देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 135, कुल 889 में से
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| १२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| सूत उवाच | |
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| सूत उवाच<br>इत्युक्तः शशिना दूतः प्रययौ शक्रसन्निधिम्।<br>इन्द्रायाचष्ट तत्सर्वं यदुक्तं शीतरश्मिना ॥ ६२ | **सूतजी बोले—**चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर दूत इन्द्रके पास लौट गया और चन्द्रमाने जो कहा था, वह सब उसने इन्द्रसे कह दिया ॥ ६२ ॥ |
| तुराषाडपि तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तो बभूव ह।<br>सेनोद्योगं तथा चक्रे साहाय्यार्थं गुरोर्विभुः ॥ ६३ | इसे सुनकर प्रतापी इन्द्र भी अत्यन्त क्रोधित हुए और गुरु बृहस्पतिकी सहायताके लिये सेनाकी तैयारी करने लगे ॥ ६३ ॥ |
| शुक्रस्तु विग्रहं श्रुत्वा गुरुद्वेषात्ततो ययौ।<br>मा ददस्वेति तं वाक्यमुवाच शशिनं प्रति ॥ ६४ | दैत्यगुरु शुक्राचार्य चन्द्रमा तथा देवगुरुके विरोधकी बात सुनकर बृहस्पतिसे द्वेषके कारण चन्द्रमाके पास गये और उससे बोले कि आप ताराको वापस मत कीजिये ॥ ६४ ॥ |
| साहाय्यं ते करिष्यामि मन्त्रशक्त्या महामते।<br>भविता यदि संग्रामस्तव चेन्द्रेण मारिष ॥ ६५ | हे महामते! हे मान्य! यदि इन्द्रके साथ आपका युद्ध छिड़ जायगा तो मैं भी अपनी मन्त्रशक्तिसे आपकी सहायता करूँगा ॥ ६५ ॥ |
| शङ्करस्तु तदाकर्ण्य गुरुदाराभिमर्शनम्।<br>गुरुशत्रुं भृगुं मत्वा साहाय्यमकरोत्तदा ॥ ६६ | गुरुपत्नीसे अनाचारकी बात सुनकर और शुक्राचार्यको बृहस्पतिका शत्रु जानकर शिवजी भी बृहस्पतिकी सहायताके लिये तैयार हो गये ॥ ६६ ॥ |
| संग्रामस्तु तदा वृत्तो देवदानवयोरद्भुतम्।<br>बहूनि तत्र वर्षाणि तारकासुरवत्किल ॥ ६७ | तब तारकासुरके साथ हुए युद्धकी भाँति देव-दानवोंमें संग्राम छिड़ गया। यह युद्ध बहुत वर्षोंतक चलता रहा ॥ ६७ ॥ |
| देवासुरकृतं युद्धं दृष्ट्वा तत्र पितामहः।<br>हंसारूढो जगामाशु तं देशं क्लेशशान्तये ॥ ६८ | देव-दानवोंका यह संग्राम देखकर प्रजापति ब्रह्माजी हंसपर सवार होकर उस क्लेशकी शान्तिके लिये रणस्थलमें शीघ्र पहुँचे। तब ब्रह्माजीने चन्द्रमासे कहा कि तुम गुरु बृहस्पतिकी पत्नी लौटा दो, नहीं तो भगवान् विष्णुको बुलाकर मैं तुम्हें समूल नष्ट कर दूँगा। तत्पश्चात् लोकपितामह ब्रह्माजीने भृगुनन्दन शुक्रको भी युद्धसे रोका और उनसे कहा—हे महामते! दैत्योंके संगसे क्या आपकी भी बुद्धि अन्याययुक्त हो गयी है? ॥ ६८—७० ॥ |
| राकापतिं तदा प्राह मुञ्च भार्यां गुरोरिति।<br>नोचेद्विष्णुं समाहूय करिष्यामि तु संक्षयम् ॥ ६९ | |
| भृगुं निवारयामास ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>किमन्यायमतिर्जाता सङ्गदोषान्महामते ॥ ७० | |
| निषेधयामास ततो भृगुस्तं चौषधीपतिम्।<br>मुञ्च भार्यां गुरोरद्य पित्राहं प्रेषितस्तव ॥ ७१ | तत्पश्चात् [ब्रह्माजीकी बात सुनकर शुक्राचार्य चन्द्रमाके पास गये] उन्होंने चन्द्रमाको युद्धसे रोका और कहा कि तुम्हारे पिताने मुझे भेजा है, तुम अपने गुरुकी पत्नीको तत्काल छोड़ दो ॥ ७१ ॥ |
| सूत उवाच<br>द्विजराजस्तु तच्छ्रुत्वा भृगोर्वचनमद्भुतम्।<br>ददौ च तत्प्रियां भार्यां गुरोर्गर्भवतीं शुभाम् ॥ ७२ | **सूतजी बोले—**शुक्राचार्यकी वह अद्भुत वाणी सुनकर चन्द्रमाने बृहस्पतिकी गर्भवती सुन्दरी प्रिय भार्याको लौटा दिया ॥ ७२ ॥ |
| प्राप्य कान्तां गुरुर्हृष्टः स्वगृहं मुदितो ययौ।<br>ततो देवास्ततो दैत्या ययुः स्वान्स्वान्गृहान्प्रति ॥ ७३ | पत्नीको पाकर देवगुरु बड़े प्रसन्न हुए और आनन्दपूर्वक अपने घर चले गये। तत्पश्चात् सभी देवता और दैत्य भी अपने-अपने घर चले गये ॥ ७३ ॥ |