देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 354, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 354
| अ० २० ] | तृतीय स्कन्ध | ३४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br><br>सम्पन्नभूभुजः सर्वे समाहूय सुदर्शनम्।<br>ऊचुः समागतं शान्तमेकाकिनमतन्द्रिताः॥ १३<br><br>राजपुत्र महाभाग केनाहूतोऽसि सुव्रत।<br>एकाकी यः समायातः समाजे भूभृतामिह॥ १४ | व्यासजी बोले—तत्पश्चात् सभी वैभवशाली राजाओंने सुदर्शनको बुलवाया। उस शान्तस्वभाव सुदर्शनसे राजाओंने सावधान होकर पूछा—हे राजपुत्र! हे महाभाग! हे सुव्रत! तुम्हें यहाँ किसने बुलाया है, जो तुम इस राजसमाजमें अकेले ही चले आये हो? ॥ १३-१४॥ |
| न वै सैन्यं न सचिवा न कोशो न बृहद्बलम्।<br>किमर्थञ्च समायातस्तत्त्वं ब्रूहि महामते॥ १५ | तुम्हारे पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न अधिक बल ही है। हे महामते! तुम यहाँ किसलिये आये हो? उसे बताओ॥ १५॥ |
| युद्धकामा नृपतयो वर्तन्तेऽत्र समागमे।<br>कन्यार्थं सैन्यसम्पन्नाः किं त्वं कर्तुमिहेच्छसि॥ १६ | युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले बहुत-से राजागण इस कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छासे अपनी-अपनी सेनासहित इस समाजमें विद्यमान हैं। यहाँ तुम क्या करना चाहते हो? ॥ १६॥ |
| भ्राता ते सुबलः शूरः सम्प्राप्तोऽस्ति जिघृक्षया।<br>युधाजिच्च महाबाहुः साहाय्यं कर्तुमागतः॥ १७ | तुम्हारा शूरवीर भाई शत्रुजित् भी एक महान् सेनाके साथ राजकुमारीको प्राप्त करनेकी इच्छासे यहाँ आया हुआ है और उसकी सहायता करनेके लिये महाबाहु युधाजित् भी आये हैं॥ १७॥ |
| गच्छ वा तिष्ठ राजेन्द्र याथातथ्यमुदाहृतम्।<br>त्वयि सैन्यविहीने च यथेष्टं कुरु सुव्रत॥ १८ | हे राजेन्द्र! तुम जाओ अथवा रहो। हमने तो सारी वास्तविकता तुम्हें बतला दी; क्योंकि तुम सेना-विहीन हो। हे सुव्रत! अब तुम्हारी जो इच्छा हो, वह करो॥ १८॥ |
| सुदर्शन उवाच<br><br>न बलं न सहायो मे न कोशो दुर्गसंश्रयः।<br>न मित्राणि न सौहार्दी न नृपा रक्षका मम॥ १९ | सुदर्शन बोला—मेरे पास न सेना है, न कोई सहायक है, न खजाना है, न सुरक्षित किला है, न मित्र हैं, न सुहृद् हैं तथा न तो मेरी रक्षा करनेवाले कोई राजा ही हैं॥ १९॥ |
| अत्र स्वयंवरं श्रुत्वा द्रष्टुकाम इहागतः।<br>स्वप्ने देव्या प्रेरितोऽस्मि भगवत्या न संशयः॥ २० | यहाँपर स्वयंवर होनेका समाचार सुनकर उसे देखनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। देवी भगवतीने स्वप्नमें मुझे यहाँ आनेकी प्रेरणा दी है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥ |
| नान्यच्चिकीर्षितं मेऽद्य मामाह जगदीश्वरी।<br>तया यद्विहितं तच्च भविताद्य न संशयः॥ २१ | मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है। मुझे यहाँ आनेके लिये जगज्जननी भगवतीने आदेश दिया है। उन्होंने जो विधान रच दिया होगा, वह होकर ही रहेगा; इसमें कोई संशय नहीं है॥ २१॥ |
| न शत्रुरस्ति संसारे कोऽप्यत्र जगतीश्वराः।<br>सर्वत्र पश्यतो मेऽद्य भवानीं जगदम्बिकाम्॥ २२ | हे राजागण! इस संसारमें मेरा कोई शत्रु नहीं है। मैं सर्वत्र भवानी जगदम्बाको विराजमान देख रहा हूँ॥ २२॥ |