भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

| १४० | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रथमं पठिता वेदा मया विस्तारिताश्च ते।<br>हिंसामयास्ते पठिताः कर्ममार्गप्रवर्तकाः॥ ४२<br><br>बृहस्पतिर्गुरुः प्राप्तः सोऽपि मग्नो गृहार्णवे।<br>अविद्याग्रस्तहृदयः कथं तारयितुं क्षमः॥ ४३मैंने सांगोपांग वेदोंका अध्ययन किया और जाना कि वे हिंसामय हैं तथा कर्ममार्गके प्रवर्तक हैं। मुझे गुरुरूपमें बृहस्पति प्राप्त हुए, वे भी गृहस्थीके सागरमें डूबे हुए हैं। अविद्याग्रस्त हृदयवाले वे मेरा उद्धार कैसे कर सकते हैं?॥ ४२-४३॥
रोगग्रस्तो यथा वैद्यः पररोगचिकित्सकः।<br>तथा गुरुर्मुमुक्षोर्मे गृहस्थोऽयं विडम्बना॥ ४४<br><br>कृत्वा प्रणामं गुरवे त्वत्समीपमुपागतः।<br>त्राहि मां तत्त्वबोधेन भीतं संसारसर्पतः॥ ४५जैसे कोई रोगग्रस्त वैद्य दूसरेके रोगकी चिकित्सा करता हो, उसी प्रकार मुझ मोक्षार्थीके गुरु गृहस्थ हैं, यह विडम्बना ही है। इसलिये ऐसे गुरुको नमस्कार करके मैं आपके पास आया हूँ। अब आप तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर मेरी रक्षा करें; क्योंकि मैं इस संसाररूपी सर्पसे अत्यन्त भयभीत हूँ॥ ४४-४५॥
संसारेऽस्मिन्महाघोरे भ्रमणं नभचक्रवत्।<br>न च विश्रमणं क्वापि सूर्यस्येव दिवानिशि॥ ४६इस महाभयंकर संसार-चक्रमें प्राणीमात्रको सर्वदा नक्षत्रोंकी भाँति चक्कर काटना पड़ता है और सूर्यकी भाँति दिन-रात उन्हें भी कभी विश्राम करनेका अवसर नहीं मिलता॥ ४६॥
किं सुखं तात संसारे निजतत्त्वविचारणात्।<br>मूढानां सुखबुद्धिस्तु विट्सु कीटसुखं यथा॥ ४७हे तात! इस संसारमें आत्मज्ञानको छोड़कर कौन-सा सुख है? मूढ़ जनोंको सुखकी वैसी ही प्रतीति होती है, जैसी विष्ठाके कीड़ोंको विष्ठामें होती है॥ ४७॥
अधीत्य वेदशास्त्राणि संसारे रागिणश्च ये।<br>तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति सधर्माः श्वाश्वसूकरैः॥ ४८वेदशास्त्रोंको पढ़कर भी जो सांसारिक सुखमें फँसे रहते हैं, भला उनसे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा? उन्हें तो कुत्ते, घोड़े एवं सूअर आदि पशुओंके समान धर्मवाला समझना चाहिये॥ ४८॥
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य वेदशास्त्राण्यधीत्य च।<br>बध्यते यदि संसारे को विमुच्येत मानवः॥ ४९<br><br>नातः परतरं लोके क्वचिदाश्चर्यमद्भुतम्।<br>पुत्रदारगृहासक्तः पण्डितः परिगीयते॥ ५०दुर्लभ मानवतनको पाकर तथा वेदशास्त्रोंका अध्ययन करके भी यदि मनुष्य इस संसारमें बँधता है, तो दूसरा भला कौन बन्धनमुक्त हो सकता है? इससे बढ़कर संसारमें कोई दूसरी अद्भुत बात नहीं है कि पुत्र-कलत्र और घरके बन्धनमें पड़ा हुआ भी पण्डित कहलाता है!॥ ४९-५०॥
न बाध्यते यः संसारे नरो मायागुणैस्त्रिभिः।<br>स विद्वान्स च मेधावी शास्त्रपारं गतो हि सः॥ ५१जो मनुष्य इस संसारमें मायाके सत्त्व, रज, तम-रूपी तीनों गुणोंसे बाँधा नहीं जाता है; वही विद्वान्, बुद्धिमान् एवं शास्त्रमें पारंगत है॥ ५१॥
किं वृथाध्ययनेनात्र दृढबन्धकरेण च।<br>पठितव्यं तदेवाशु मोचयेद्भवबन्धनात्॥ ५२दृढ़ बन्धनमें डालनेवाले व्यर्थ विद्याध्ययनसे क्या लाभ? उसीका अध्ययन करना चाहिये, जो शीघ्र ही भवबन्धनसे मुक्त कर दे॥ ५२॥
गृह्णाति पुरुषं यस्माद् गृहं तेन प्रकीर्तितम्।<br>क्व सुखं बन्धनागारे तेन भीतोऽस्म्यहं पितः॥ ५३पुरुषको बन्धनमें जकड़ लेनेके कारण ही उसे गृह कहा गया है। अतः ऐसे बन्धनरूप घरमें सुख कहाँ? हे पिताजी! इसीलिये मैं भयभीत हूँ॥ ५३॥