देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 158, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 158
| अ० १६ ] | प्रथम स्कन्ध | १४९ |
|---|
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महाशक्त्याः प्रभावेण त्वं मां विस्मृतवान्पुरा।<br>प्रभवे प्रलये जाते भूत्वा भूत्वा पुनः पुनः॥ २ | आप उस महाशक्तिकी मायासे पूर्वकालमें भी सृष्टिकी उत्पत्ति तथा प्रलय होनेपर इसी प्रकार बार-बार जन्म लेकर मुझे भूलते रहे हैं॥ २॥ |
| निर्गुणा सा परा शक्तिः सगुणस्त्वं तथाप्यहम्।<br>सात्त्विकी किल या शक्तिस्तां शक्तिं विद्धि मामिकाम्॥ ३ | वे पराशक्ति निर्गुण हैं, मैं और आप तो सगुण हैं। जो सात्त्विकी शक्ति है, उसे आप मेरी ही शक्ति समझिये॥ ३॥ |
| त्वन्नाभिकमलाद् ब्रह्मा भविष्यति प्रजापतिः।<br>स कर्ता सर्वलोकस्य रजोगुणसमन्वितः॥ ४ | आपके नाभिकमलसे प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न होंगे। वे ही रजोगुणसे युक्त होकर समस्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि करेंगे॥ ४॥ |
| स तदा तप आस्थाय प्राप्य शक्तिमनुत्तमाम्।<br>रजसा रक्तवर्णञ्च करिष्यति जगत्त्रयम्॥ ५<br><br>सगुणान्यञ्चभूतांश्च समुत्पाद्य महामतिः।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियेशांश्च मनःपूर्वान्समन्ततः॥ ६<br><br>करिष्यति ततः सर्गं तेन कर्ता स उच्यते।<br>विश्वस्यास्य महाभाग त्वं वै पालयिता तथा॥ ७ | वे ब्रह्मा ही तपोबलका आश्रय लेकर श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करके रजोगुणके द्वारा त्रिभुवनको लाल वर्णका कर देंगे। गुणोंसहित पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु—इन पाँचों महाभूतोंकी एवं मनके साथ इन्द्रियों तथा उनके अधिष्ठातृदेवताओंकी रचना करके वे बुद्धिमान् ब्रह्माजी जगत्की सृष्टि करेंगे; इसी कारण वे कर्ता कहे जायेंगे और आप इस विश्वके पालक होंगे॥ ५-७॥ |
| तद्भ्रुवोर्मध्यदेशाच्च क्रोधाद् रुद्रो भविष्यति।<br>तपः कृत्वा महाघोरं प्राप्य शक्तिं तु तामसीम्॥ ८<br><br>कल्पान्ते सोऽपि संहर्ता भविष्यति महामते।<br>तेनाहं त्वामुपायाता सात्त्विकीं त्वमवेहि माम्॥ ९<br><br>स्थास्येऽहं त्वत्समीपस्था सदाहं मधुसूदन।<br>हृदये ते कृतावासा भवामि सततं किल॥ १० | उनके क्रोध करनेपर उनकी भौंहोंके मध्यभागसे रुद्र उत्पन्न होंगे। हे महामते! वे ही रुद्र घोर तप करके तामसी शक्ति प्राप्तकर कल्पान्तके समय सृष्टिके संहारकर्ता होंगे। इसी कारण मैं आपके पास आयी हूँ; आप मुझे वही सात्त्विकी शक्ति समझिये। हे मधुसूदन! मैं यहीं रहूँगी। मैं तो सर्वदा आपके ही पास रहती हूँ। आपके हृदयमें मैं निरन्तर निवास करती हूँ॥ ८-१०॥ |
| विष्णुरुवाच<br>श्लोकस्यार्धं मया पूर्वं श्रुतं देवि स्फुटाक्षरम्।<br>तत्केनोक्तं वरारोहे रहस्यं परमं शिवम्॥ ११<br><br>तन्मे ब्रूहि वरारोहे संशयोऽयं वरानने।<br>निर्धनो हि यथा द्रव्यं तत्स्मरामि पुनः पुनः॥ १२ | विष्णु बोले— हे देवि! हे वरारोहे! कुछ समय पूर्व मैंने स्पष्ट अक्षरोंवाला जो आधा श्लोक सुना, वह परम कल्याणप्रद तथा रहस्यमय वाक्य किसने कहा था? हे वरारोहे! यह मुझे शीघ्र बताइये; हे सुमुखि! इस विषयमें मुझे महती शंका है। जिस प्रकार निर्धन पुरुष धनकी चिन्ता करता रहता है, उसी प्रकार मैं उसका बार-बार स्मरण किया करता हूँ॥ ११-१२॥ |
| व्यास उवाच<br>विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा महालक्ष्मीः स्मितानना।<br>उवाच परया प्रीत्या वचनं चारुहासिनी॥ १३ | व्यासजी बोले— विष्णुका वह वचन सुनकर मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली महालक्ष्मी मधुर हास्यके साथ अत्यन्त प्रेमसे बोलीं— ॥ १३ ॥ |