देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२७
| ब्रह्मा स्वसदनं प्राप्तः कैलासं चापि शङ्करः।<br>बृहस्पतिस्तु सन्तुष्टः प्राप्य भार्यां मनोरमाम्॥ ७४ | पितामह ब्रह्मा अपने लोकको तथा शिवजी भी कैलासपर्वतपर चले गये। इस प्रकार अपनी सुन्दरी स्त्रीको पाकर बृहस्पति सन्तुष्ट हो गये॥ ७४॥ |
| ततः कालेन कियता तारासूत सुतं शुभम्।<br>सुदिने शुभनक्षत्रे तारापतिसमं गुणैः॥ ७५ | तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद ताराने शुभ दिन तथा शुभ नक्षत्रमें गुणोंमें चन्द्रमाके समान ही सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। पुत्रको उत्पन्न देखकर देवगुरु बृहस्पतिने प्रसन्न मनसे उसके विधिवत् जातकर्म आदि सभी संस्कार किये॥ ७५-७६॥ |
| दृष्ट्वा पुत्रं गुरुर्जातं चकार विधिपूर्वकम्।<br>जातकर्मादिकं सर्वं प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ ७६ | |
| श्रुतं चन्द्रमसा जन्म पुत्रस्य मुनिसत्तमाः।<br>दूतं च प्रेषयामास गुरुं प्रति महामतिः॥ ७७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! चन्द्रमाने जब सुना कि पुत्र उत्पन्न हुआ है, तब बुद्धिमान् चन्द्रमाने बृहस्पतिके पास अपना दूत भेजा [और कहलाया—हे गुरो!] यह पुत्र आपका नहीं है; क्योंकि यह मेरे तेजसे उत्पन्न है। तब आपने अपनी इच्छासे बालकका जातकर्मादि संस्कार क्यों कर लिया?॥ ७७-७८॥ |
| न चायं तव पुत्रोऽस्ति मम वीर्यसमुद्भवः।<br>कथं त्वं कृतवान्कामं जातकर्मादिकं विधिम्॥ ७८ | |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दूतस्य च बृहस्पतिः।<br>उवाच मम पुत्रो मे सदृशो नात्र संशयः॥ ७९ | उस दूतका वचन सुनकर बृहस्पतिने कहा कि यह मेरा पुत्र है; क्योंकि इसकी आकृति मेरे समान है, इसमें सन्देह नहीं॥ ७९॥ |
| पुनर्विवादः सञ्जातो मिलिता देवदानवाः।<br>युद्धार्थमागतास्तेषां समाजः समजायत॥ ८० | पुनः दोनोंमें विवाद खड़ा हो गया और देव-दानव मिलकर फिर युद्धके लिये आ गये और इस प्रकार उनका बहुत बड़ा समूह एकत्र हो गया॥ ८०॥ |
| तत्रागतः स्वयं ब्रह्मा शान्तिकामः प्रजापतिः।<br>निवारयामास मुखे संस्थितान्युद्धदुर्मदान्॥ ८१ | उस समय शान्तिके अभिलाषी स्वयं प्रजापति ब्रह्माजी पुनः वहाँ पहुँचे और रणभूमिमें डटे हुए युद्धोत्सुक देव-दानवोंको उन्होंने युद्धसे रोका॥ ८१॥ |
| तारां पप्रच्छ धर्मात्मा कस्यायं तनयः शुभे।<br>सत्यं वद वरारोहे यथा क्लेशः प्रशाम्यति॥ ८२ | धर्मात्मा ब्रह्माजीने तारासे पूछा—‘हे कल्याणि! यह पुत्र किसका है? हे सुन्दरि! तुम सही-सही बता दो, जिससे यह कलह शान्त हो जाय’॥ ८२॥ |
| तमुवाचासितापाङ्गी लज्जमानाप्यधोमुखी।<br>चन्द्रस्येति शनैरन्तर्जगाम वरवर्णिनी॥ ८३ | तब असितापांगी सुन्दरी ताराने लजाते हुए सिर नीचे करके मन्द स्वरमें कहा—‘यह पुत्र चन्द्रमाका है’ ऐसा कहकर वह घरके भीतर चली गयी॥ ८३॥ |
| जग्राह तं सुतं सोमः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।<br>नाम चक्रे बुध इति जगाम स्वगृहं पुनः॥ ८४ | तब प्रसन्नचित्त होकर चन्द्रमाने उस पुत्रको ले लिया। उन्होंने उसका नाम ‘बुध’ रखा। पुनः वे अपने घर चले गये॥ ८४॥ |
| ययौ ब्रह्मा स्वकं धाम सर्वे देवाः सवासवाः।<br>यथागतं गतं सर्वैः सर्वशः प्रेक्षकैर्जनैः॥ ८५ | तत्पश्चात् ब्रह्माजी अपने लोकको तथा इन्द्रसहित सभी देवता भी चले गये। इसी प्रकार प्रेक्षक भी जो जहाँसे आये थे, वे सभी अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ८५॥ |