देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| यः करिष्यति शत्रुत्वं मया सह नृपात्मजाः।<br>शास्ता तस्य महाविद्या नाहं जानामि शत्रुताम्॥ २३ | हे राजकुमारो! जो कोई भी प्राणी मुझसे शत्रुता करेगा, उसे महाविद्या जगदम्बा दण्डित करेंगी; मैं तो वैर-भाव जानता ही नहीं॥ २३॥ | | यद्भावि तद्वै भविता नान्यथा नृपसत्तमाः।<br>का चिन्ता ह्यत्र कर्तव्या दैवाधीनोऽस्मि सर्वदा॥ २४ | हे श्रेष्ठ राजाओ! जो होना है, वह अवश्य ही होगा; उसके विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें क्या चिन्ता की जाय? मैं तो सदा प्रारब्धपर भरोसा करता हूँ?॥ २४॥ | | देवभूतमनुष्येषु सर्वभूतेषु सर्वदा।<br>सर्वेषां तत्कृता शक्तिर्नान्यथा नृपसत्तमाः॥ २५ | हे श्रेष्ठ राजाओ! देवताओं, दानवों, मनुष्यों तथा सभी प्राणियोंमें एकमात्र जगदम्बाकी शक्ति ही विद्यमान है। उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है॥ २५॥ | | सा यं चिकीर्षते भूपं तं करोति नृपाधिपाः।<br>निर्धनं वा नरं कामं का चिन्ता वै तदा मम॥ २६ | हे महाराजाओ! वे जिस मनुष्यको राजा बनाना चाहती हैं, उसे राजा बना देती हैं और जिसे निर्धन बनाना चाहती हैं, उसे निर्धन बना देती हैं; तब मुझे किस बातकी चिन्ता?॥ २६॥ | | तामृते परमां शक्तिं ब्रह्मविष्णुहरादयः।<br>न शक्ताः स्पन्दितुं देवाः का चिन्ता मे तदा नृपाः॥ २७ | हे राजाओ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी उन महाशक्तिके बिना हिलने-डुलनेमें भी समर्थ नहीं हैं, तब मुझे क्या चिन्ता?॥ २७॥ | | अशक्तो वा सशक्तो वा यादृशस्तादृशस्त्वहम्।<br>तदाज्ञया नृपाद्यैव सम्प्राप्तोऽस्मि स्वयंवरे॥ २८ | मैं शक्तिसम्पन्न हूँ या शक्तिहीन, जैसा भी हूँ वैसा आपके समक्ष हूँ। हे राजाओ! मैं उन्हीं भगवतीकी आज्ञासे ही इस स्वयंवरमें आया हुआ हूँ॥ २८॥ | | सा यदिच्छति तत्कुर्यान्मम किं चिन्तनेन वै।<br>नात्र शङ्का प्रकर्तव्या सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ २९ | वे भगवती जो चाहेंगीं, सो करेंगीं। मेरे सोचनेसे क्या होगा? मैं यह सत्य कह रहा हूँ, इस विषयमें शंका नहीं करनी चाहिये॥ २९॥ | | जये पराजये लज्जा न मेऽत्राण्वपि पार्थिवाः।<br>भगवत्यास्तु लज्जास्ति तदधीनोऽस्मि सर्वथा॥ ३० | हे राजाओ! जय अथवा पराजयमें मुझे अणुमात्र भी लज्जा नहीं है। लज्जा तो उन भगवतीको होगी; क्योंकि मैं तो सर्वथा उन्हींके अधीन हूँ॥ ३०॥ | | व्यास उवाच<br>इति तस्य तदाकर्ण्य वचनं राजसत्तमाः।<br>ऊचुः परस्परं प्रेक्ष्य निश्चयज्ञा नराधिपाः॥ ३१<br><br>सत्यमुक्तं त्वया साधो न मिथ्या कर्हिचिद्भवेत्।<br>तथाप्युज्जयनीनाथस्त्वां हन्तुं परिकाङ्क्षति॥ ३२<br><br>त्वत्कृतेन दयादिष्टा त्वां ब्रवीमो महामते।<br>यदुक्तं तत्त्वया कार्यं विचार्य मनसानघ॥ ३३ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उस सुदर्शनकी यह बात सुनकर सभी श्रेष्ठ राजागण उसके निश्चयको जान गये और एक-दूसरेको देखकर उन राजाओंने सुदर्शनसे कहा—हे साधो! आपने सत्य कहा है, आपका कथन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। तथापि उज्जयिनीपति महाराज युधाजित् आपको मार डालना चाहते हैं। हे महामते! हमें आपके ऊपर दया आ रही है, इसीलिये हमने आपको यह सब बता दिया। हे अनघ! अब आपको जो उचित जान पड़े, वैसा मनसे खूब सोच-समझकर कीजिये॥ ३१—३३॥ |