देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |
| इति शप्तं वनं तेन ये जानन्ति जनाः क्वचित्।<br>वर्जयन्तीह ते कामं वनं दोषसमृद्धिमत्॥ २३ | उन शिवजीने वनको ऐसा शाप दे दिया है—इसे जो लोग जानते हैं, वे उस दोषपूर्ण वनका पूर्णतः परित्याग कर देते हैं॥ २३॥ | | सुद्युम्नस्तु तदज्ञानात्प्रविष्टः सचिवैः सह।<br>तथैव स्त्रीत्वमापन्नस्तैः सहेति न संशयः॥ २४ | वे सुद्युम्न भी अज्ञानवश सचिवोंके साथ उस वनमें चले गये, जिससे वे अपने सचिव आदि सहित स्त्री हो गये; इसमें शंकाका कोई कारण नहीं है॥ २४॥ | | चिन्ताविष्टः स राजर्षिर्न जगाम गृहं हिया।<br>विचचार बहिस्तस्माद्देशादितस्ततः॥ २५ | चिन्ताकुल होनेके कारण राजा सुद्युम्न लज्जावश घर नहीं गये और उस वनप्रदेशसे बाहर इधर-उधर घूमने लगे॥ २५॥ | | इलेति नाम सम्प्राप्तं स्त्रीत्वे तेन महात्मना।<br>विचरंस्तत्र सम्प्राप्तो बुधः सोमसुतो युवा॥ २६ | स्त्रीत्व प्राप्त होनेपर उन महात्माका नाम इला पड़ गया। इस प्रकार स्त्रीरूपमें घूमते हुए एक दिन चन्द्रमाके युवा पुत्र बुधसे उनकी भेंट हो गयी॥ २६॥ | | स्त्रीभिः परिवृतां तां तु दृष्ट्वा कान्तां मनोरमाम्।<br>हावभावकलायुक्तां चकमे भगवान्बुधः॥ २७<br><br>सापि तं चकमे कान्तं बुधं सोमसुतं पतिम्।<br>संयोगस्तत्र सञ्जातस्तयोः प्रेम्णा परस्परम्॥ २८ | अनेक स्त्रियोंके साथ भ्रमण करती हुई उस हाव-भावमयी युवती रमणीको देखकर चन्द्रमाके पुत्र भगवान् बुध उसपर मोहित हो गये। वह रमणी भी उन चन्द्रपुत्र बुधको अपना पति बनानेके लिये आकुल हो उठी। इस प्रकार परस्पर अनुरागके कारण कुछ दिनोंमें उन दोनोंका संयोग हो गया॥ २७-२८॥ | | स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम्।<br>इलायां सोमपुत्रस्तु चक्रवर्तिनमुत्तमम्॥ २९<br><br>सा प्रासूत सुतं बाला चिन्ताविष्टा वने स्थिता।<br>सस्मार स्वकुलाचार्यं वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ३० | उस चन्द्रमापुत्र बुधने इलाके गर्भसे पुरूरवा नामक श्रेष्ठ चक्रवर्ती पुत्रको उत्पन्न किया। पुत्रको जन्म देकर वह इला वनमें ही रहने लगी तथा चिन्तातुर हो उसने अपने कुलाचार्य मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीका स्मरण किया॥ २९-३०॥ | | स तदास्य दशां दृष्ट्वा सुद्युम्नस्य कृपान्वितः।<br>अतोषयन्महादेवं शङ्करं लोकशङ्करम्॥ ३१ | [इलाके स्मरण करते ही वसिष्ठजी वहाँ आये।] सुद्युम्नकी यह दशा देखकर उन्हें बड़ी दया आयी। तब उन्होंने समस्त लोकका कल्याण करनेवाले महादेव शिवको प्रसन्न किया॥ ३१॥ | | तस्मै स भगवांस्तुष्टः प्रददौ वाञ्छितं वरम्।<br>वसिष्ठः प्रार्थयामास पुंस्त्वं राज्ञः प्रियस्य च॥ ३२ | वसिष्ठजीपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें मनोभिलषित वर प्रदान किया। वसिष्ठजीने प्रिय राजा सुद्युम्नके पुनः पुरुष होनेके लिये प्रार्थना की॥ ३२॥ | | शङ्करस्तु निजां वाचमृतां कुर्वन्नुवाच ह।<br>मासं पुमांस्तु भविता मासं स्त्री भूपतिः किल॥ ३३ | शिवजीने अपना वचन सत्य करते हुए कहा—'हे ऋषे! आजसे राजा सुद्युम्न एक मास पुरुष और एक मास स्त्री बने रहेंगे'॥ ३३॥ | | इत्थं प्राप्य वरं राजा जगाम स्वगृहं पुनः।<br>चक्रे राज्यं स धर्मात्मा वसिष्ठस्याप्यनुग्रहात्॥ ३४ | इस प्रकार वरदान पाकर राजा सुद्युम्न पुनः अपने घर आ गये और वे धर्मात्मा वहाँ वसिष्ठजीकी कृपासे राज्य करने लगे॥ ३४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 B