भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 156
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्कन्धा द्वादश तत्रैव पञ्चलक्षणसंयुतम्।<br>सर्वेषां च पुराणानां भूषणं मम सम्मतम्॥ ४८इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह पुराणोंके पाँचों लक्षणोंसे युक्त है। मेरे विचारमें यह पुराण सभी पुराणोंका आभूषण है॥ ४८॥
सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते।<br>येन भागवतेनेह तत्पठ त्वं महामते॥ ४९हे महामते! जिस भागवतके सुननेमात्रसे सत् और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है, उसे तुम पढ़ो॥ ४९॥
वटपत्रशयानाय विष्णवे बालरूपिणे।<br>केनास्मि बालभावेन निर्मितोऽहं चिदात्मना॥ ५०<br><br>किमर्थं केन द्रव्येण कथं जानामि चाखिलम्।<br>इत्येवं चिन्त्यमानाय मुकुन्दाय महात्मने॥ ५१<br><br>श्लोकार्धेन तया प्रोक्तं भगवत्याखिलार्थदम्।<br>सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥ ५२[एक बार महाप्रलयकालमें] वटपत्रपर शयन करते हुए बालरूपधारी भगवान् विष्णु वहाँ सोच रहे थे कि किस चिदात्माने, किस प्रयोजनसे तथा किस द्रव्यसे मुझे बालरूपमें उत्पन्न किया है? इन सब विषयोंका ज्ञान मुझे कैसे हो? इस प्रकार चिन्तन कर रहे महात्मा बालमुकुन्दसे उन आदिशक्ति भगवतीने सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको आधे श्लोकमें ही इस प्रकार कहा—‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्’ अर्थात् यह सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है॥ ५०—५२॥
तद्वचो विष्णुना पूर्वं संविज्ञातं मनस्यपि।<br>केनोक्ता वागियं सत्या चिन्तयामास चेतसा॥ ५३<br><br>कथं वेद्मि प्रवक्तां स्त्रीपुंसौ वा नपुंसकम्।<br>इति चिन्ताप्रपन्नेन धृतं भागवतं हृदि॥ ५४<br><br>पुनः पुनः कृतोच्चारस्तस्मिन्नेवास्तचेतसा।<br>वटपत्रे शयानः सन्नभूच्चिन्तासमन्वितः॥ ५५यह बात पहले भी भगवान् विष्णुके हृदयमें उत्पन्न हुई थी। इसलिये अब वे सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया? इस कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ? वह स्त्री है या पुरुष अथवा नपुंसक है? ऐसी चिन्तावाले भगवान् विष्णुने भागवतको हृदयमें धारण किया और उसी श्लोकार्धमें मन लगाये हुए वे बार-बार उसका उच्चारण करने लगे। इस प्रकार वटपत्रपर सोये हुए वे भगवान् विष्णु चिन्तातुर हो गये॥ ५३—५५॥
तदा शान्ता भगवती प्रादुरास चतुर्भुजा।<br>शङ्खचक्रगदापद्मवरायुधधरा शिवा॥ ५६<br><br>दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता।<br>संयुता सदृशीभिश्च सखीभिः स्वविभूतिभिः॥ ५७<br><br>प्रादुर्बभूव तस्याग्रे विष्णोरमिततेजसः।<br>मन्दहास्यं प्रयुञ्जाना महालक्ष्मीः शुभानना॥ ५८उसी समय शंख, चक्र, गदा, पद्म—इन श्रेष्ठ आयुधोंको धारण किये हुए, चतुर्भुजा, शान्तिस्वरूपा, शान्ता शिवा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित होकर अपने ही समान विभूतियोंवाली सखियोंसहित प्रादुर्भूत हुईं। वे सुन्दर मुखवाली भगवती महालक्ष्मी परम तेजस्वी भगवान् विष्णुके समक्ष मन्द-मन्द मुसकराती हुई प्रकट हुईं॥ ५६—५८॥
सूत उवाच<br>तां तथा संस्थितां दृष्ट्वा हृदये कमलेक्षणः।<br>विस्मितः सलिले तस्मिन्निराधारां मनोरमाम्॥ ५९सूतजी बोले— उस अपार प्रलय-सागरमें बिना अवलम्बके स्थित मनोरम रूपवाली उन दिव्य देवीको देखकर कमलनयन भगवान् विष्णु बड़े ही विस्मयमें पड़े॥ ५९॥