देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 160, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 160
| अ० १६ ] | प्रथम स्कन्ध | १५१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्।<br>सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये॥ २६ | संसार जिनके द्वारा रचा गया है, वे ही जब प्रसन्न होती हैं तब मनुष्योंके उद्धारके लिये वरदायिनी होती हैं॥ २४—२६॥ |
| सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी।<br>संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ २७ | वे ही सनातनी परमा विद्या हैं, संसारके बन्धन एवं मुक्तिकी कारणस्वरूपा हैं और वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं॥ २७॥ |
| अहं त्वमखिलं विश्वं तस्याश्चिच्छक्तिसम्भवम्।<br>विद्धि ब्रह्मन् सन्देहः कर्तव्यः सर्वदानघ॥ २८ | मैं, आप तथा समस्त संसार उन्हींकी चैतन्य शक्तिसे उत्पन्न हुए हैं। हे ब्रह्मन्! हे निष्पाप! ऐसा आप सत्य जानिये, इसमें सन्देह नहीं है॥ २८॥ |
| श्लोकार्धेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल।<br>विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा॥ २९ | उन भगवतीने आधे श्लोकमें ही जो कहा है, वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है। द्वापरयुगके आदिमें पुनः उसका विस्तार होगा॥ २९॥ |
| व्यास उवाच<br>ब्रह्मणा संगृहीतं च विष्णोस्तु नाभिपङ्कजे।<br>नारदाय च तेनोक्तं पुत्रायामितबुद्धये॥ ३०<br><br>नारदेन तथा मह्यं दत्तं हि मुनिना पुरा।<br>मया कृतमिदं पूर्णं द्वादशस्कन्धविस्तरम्॥ ३१ | व्यासजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने परम बुद्धिमान् पुत्र नारदजीसे इसे कहा। पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने उसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत करके पूर्ण किया॥ ३०-३१॥ |
| तत्पठस्व महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।<br>पञ्चलक्षणयुक्तं च देव्याश्चरितमुत्तमम्॥ ३२ | हे महाभाग! वेदतुल्य, पाँच लक्षणोंसे युक्त तथा भगवतीके उत्तम चरितोंसे ओत-प्रोत इस ‘श्रीमद्देवीभागवत’ पुराणको पढ़ो॥ ३२॥ |
| तत्त्वज्ञानरसोपेतं सर्वेषामुत्तमोत्तमम्।<br>धर्मशास्त्रसमं पुण्यं वेदार्थेनोपबृंहितम्॥ ३३<br><br>वृत्रासुरवधोपेतं नानाख्यानकथायुतम्।<br>ब्रह्मविद्यानिधानं तु संसारार्णवतारकम्॥ ३४ | तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थके द्वारा उपबृंहित और धर्मशास्त्रके समान पुण्यप्रद यह भागवत सभी पुराणोंमें श्रेष्ठतम है। यह वृत्रासुरवधके कथानकसे युक्त, विविध आख्यानोपाख्यानोंसे समन्वित, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागरसे पार करनेवाला है॥ ३३-३४॥ |
| गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः।<br>पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ॥ ३५ | अतः हे महाभाग! तुम उस भागवतको अवश्य पढ़ो; तुम अत्यन्त बुद्धिमान् और योग्य हो। हे नरश्रेष्ठ! यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण पुण्यप्रद है॥ ३५॥ |
| अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम्।<br>अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम्॥ ३६<br><br>सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम्।<br>शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम्॥ ३७ | तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो; यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवालेके लिये अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है॥ ३६-३७॥ |