देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ३४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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अथ विंशोऽध्यायः
राजाओंका सुदर्शनसे स्वयंवरमें आनेका कारण पूछना और सुदर्शनका उन्हें स्वप्नमें भगवतीद्वारा दिया गया आदेश बताना, राजा सुबाहुका शशिकलाको समझाना, परंतु उसका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इतिवादिनि भूपाले केरलाधिपतौ तदा।<br>प्रत्युवाच महाभाग युधाजिदपि पार्थिवः॥ १ | हे महाभाग! तब महाराज केरल-नरेशके ऐसा कहनेपर राजा युधाजित्ने कहा— ॥ १ ॥ |
| नीतिरेषा महीपाल यद् ब्रवीति भवानिह।<br>समाजे पार्थिवानां वै सत्यवाग्विजितेन्द्रियः॥ २ | हे पृथ्विपते! आपने अभी-अभी जो कहा है, क्या यही नीति है? राजाओंके समाजमें आप तो सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय माने जाते हैं॥ २॥ |
| योग्येषु वर्तमानेषु कन्यारत्नं कुलोद्वह।<br>अयोग्योऽर्हति भूपाल न्यायोऽयं तव रोचते॥ ३ | हे कुलोद्वह! हे राजन्! योग्य राजाओंके रहते हुए एक अयोग्य व्यक्ति कन्यारत्नको प्राप्त कर ले, क्या यही न्याय आपको अच्छा लगता है?॥ ३॥ |
| भागं सिंहस्य गोमायुर्भोंक्तुमर्हति वा कथम्।<br>तथा सुदर्शनोऽयं वै कन्यारत्नं किमर्हति॥ ४ | एक सियार सिंहके भागको खानेका अधिकारी कैसे हो सकता है? उसी प्रकार क्या यह सुदर्शन इस कन्यारत्नको पानेकी योग्यता रखता है?॥ ४॥ |
| बलं वेदो हि विप्राणां भूभुजां चापजं बलम्।<br>किमन्याय्यं महाराज ब्रवीम्यहमिहाधुना॥ ५ | ब्राह्मणोंका बल वेद है और राजाओंका बल धनुष। हे महाराज! क्या मैं इस समय अन्यायपूर्ण बात कह रहा हूँ?॥ ५॥ |
| बलं शुल्कं यथा राज्ञां विवाहे परिकीर्तितम्।<br>बलवानेव गृह्णातु नाबलस्तु कदाचन॥ ६ | राजाओंके विवाहमें बलको ही शुल्क कहा गया है। यहाँ जो भी बलशाली हो, वह कन्यारत्नको प्राप्त कर ले; बलहीन इसे कदापि नहीं पा सकता॥ ६॥ |
| तस्मात्कन्यापणं कृत्वा नीतिरत्र विधीयताम्।<br>अन्यथा कलहः कामं भविष्यति महीभुजाम्॥ ७ | अतएव कन्याके लिये कोई शर्त निर्धारित करके ही राजकुमारीका विवाह हो—यही नीति इस अवसरपर अपनायी जानी चाहिये; अन्यथा राजाओंमें परस्पर घोर कलहकी स्थिति उत्पन्न हो जायगी॥ ७॥ |
| एवं विवादे संवृत्ते राज्ञां तत्र परस्परम्।<br>आहूतस्तु सभामध्ये सुबाहुर्नृपसत्तमः॥ ८ | इस प्रकार वहाँ राजाओंमें परस्पर विवाद उत्पन्न हो जानेपर नृपश्रेष्ठ सुबाहु सभामें बुलाये गये॥ ८॥ |
| समाहूय नृपाः सर्वे तमूचुस्तत्त्वदर्शिनः।<br>राजनीतिस्त्वया कार्या विवाहेऽत्र समाहिता॥ ९<br><br>किं ते चिकीर्षितं राजंस्तद्बदस्व समाहितः।<br>पुत्र्याः प्रदानं कस्मै ते रोचते नृप चेतसि॥ १० | उन्हें बुलवाकर तत्त्वदर्शी राजाओंने उनसे कहा— हे राजन्! इस विवाहमें आप राजोचित नीतिका अनुसरण करें। हे राजन्! आप क्या करना चाहते हैं, उसे सावधान होकर बतायें। हे नृप! आप अपने मनसे इस कन्याको किसे प्रदान करना पसन्द करते हैं?॥ ९-१०॥ |
| सुबाहुरुवाच | सुबाहु बोले— |
| पुत्र्या मे मनसा कामं वृतः किल सुदर्शनः।<br>मया निवारितात्यर्थं न सा प्रत्येति मे वचः॥ ११<br><br>किं करोमि सुताया मे न वशे वर्तते मनः।<br>सुदर्शनस्त्वैकाकी सम्प्राप्तोऽस्ति निराकुलः॥ १२ | मेरी पुत्रीने मन-ही-मन सुदर्शनका वरण कर लिया है। इसके लिये मैंने उसे बहुत रोका, किंतु वह मेरी बात नहीं मानती। मैं क्या करूँ? मेरी पुत्रीका मन वशमें नहीं है और यह सुदर्शन भी निर्भीक होकर यहाँ अकेले आ गया है॥ ११-१२॥ |