भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 148
अ० १४ ]प्रथम स्कन्ध१३९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपस्तप्त्वा महाघोरं प्राप्तोऽसि त्वमयोनिजः।<br>देवरूपी महाप्राज्ञ पाहि मां पितरं शुक॥ ३१हे शुक! कठिन तपस्या करके मैंने तुम्हारे-जैसा अयोनिज पुत्र पाया है। हे महाप्राज्ञ! तुम देवतारूप हो, अतः मुझ पिताकी रक्षा करो॥ ३१॥
सूत उवाच<br>इति वादिनमभ्याशे प्राप्तः प्राह शुकस्तदा।<br>विरक्तः सोऽतिसक्तं तं साक्षात्पितरमात्मनः॥ ३२सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहनेवाले व्यासजीके पास उपस्थित विरक्त शुकदेवजीने गृहस्थ-आश्रममें अनुरक्त अपने पितासे कहा॥ ३२॥
शुक उवाच<br>किं त्वं वदसि धर्मज्ञ वेदव्यास महामते।<br>तत्त्वेन शाधि शिष्यं मां त्वदाज्ञां करवाण्यलम्॥ ३३**शुकदेवजी बोले—**हे महामते! हे धर्मज्ञ! हे वेदव्यास! आप क्या कह रहे हैं, मुझ शिष्यको आप तत्त्वज्ञानका उपदेश दें; मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा॥ ३३॥
व्यास उवाच<br>त्वदर्थे यत्तपस्तप्तं मया पुत्र शतं समाः।<br>प्राप्तस्त्वं चातिदुःखेन शिवस्याराधनेन च॥ ३४<br><br>ददामि तव वित्तं तु प्रार्थयित्वाथ भूपतिम्।<br>सुखं भुंक्ष्व महाप्राज्ञ प्राप्य यौवनमुत्तमम्॥ ३५**व्यासजी बोले—**हे पुत्र! तुम्हारे लिये मैंने सैकड़ों वर्ष कष्ट सहकर जो तपस्या की और शिवजीकी आराधना की, उसके फलस्वरूप मैंने तुम्हें पाया है। किसी राजासे माँगकर मैं तुम्हें प्रचुर धन दूँगा, हे महाप्राज्ञ! तुम श्रेष्ठ यौवन प्राप्त करके सुखका उपभोग करो॥ ३४-३५॥
शुक उवाच<br>किं सुखं मानुषे लोके ब्रूहि तात निरामयम्।<br>दुःखविद्धं सुखं प्राज्ञा न वदन्ति सुखं किल॥ ३६**शुकदेवजी बोले—**हे तात! आप बतायें कि इस मनुष्यलोकमें भला विपत्तिरहित कौन-सा सुख है? बुद्धिमान् लोग दुःखसे युक्त सुखको सुख नहीं कहते हैं॥ ३६॥
स्त्रियं कृत्वा महाभाग भवामि तद्वशानुगः।<br>सुखं किं परतन्त्रस्य स्त्रीजितस्य विशेषतः॥ ३७हे महाभाग! स्त्री पाकर मैं उसीके वशमें हो जाऊँगा। तब भला आप ही बताइये, परतन्त्र होकर और विशेषतः स्त्रीके वशमें रहकर मैं कौन-सा सुख पा सकूँगा?॥ ३७॥
कदाचिदपि मुच्येत लोहकाष्ठादियन्त्रितः।<br>पुत्रदारैर्निबद्धस्तु न विमुच्येत कर्हिचित्॥ ३८लौह या काष्ठके फन्देमें जकड़ा हुआ पुरुष कदाचित् छूट भी सकता है, किंतु पुत्र-कलत्रके बन्धनमें फँसा हुआ प्राणी कभी भी बन्धनमुक्त नहीं हो पाता॥ ३८॥
विण्मूत्रसम्भवो देहो नारीणां तन्मयस्तथा।<br>कः प्रीतिं तत्र विप्रेन्द्र विबुधः कर्तुमिच्छति॥ ३९यह शरीर विष्ठा एवं मूत्रसे परिपूर्ण रहता है; वैसे ही स्त्रियोंका शरीर भी होता है। हे विप्रेन्द्र! तब कौन बुद्धिमान् पुरुष उससे प्रीति करना चाहेगा!॥ ३९॥
अयोनिजोऽहं विप्रर्षे योनौ मे कीदृशी मतिः।<br>न वाञ्छाम्यहमग्रेऽपि योनावेव समुद्भवम्॥ ४०हे विप्रशिरोमणे! मैं अयोनिज हूँ, तब योनिजन्य सुखमें मेरी बुद्धि कैसे होगी? मैं भविष्यमें भी अपनी उत्पत्ति किसी योनिमें नहीं चाहता॥ ४०॥
विट्सुखं किमु वाञ्छामि त्यक्त्वात्मसुखमद्भुतम्।<br>आत्मारामश्च भूयोऽपि न भवत्यतिलोलुपः॥ ४१अतः अद्भुत अध्यात्म सुखको छोड़कर मैं विट्-मूत्रजन्य सुखको क्यों चाहूँ? अपने-आपमें रमण करनेवाला कभी विषय-सुखका लोभी नहीं होता॥ ४१॥