भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

१२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १२

कथितेयं बुधोत्पत्तिर्गुरुक्षेत्रे च सोमतः।<br><br>यथा श्रुता मया पूर्वं व्यासात्सत्यवतीसुतात् ॥ ८६[हे मुनिजन!] इस प्रकार गुरुके क्षेत्रमें चन्द्रमासे बुधकी उत्पत्तिका यह वृत्तान्त जैसा मैंने पूर्वमें सत्यवती-पुत्र व्यासजीसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया है॥ ८६ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे बुधोत्पत्तिर्नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥


अथ द्वादशोऽध्यायः

राजा सुद्युम्नकी इला नामक स्त्रीके रूपमें परिणति, इलाका बुधसे विवाह और पुरूरवाकी उत्पत्ति, भगवतीकी स्तुति करनेसे इलारूपधारी राजा सुद्युम्नकी सायुज्यमुक्ति

सूत उवाचसूतजी बोले—
ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां कथयामि वः।<br>बुधपुत्रोऽतिधर्मात्मा यज्ञकृद्दानतत्परः॥ १तदनन्तर इलाके गर्भसे पुरूरवाने जन्म लिया, यह प्रसंग मैं आपलोगोंसे कहता हूँ। वे बुधपुत्र पुरूरवा बड़े धर्मात्मा, यज्ञ करनेवाले एवं दानशील थे॥ १॥
सुद्युम्नो नाम भूपालः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>सैन्धवं हयमारुह्य चचार मृगयां वने॥ २<br><br>युतः कतिपयामात्यैर्दर्शितश्चारुकुण्डलः।<br>धनुराजगवं बद्ध्वा बाणसङ्गं तथाद्भुतम्॥ ३<br><br>स भ्रमंस्तद्गनोद्देशे हन्यमानो रुरून्मृगान्।<br>शशांश्च सूकरांश्चैव खड्गांश्च गवयांस्तथा॥ ४<br><br>शरभान्महिषांश्चैव साम्भ्रान्वनकुक्कुटान्।<br>निघ्नन्मेध्यान् पशून् राजा कुमारवनमाविशत्॥ ५सुद्युम्न नामक एक राजा थे। वे बड़े ही सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे। एक बार वे सैन्धव घोड़ेपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये। उनके साथ कुछ मन्त्री भी थे। वे राजा कानोंमें कमनीय कुण्डल पहने थे। आजगव नामक धनुष तथा बाणोंसे भरा अद्भुत तरकस धारण करके उस वनमें भ्रमण करते हुए रुरुमृग, हिरण, खरगोश, सूअर, गैंडों, गवय, साँभर, भैंसों, वन-मुर्गोंको मारते हुए तथा यज्ञोपयोगी अनेक वनपशुओंका वध करते हुए राजा सुद्युम्न 'कुमार' नामक वनमें प्रविष्ट हुए॥ २-५॥
मेरोरधस्तले दिव्यं मन्दारद्रुमराजितम्।<br>अशोककलिकाकीर्णं बकुलैरधिवासितम्॥ ६<br><br>सालैस्तालैस्तमालैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा।<br>आम्रैर्नीपैर्र्मधूकैश्च माधवीमण्डपावृतम्॥ ७वह दिव्य वन सुमेरु पर्वतके निचले भागमें था, जो सुन्दर मन्दार-वृक्षोंसे सुशोभित था, वहाँ अशोक वृक्षकी लताएँ फैली हुई थीं तथा मौलसिरीकी सुगन्धि उसे सुरभित कर रही थी। वह वन साल, ताड़, तमाल, चम्पा, कटहल, आम, कदम्ब और महुएके पेड़ोंसे सुशोभित था तथा जहाँ-तहाँ माधवी लता मण्डपके समान छायी हुई थी॥ ६-७॥
दाडिमैर्नारिकेलैश्च कदलीखण्डमण्डितम्।<br>यूथिकामालतकुन्दपुष्पवल्लीसमावृतम् ॥ ८उस वनमें दाडिम, नारियल तथा केलेके वृक्ष भी शोभित हो रहे थे और वह वन जूही, मालती तथा कुन्दकी पुष्पित लताओंसे चारों ओरसे घिरा हुआ था। वहाँ हंस और बतख विचरण कर रहे थे, बाँस [एक