देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 356, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 356
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४७ |
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| सुदर्शन उवाच | |
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| सत्यमुक्तं भवद्भिश्च कृपावद्भिः सुहृज्जनैः ।<br>किं ब्रवीमि पुनर्वाक्यमुक्तवा नृपतिसत्तमाः ॥ ३४ | सुदर्शन बोला— आप सब बड़े कृपालु एवं सहृदय-जनोंने सत्य ही कहा है, किंतु हे श्रेष्ठ राजागण ! अब मैं अपनी पूर्वकथित बात फिरसे क्या दोहराऊँ ! ॥ ३४ ॥ |
| न मृत्युः केनचिद्भाव्यः कस्यचिद्वा कदाचन ।<br>दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ३५ | किसीकी भी मृत्यु किसीसे भी कभी भी नहीं हो सकती; क्योंकि यह सम्पूर्ण चराचर जगत् तो दैवके अधीन है ॥ ३५ ॥ |
| स्ववशोऽयं न जीवोऽस्ति स्वकर्मवशगः सदा ।<br>तत्कर्म त्रिविधं प्रोक्तं विद्वद्भिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ३६<br><br>सञ्चितं वर्तमानञ्च प्रारब्धञ्च तृतीयकम् ।<br>कालकर्मस्वभावैश्च ततं सर्वमिदं जगत् ॥ ३७ | यह जीव भी स्वयं अपने वशमें नहीं है; यह सदा अपने कर्मके अधीन रहता है। तत्त्वदर्शी विद्वानोंने उस कर्मके तीन प्रकार बतलाये हैं— संचित, वर्तमान तथा प्रारब्ध। यह सम्पूर्ण जगत् काल, कर्म तथा स्वभावसे व्याप्त है ॥ ३६-३७ ॥ |
| न देवो मानुषं हन्तुं शक्तः कालागमं विना ।<br>हतं निमित्तमात्रेण हन्ति कालः सनातनः ॥ ३८ | बिना कालके आये देवता भी किसी मनुष्यको मारनेमें समर्थ नहीं हो सकते। किसीको भी मारनेवाला तो निमित्तमात्र होता है; वास्तविकता यह है कि सभीको अविनाशी काल ही मारता है ॥ ३८ ॥ |
| यथा पिता मे निहतः सिंहेनामित्रकर्षणः ।<br>तथा मातामहोऽप्येवं युद्धे युधाजिता हतः ॥ ३९ | जैसे शत्रुओंका शमन करनेवाले मेरे पिताको सिंहने मार डाला। वैसे ही मेरे नानाको भी युद्धमें युधाजित्ने मार डाला ॥ ३९ ॥ |
| यत्नकोटिं प्रकुर्वाणो हन्यते दैवयोगतः ।<br>जीवेद्वर्षसहस्त्राणि रक्षणेन विना नरः ॥ ४० | प्रारब्ध पूरा हो जानेपर करोड़ों प्रयत्न करनेपर भी अन्ततः मनुष्य मर ही जाता है और दैवके अनुकूल रहनेपर बिना किसी रक्षाके ही वह हजारों वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ ४० ॥ |
| नाहं बिभेमि धर्मिष्ठाः कदाचिच्च युधाजितः ।<br>दैवमेव परं मत्वा सुस्थितोऽस्मि सदा नृपाः ॥ ४१ | हे धर्मनिष्ठ राजाओ ! मैं युधाजित्से कभी नहीं डरता। मैं दैवको ही सर्वोपरि मानकर पूर्णरूपसे निश्चिन्त रहता हूँ ॥ ४१ ॥ |
| स्मरणं सततं नित्यं भगवत्याः करोम्यहम् ।<br>विश्वस्य जननी देवी कल्याणं सा करिष्यति ॥ ४२ | मैं नित्य-निरन्तर भगवतीका स्मरण करता रहता हूँ। विश्वकी जननी वे भगवती ही कल्याण करेंगी ॥ ४२ ॥ |
| पूर्वार्जितं हि भोक्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा ।<br>स्वकृतस्य च भोगेन कीदृक्शोको विजानताम् ॥ ४३ | पूर्वजन्ममें किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल प्राणीको भोगना ही पड़ता है; तो फिर अपने द्वारा किये गये कर्मका फल भोगनेमें विवेकी पुरुषोंको शोक कैसा ? ॥ ४३ ॥ |
| स्वकर्मफलयोगेन प्राप्य दुःखमचेतनः ।<br>निमित्तकारणे वैरं करोत्यल्पमतिः किल ॥ ४४ | अपने द्वारा उपार्जित कर्मफल भोगनेमें दुःख प्राप्त होनेके कारण अज्ञानी तथा अल्पबुद्धिवाला प्राणी निमित्त कारणके प्रति शत्रुता करने लगता है ॥ ४४ ॥ |