भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138
अ० १२]प्रथम स्कन्ध१२९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हंसकारण्डवाकीर्णं कीचकध्वनिनादितम्।<br>भ्रमरालिरुतारामं वनं सर्वसुखावहम्॥ ९दूसरेसे रगड़ खानेके कारण हवामें मधुर] ध्वनि कर रहे थे तथा कहीं भ्रमरोंकी मधुर गुंजार वन-प्रान्तको गुंजित कर रही थी। इस प्रकार वह वन सब प्रकारसे सुखदायक था॥ ८-९॥
दृष्ट्वा प्रमुदितो राजा सुद्युम्नः सेवकैर्वृतः।<br>वृक्षान्सुपुष्पितान्वीक्ष्य कोकिलारावमण्डितान्॥ १०कोयलोंकी ध्वनिसे मण्डित तथा पुष्पोंसे युक्त वृक्षोंको देखकर अनुचरोंके साथ राजा सुद्युम्न अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १०॥
प्रविष्टस्तत्र राजर्षिः स्त्रीत्वमाप क्षणात्ततः।<br>अश्वोऽपि वडवा जातश्चिन्ताविष्टः स भूपतिः॥ ११<br><br>किमेतदिति चिन्तार्तश्चिन्त्यमानः पुनः पुनः।<br>दुःखं बहुतरं प्राप्तः सुद्युम्नो लज्जयान्वितः॥ १२<br><br>किं करोमि कथं यामि गृहं स्त्रीभावसंयुतः।<br>कथं राज्यं करिष्यामि केन वा वञ्चितो ह्यहम्॥ १३राजर्षि सुद्युम्नने वहाँ प्रवेश किया और उसी क्षण वे स्त्रीके रूपमें परिणत हो गये; उनका घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें हो गया। इससे वे राजा चिन्तामें पड़ गये। [वे मनमें सोचने लगे] यह क्या हो गया? चिन्तासे व्याकुल वे राजा सुद्युम्न बार-बार सोचते हुए बहुत दुःखी तथा लज्जित हुए। [उन्होंने सोचा] अब मैं क्या करूँ और स्त्रीत्व भावसे युक्त मैं घर कैसे जाऊँ? मैं अब कैसे राज्य-संचालन करूँगा? मैं इस प्रकार किससे ठगा गया?॥ ११-१३॥
ऋषय ऊचुः<br>सूताश्चर्यमिदं प्रोक्तं त्वया यल्लोमहर्षण।<br>सुद्युम्नः स्त्रीत्वमापन्नो भूपतिर्देवसन्निभः॥ १४<br><br>किं तत्कारणमाचक्ष्व वने तत्र मनोहरे।<br>किं कृतं तेन राज्ञा च विस्तरं वद सुव्रत॥ १५ऋषिगण बोले— हे लोमहर्षण सूतजी! आपने यह बड़ी आश्चर्यजनक बात कही है। देवताके समान तेजस्वी राजा सुद्युम्न स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये—इसका क्या कारण है? उसे बताइये। उस रमणीय वनमें राजाने कौन-सा कार्य किया था? हे सुव्रत! आप विस्तारपूर्वक हमें बताइये॥ १४-१५॥
सूत उवाच<br>एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयः सनकादयः।<br>दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन्॥ १६सूतजी बोले— एक समयकी बात है—सनकादिक ऋषिगण अपने तेजसे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए शंकरजीके दर्शनके लिये वहाँ गये थे॥ १६॥
तस्मिंश्च समये तत्र शङ्करः प्रमदायुतः।<br>क्रीडासक्तो महादेवो विवस्त्रा कामिनी शिवा॥ १७<br><br>उत्सङ्गे संस्थिता भर्तू रममाणा मनोरमा।<br>तान्विलोक्यम्बिका देवी विवस्त्रा व्रीडिता भृशम्॥ १८<br><br>भर्तुरङ्गात्समुत्थाय वस्त्रमादाय पर्यधात्।<br>लज्जाविष्टा स्थिता तत्र वेपमानातिमानिनी॥ १९उस समय महादेव शिव पार्वतीके साथ विहार कर रहे थे, इसी बीच उन सनकादिक ऋषियोंको वहाँ देखकर पार्वती अत्यन्त लज्जित हो गयीं। वे अतिमानिनी पार्वती काँपती हुई लज्जित होकर अलग खड़ी हो गयीं॥ १७-१९॥
ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्गं रममाणयोः।<br>परिवृत्य ययुस्तूर्णं नरनारायणाश्रमम्॥ २०सनकादिक मुनि भी शिव एवं पार्वतीको विहार करते देखकर वहाँसे तत्काल लौटकर नर-नारायणके आश्रममें चले गये॥ २०॥
ह्रीयुतां कामिनीं वीक्ष्य प्रोवाच भगवान्हरः।<br>कथं लज्जातुरासि त्वं सुखं ते प्रकरोम्यहम्॥ २१<br><br>अद्यप्रभृति यो मोहात्पुमान्कोऽपि वरानने।<br>वनं च प्रविशेदतत्सं वै योषिद्भविष्यति॥ २२भगवान् शिव अपनी प्रिय पत्नीको लज्जित देखकर कहने लगे—तुम इस प्रकार लज्जित क्यों हो रही हो? तुम्हारे सुख का उपाय मैं अभी करता हूँ। हे वरानने! आजसे जो कोई भी पुरुष इस वनमें भूलसे भी आयेगा, वह स्त्री हो जायगा॥ २१-२२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 A

देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 138, कुल 889 में से · BharatKosha