देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| तस्माद्दारान्कुर्वीत तज्जयाय महामते।<br>वार्धके तप आतिष्ठेदिति शास्त्रोदितं वचः॥ ६५ | हे महामते! इसलिये उन बलवान् इन्द्रियोंपर विजय पानेके लिये स्त्रीपरिणय करके गृहस्थ बनना चाहिये, तत्पश्चात् वृद्धावस्थामें तप करना चाहिये—यह शास्त्रवचन है॥ ६५॥ |
| विश्वामित्रो महाभाग तपः कृत्वातिदुश्चरम्।<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि निराहारो जितेन्द्रियः॥ ६६<br><br>मोहितश्च महातेजा वने मेनकया स्थितः।<br>शकुन्तला समुत्पन्ना पुत्री तद्वीर्यजा शुभा॥ ६७ | हे महाभाग! वनमें स्थित महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र किसी समय तीन सहस्र वर्षोंतक निराहार और जितेन्द्रिय रहकर अत्यन्त कठोर तप करके भी मेनकाको देखकर मोहित हो गये और उन्हींके तेजसे पुत्रीरूपमें सुन्दर शकुन्तला पैदा हुई॥ ६६-६७॥ |
| दृष्ट्वा दाशसुतां कालीं पिता मम पराशरः।<br>कामबाणार्दितः कन्यां तां जग्राहोडुपे स्थितः॥ ६८ | मेरे पिता पराशरजी भी धीवरकी कृष्णवर्णा कन्याको देखकर काम-बाणसे आहत हो गये और उन्होंने नावपर ही उसे स्वीकार कर लिया था॥ ६८॥ |
| ब्रह्मापि स्वसुतां दृष्ट्वा पञ्चबाणप्रपीडितः।<br>धावमानश्च रुद्रेण मूर्च्छितश्च निवारितः॥ ६९ | ब्रह्माजी भी अपनी कन्या को देखकर कामसे पीड़ित हो गये और बेसुध होकर उसके पीछे दौड़ते रहे; तब शिवजीने उन्हें रोका॥ ६९॥ |
| तस्मात्त्वमपि कल्याण कुरु मे वचनं हितम्।<br>कुलजां कन्यकां वृत्वा वेदमार्गं समाश्रय॥ ७० | अतः हे कल्याणकारी पुत्र! तुम मेरा हितकर वचन मान लो और किसी कुलीन कन्यासे विवाह करके सनातन वेदमार्गका पालन करो॥ ७०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे व्यासेन गृहस्थधर्मवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
शुकदेवजीका विवाहके लिये अस्वीकार करना तथा व्यासजीका उनसे श्रीमद्देवीभागवत पढ़नेके लिये कहना
| श्रीशुक उवाच<br>नाहं गृहं करिष्यामि दुःखदं सर्वदा पितः।<br>वागुरासदृशं नित्यं बन्धनं सर्वदेहिनाम्॥ १ | **श्रीशुकदेवजी बोले—**हे पिताजी! सर्वदा दुःख देनेवाले गृहस्थाश्रमको मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगा; क्योंकि [पशु-पक्षियोंको फँसानेवाले] जालके समान यह आश्रम सभी मानवोंके लिये सदा बन्धनस्वरूप है॥ १॥ |
| धनचिन्तातूराणां हि क्व सुखं तात दृश्यते।<br>स्वजनैः खलु पीड्यन्ते निर्धना लोलुपा जनाः॥ २ | हे तात! धन-धान्यकी चिन्तामें व्याकुल लोगोंके लिये सुख कहाँ दिखायी पड़ता है? निर्धन और लोभके वशीभूत मनुष्य अपने ही परिवारजनोंद्वारा सर्वदा कष्ट पाते रहते हैं॥ २॥ |
| इन्द्रोऽपि न सुखी तादृग्यादृशो भिक्षुनिःस्पृहः।<br>कोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकीविभवे सति॥ ३ | इन्द्र भी वैसे सुखी नहीं रहते, जैसा एक सुखी निःस्पृह भिक्षुक रहता है। तब भला इस संसारमें तीनों लोकोंका वैभव पाकर भी दूसरा कौन सुखी रह सकता है?॥ ३॥ |