वं निर्गतं तस्या या प्रयाति बहून्नथ।<br>संकल्पयन्ति ते सर्वे दृष्ट्वा मे भवतात्त्विति॥ ६४ | जो स्त्री अनेक पुरुषोंके समक्ष उपस्थित होती है, उसका सतीत्व विनष्ट हो जाता है; क्योंकि उसे देखकर वे सभी अपने मनमें यही संकल्प कर लेते हैं कि यह स्त्री किसी तरहसे मेरी हो जाय ॥ ६४॥ |
| स्वयंवरे स्रजं धृत्वा यदागच्छति मण्डपे।<br>सामान्या सा तदा जाता कुलटेवापरा वधूः॥ ६५ | कोई स्त्री अपने हाथमें जयमाल लेकर जब स्वयंवरमण्डपमें आती है तो वह एक साधारण स्त्री हो जाती है और उस समय वह एक व्यभिचारिणी स्त्रीकी भाँति प्रतीत होती है ॥ ६५॥ |
| वारस्त्री विपणे गत्वा यथा वीक्ष्य नरान्स्थितान्।<br>गुणागुणपरिज्ञानं करोति निजमानसे॥ ६६ | जिस प्रकार एक वारांगना बाजारमें जाकर वहाँ स्थित पुरुषोंको देखकर अपने मनमें उनके गुण-दोषोंका आकलन करती है और जैसे अनेक प्रकारके चंचल भावोंसे युक्त वह वेश्या किसी कामी पुरुषको |