देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| रतिर्भूतिस्तथा बुद्धिर्मतिः कीर्तिः स्मृतिर्धृतिः।<br>श्रद्धा मेधा स्वधा स्वाहा क्षुधा निद्रा दया गतिः॥ ६०<br><br>तुष्टिः पुष्टिः क्षमा लज्जा जृम्भा तन्द्रा च शक्तयः।<br>संस्थिताः सर्वतः पार्श्वे महादेव्याः पृथक्पृथक्॥ ६१ | वहाँ रति, भूति, बुद्धि, मति, कीर्ति, स्मृति, धृति, श्रद्धा, मेधा, स्वधा, स्वाहा, क्षुधा, निद्रा, दया, गति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, जृम्भा, तन्द्रा—ये शक्तियाँ अलग-अलग रूपमें उन महादेवीके समीप सभी ओर खड़ी थीं॥ ६०-६१॥ |
| वरायुधधराः सर्वा नानाभूषणभूषिताः।<br>मन्दारमालाकुलिता मुक्ताहारविराजिताः॥ ६२ | वे सभी श्रेष्ठ आयुध धारण किये हुए थीं, नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके हृदयपर मन्दारकी मालाएँ और मोतियोंके हार सुशोभित हो रहे थे॥ ६२॥ |
| तां दृष्ट्वा ताश्च संवीक्ष्य तस्मिन्नेकार्णवे जले।<br>विस्मयाविष्टहृदयः सम्बभूव जनार्दनः॥ ६३ | उन भगवती महालक्ष्मी तथा उनकी सभी अन्यान्य सखियोंको उस प्रलयसागरके जलमें उपस्थित देखकर भगवान् विष्णुके मनमें बड़ा विस्मय हुआ॥ ६३॥ |
| चिन्तयामास सर्वात्मा दृष्टमायोऽतिविस्मितः।<br>कुतो भूताः स्त्रियः सर्वाः कुतोऽहं वटतल्पगः॥ ६४<br><br>अस्मिन्नेकार्णवे घोरे न्यग्रोधः कथमुत्थितः।<br>केनाहं स्थापितोऽस्म्यत्र शिशुं कृत्वा शुभाकृतिम्॥ ६५ | इस प्रकार भगवतीकी माया देखकर अति चकित सर्वात्मा भगवान् विष्णु सोचने लगे—ये देवियाँ कहाँसे आ गयीं, मैं वटवृक्षके पत्तेपर कैसे आ गया, इस एकार्णव महासागरमें वटवृक्ष कहाँसे उत्पन्न हो गया और किसके द्वारा मैं सुन्दर स्वरूपवाला बालक बनाकर उसपर स्थापित किया गया हूँ?॥ ६४-६५॥ |
| ममेयं जननी नो वा माया वा कापि दुर्घटा।<br>दर्शनं केनचित्त्वद्य दत्तं वा केन हेतुना॥ ६६ | ये मेरी माता तो नहीं हैं! अथवा यह कोई दुर्घट माया है? किसने और किस कारणसे मुझे इस समय दर्शन दिये हैं?॥ ६६॥ |
| किं मया चात्र वक्तव्यं गन्तव्यं वा न वा क्वचित्।<br>मौनमास्थाय तिष्ठेयं बालभावादतन्द्रितः॥ ६७ | अब मैं इस विषयमें क्या कहूँ? मैं यहाँसे कहीं चला जाऊँ अथवा मौन धारण करके बालभावसे सावधान होकर यहीं स्थित रहूँ॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकवैराग्यवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
बालरूपधारी भगवान् विष्णुसे महालक्ष्मीका संवाद, व्यासजीका शुकदेवजीसे देवीभागवतप्राप्तिकी परम्परा बताना तथा शुकदेवजीका मिथिला जानेका निश्चय करना
| व्यास उवाच<br>दृष्ट्वा तं विस्मितं देवं शयानं वटपत्रके।<br>उवाच सस्मितं वाक्यं विष्णो किं विस्मितो ह्यसि॥ १ | व्यासजी बोले— इस प्रकार वटपत्रपर सोये हुए उन भगवान् विष्णुको आश्चर्यचकित देखकर मन्द मुसकान करती हुई देवीने यह वचन कहा—‘विष्णो! आप विस्मयमें क्यों पड़े हैं?’॥ १॥ |