भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 357
३४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न तथाहं विजानामि वैरं शोकं भयं तथा।<br>निःशङ्कमिह सम्प्राप्तः समाजे भूभृतामिह॥ ४५उनकी भाँति मैं वैर, शोक तथा भयको नहीं जानता। अतः मैं राजाओंके इस समाजमें भयरहित होकर आया हुआ हूँ॥ ४५॥
एकाकी द्रष्टुकामोऽहं स्वयंवरमनुत्तमम्।<br>भविष्यति च यद्भाव्यं प्राप्तोऽस्मि चण्डिकाज्ञया॥ ४६जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा। मैं तो भगवतीके आदेशसे इस उत्कृष्ट स्वयंवरको देखनेकी अभिलाषासे यहाँ अकेला ही आया हूँ॥ ४६॥
भगवत्याः प्रमाणं मे नान्यं जानामि संयतः।<br>तत्कृतं च सुखं दुःखं भविष्यति च नान्यथा॥ ४७मैं भगवतीके वचनको ही प्रमाण मानता हूँ और उनकी आज्ञाके अधीन रहता हुआ मैं अन्य किसीको नहीं जानता। उन्होंने सुख-दुःखका जो विधान कर दिया है, वही प्राप्त होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं॥ ४७॥
युधाजित्सुखमाप्नोतु न मे वैरं नृपोत्तमाः।<br>यः करिष्यति मे वैरं स प्राप्स्यति फलं तथा॥ ४८हे श्रेष्ठ राजाओ! युधाजित् सुखी रहें। मेरे मनमें उनके प्रति वैरभाव नहीं है। जो मुझसे शत्रुता करेगा, वह उसका फल पायेगा॥ ४८॥
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इत्युक्तास्ते तथा तेन सन्तुष्टा भूभुजः स्थिताः।<br>सोऽपि स्वमाश्रमं प्राप्य सुस्थितः सम्बभूव ह॥ ४९उस सुदर्शनके इस प्रकार कहनेपर वहाँ उपस्थित सभी राजा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। वह भी अपने निवासमें आकर शान्तभावसे बैठ गया॥ ४९॥
अपरेऽह्नि शुभे काले नृपाः सम्मन्त्रिताः किल।<br>सुबाहुना नृपेणाथ रुचिरे वै स्वमण्डपे॥ ५०तदनन्तर दूसरे दिन शुभ मुहूर्तमें राजा सुबाहुने अपने भव्य मण्डपमें सभी राजाओंको बुलाया॥ ५०॥
दिव्यास्तरणयुक्तेषु मञ्चेषु रचितेषु च।<br>उपविष्टाश्च राजानः शुभालङ्करणैर्युताः॥ ५१उस मण्डपमें दिव्य आसनोंसे सुशोभित पूर्णरूपसे सजाये गये मंचोंपर मनोहारी आभूषणोंसे अलंकृत राजागण विराजमान हुए॥ ५१॥
दिव्यवेषधराः कामं विमानेष्वमरा इव।<br>दीप्यमानाः स्थितास्तत्र स्वयंवरदिदृक्षया॥ ५२स्वयंवर देखनेकी इच्छासे वहाँ मंचोंपर विराजमान वे दिव्य वेषधारी देदीप्यमान राजागण विमानपर बैठे हुए देवताओंकी भाँति प्रतीत हो रहे थे॥ ५२॥
इति चिन्तापराः सर्वे कदा साप्योगमिष्यति।<br>भाग्यवन्तं नृपश्रेष्ठं श्रुतपुण्यं वरिष्यति॥ ५३सभी राजा इस बातके लिये बहुत चिन्तित थे कि वह राजकुमारी कब आयेगी और किस पुण्यवान् तथा भाग्यशाली श्रेष्ठ नरेशका वरण करेगी?॥ ५३॥
यदा सुदर्शनं दैवात्स्रजा सम्भूषयेदिह।<br>विवादो वै नृपाणां च भविता नात्र संशयः॥ ५४संयोगवश यदि राजकुमारीने सुदर्शनके गलेमें माला डाल दी तो राजाओंमें परस्पर कलह होने लगेगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५४॥
इत्येवं चिन्त्यमानास्ते भूपा मञ्चेषु संस्थिताः।<br>वादित्रघोषः सुमहानुत्थितो नृपमण्डपे॥ ५५मंचोंपर विराजमान राजालोग ऐसा सोच ही रहे थे तभी राजा सुबाहुके भवनमें वाद्योंकी ध्वनि होने लगी॥ ५५॥
देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 357, कुल 889 में से · BharatKosha